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“अंतहीन रास्ते” पर जमशेदपुर में साहित्यिक परिचर्चा: वरुण प्रभात की कविताओं में प्रतिरोध, संवेदना और समकालीन यथार्थ का सशक्त स्वर

Anthin Raste Paricharcha
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जनवादी लेखक संघ, सिंहभूम इकाई के आयोजन में साहित्यकारों ने “अंतहीन रास्ते” को बताया विचारोत्तेजक कृति, जिसमें उभरती है युवा मन की बेचैनी, सामाजिक संघर्ष और जनपक्षीय चेतना

Anthin Raste Paricharcha
Anthin Raste Paricharcha

युवा कवि वरुण प्रभात के प्रथम कविता-संग्रह “अंतहीन रास्ते” पर केंद्रित यह परिचर्चा न केवल एक साहित्यिक आयोजन रही, बल्कि समकालीन सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ पर गंभीर विमर्श का भी सशक्त मंच बनी। इस संदर्भ में कहा गया कि “अंतहीन रास्ते” से गुज़रना प्रीतिकर भी है और आश्वस्तिपरक भी—प्रीतिकर इसलिए कि इसकी कविताएँ अपने समय की ज्वलंत चिंताओं से गहराई से जुड़ी हैं, और आश्वस्तिपरक इसलिए कि उनमें इन चिंताओं के विरुद्ध प्रतिरोध का स्पष्ट संस्कार दिखाई देता है।

संकलन की कविताएँ नवसाम्राज्यवाद, बाज़ारवाद और उपभोक्तावादी व्यवस्था के बीच संवेदनशील मनुष्य की पीड़ा, विडंबना और संघर्ष को मार्मिक ढंग से उद्घाटित करती हैं। इन कविताओं में वैयक्तिक दुखबोध सामाजिक सरोकारों में रूपांतरित होता है और निजी अनुभव व्यापक जन-चेतना का हिस्सा बन जाते हैं। यही इस युवा कवि की रचनात्मक शक्ति और काव्य-कौशल का प्रमाण है।

मानवीय संवेदना की ऊष्मा से भरी ये कविताएँ जीवन के बहुआयामी यथार्थ को सामने लाती हैं, जहाँ एक ओर मध्यवर्गीय आत्मकेंद्रितता की आलोचना है, वहीं दूसरी ओर वंचित, शोषित और हाशिये के लोगों के पक्ष में स्पष्ट हस्तक्षेप भी है। कवि का यथार्थ बाहरी नहीं, बल्कि भोगा हुआ यथार्थ है, जो उसकी कविताओं को विश्वसनीयता प्रदान करता है।

इन कविताओं में बाज़ारवादी संस्कृति, संबंधों का विघटन, सामाजिक असमानता और राजनीतिक विडंबनाओं पर तीखा प्रहार है। साथ ही, कवि प्रतिरोध की चेतना को स्वर देते हुए जनपक्षीय बदलाव की आकांक्षा भी व्यक्त करता है। उसकी कविता केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक नैतिक हस्तक्षेप और लोकतांत्रिक चेतना का आह्वान है।

संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्मृतियों और लोक-जीवन से जुड़ी कविताएँ हैं, जिनमें विशेष रूप से ‘बाबूजी’ श्रृंखला उल्लेखनीय है। इन कविताओं में पारिवारिक संबंधों की गहन संवेदना, लोक-संस्कृति की गरमाहट और जीवन-मूल्यों की पुनर्स्थापना का भाव उपस्थित है।

समग्रतः “अंतहीन रास्ते” उत्तर-आधुनिक समय के जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य का एक सशक्त और विश्वसनीय काव्य-पाठ प्रस्तुत करता है। यह संग्रह न केवल व्यवस्था की विसंगतियों का उद्घाटन करता है, बल्कि परिवर्तन की संभावनाओं में भी विश्वास जगाता है। वाल्टर बेंजामिन के शब्दों में कहें तो कवि की यह रचनात्मक सक्रियता नई और कठोर यथार्थ परिस्थितियों से जूझते हुए भी एक नई शुरुआत की संभावनाएँ निर्मित करती है।

इसी क्रम में आज दिनांक 03-04-2026 को संध्या 04:00 बजे से जनवादी लेखक संघ, सिंहभूम इकाई द्वारा प्रयाग कक्ष, तुलसी भवन, बिष्टुपुर में इस काव्य-संकलन पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शहर के अनेक साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।

Anthin Raste Tulsi Bhawan
Anthin Raste Tulsi Bhawan

कार्यक्रम का शुभारंभ युवा हस्ताक्षर अजय महताब के स्वागत वक्तव्य से हुआ, जिसमें उन्होंने काव्य-संकलन “अंतहीन रास्ते” को केंद्र में रखते हुए उपस्थित सभी अतिथियों एवं श्रोताओं का स्वागत किया। प्रारंभिक वक्ता के रूप में युवा कवि निशांत सिंह ने कहा कि यह संकलन “गागर में सागर” की कहावत को चरितार्थ करता है और इसकी कविताएँ पाठक को निरंतर सोचने पर विवश करती हैं।

वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र अस्थाना ने कहा कि इस संकलन में युवा मन की बेचैनी, पीड़ा, आक्रोश और संवेदना सशक्त रूप में व्यक्त हुई है। उन्होंने ‘अंतहीन रास्ते’, ‘बाबूजी’ और ‘फैसला’ जैसी कविताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें संघर्ष तो है, परंतु विलाप नहीं।

सुधीर सुमन ने इसे वैश्विक परिदृश्य से जुड़ा काव्य बताया, जबकि डॉ. सुभाष चंद्र गुप्त ने कविताओं को गहराई से आत्मसात करने पर बल दिया। जयनंदन ने कवि के व्यक्तित्व और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान को रेखांकित किया।

वरिष्ठ कवयित्री ज्योत्सना अस्थाना ने कविता को मानवीय संवेदना की सुंदर यात्रा बताते हुए वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। वीणा पाण्डेय भारती ने इसे “पठनीय ही नहीं, विचारणीय” कृति बताते हुए इसके साहसिक स्वर की सराहना की।

अध्यक्षीय वक्तव्य में अशोक शुभदर्शी ने कहा कि यह संकलन हिंदी कविता की मौलिक संवेदना का सशक्त उदाहरण है और इसमें दमित वर्ग की आवाज़ को मुखर किया गया है।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि राजदेव सिन्हा ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन सुजय भट्टाचार्य ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता अशोक शुभदर्शी ने की।

इस आयोजन को सफल बनाने में निशांत सिंह, मंजू ठाकुर, डॉ. रामकविन्द्र, माधवी उपाध्याय, उदय प्रताप हृदयात, क्षमाश्री, ऊँकार मिश्रा, अमितेश तिवारी, रीना सिन्हा सलोनी, उपासना सिन्हा, ज्योत्सना अस्थाना, विनय कुमार, मिथिलेश चौबे, सौरभ अस्थाना, कैलाशनाथ शर्मा गाजीपुरी सहित अनेक साहित्यप्रेमियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

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