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2026 में गांधी होते तो क्या होता? पटना में ‘रघुपति राघव’ विवाद से उठे सवाल

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पटना में 25 दिसंबर को आयोजित एक कार्यक्रम में लोक गायिका “देवी” द्वारा भजन ‘रघुपति राघव राजा राम’ गाने के दौरान “अल्लाह” शब्द आते ही विरोध और नारेबाजी की खबर सामने आई। इसी घटना के बहाने एक अनाम टिप्पणी सोशल मीडिया/व्हाट्सएप के जरिए साझा की जा रही है, जिसमें सवाल उठाया गया है—अगर 2026 में महात्मा गांधी जीवित होते, तो क्या हालात सच में अलग होते?

क्या हुआ था पटना में?

अटल बिहारी वाजपेयी की जन्मशती के अवसर पर पटना में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था। कार्यक्रम के दौरान गायिका ने ‘रघुपति राघव राजा राम’ गाना शुरू किया। भजन में ईश्वर के साथ “अल्लाह” नाम आते ही कुछ लोगों ने विरोध दर्ज कराया और ‘जय श्री राम’ के नारे लगने लगे।टिप्पणी के अनुसार, विवाद बढ़ने पर एक नेता ने मंच से गायिका से माफी मांगने को कहा। गायिका ने दर्शकों से कहा कि यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हों, तो वह क्षमा चाहती हैं।

“2026 में गांधी होते तो…”: अनाम टिप्पणी का दावा

इस घटना के संदर्भ में वायरल/प्राप्त अनाम टिप्पणी में कहा गया है कि आज के माहौल में “ईश्वर” और “अल्लाह” का नाम साथ लेना ही कुछ लोगों को असह्य लग रहा है—ऐसे में गांधी जैसे व्यक्ति का जीवित रहना और भी ज्यादा असहनीय बना दिया जाता।टिप्पणी में यह भी कहा गया है कि गांधी के नाम पर अक्सर यह बहस होती है—“गांधी होते तो ऐसा नहीं होता।” लेकिन लेखक का तर्क है कि आज जो हो रहा है, उसमें बहुत कुछ गांधी के रहते हुए भी हो सकता था, और जो होना चाहिए था, वह तब भी मुश्किल हो जाता।

टिप्पणी में लगाए गए आरोप और अंदेशे (लेखक का दृष्टिकोण)

अनाम टिप्पणी में मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक माहौल पर तीखे अंदाज में कई आशंकाएं दर्ज की गई हैं,

  • जैसे:गांधी को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता, उनकी बातों का मजाक उड़ता
  • उनके आश्रमों/ठिकानों पर “अवैध” होने के आरोप लगाकर कार्रवाई की जाती
  • सत्याग्रह जैसी गतिविधियों को रोकने के लिए पुलिस कार्रवाई होती
  • उनके विरोध या अनशन को नजरअंदाज किया जाता, और मुख्यधारा मीडिया में जगह कम मिलती
  • सांप्रदायिक सौहार्द के लिए किसी संवेदनशील इलाके में जाने पर उन्हें रोका/गिरफ्तार किया जा सकता
  • उनके खिलाफ “देशद्रोह” या “सौहार्द बिगाड़ने” जैसी धाराएं लगाने की आशंका जताई गई है

टिप्पणी का लहजा व्यंग्यात्मक/अतिरंजना-आधारित है और इसका उद्देश्य यह बताना है कि समाज में असहिष्णुता बढ़ने का दावा करने वाले लोग इसे गांधी के उदाहरण से जोड़कर देख रहे हैं।

भजन, आस्था और असहिष्णुता की बहस

‘रघुपति राघव राजा राम’ जैसे भजनों का इतिहास विविध धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भों से जुड़ा रहा है। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि भक्ति-संगीत में “अल्लाह” शब्द आने पर आपत्ति क्यों, जबकि यही रचना लंबे समय से गाई जाती रही है।वहीं, कुछ लोगों ने इसे “भावनाएं आहत होने” के फ्रेम में देखा। कुल मिलाकर, यह प्रकरण एक बार फिर आस्था, सार्वजनिक मंचों पर सांस्कृतिक सामग्री और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा पर बहस को तेज करता दिखा।

नोट (डिस्क्लेमर)

यह टिप्पणी हमारे पास बिना नाम के भेजी गई है। इसमें किसी सत्य/चिंता की ओर ध्यान दिलाने के लिए अतिरंजित अलंकार (hyperbole) का प्रयोग किया गया है। यह लेख उसी टिप्पणी का संपादित “Opinion” संस्करण है; न्यूज-पोर्टल पाठकों के लिए संदर्भ स्पष्ट रखने हेतु इसे व्याख्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

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