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वह शहर जो मेरा नहीं रहा | भागलपुर की बदलती तस्वीर और बढ़ती असुरक्षा | डॉ योगेन्द्र

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वह शहर जो मेरा नहीं रहा: परसों बाज़ार गया था। भागलपुर के भेरायटी चौक से खलीफाबाग आ रहा था कि एक हट्ठे- कट्ठे व्यक्ति ने हाथ पकड़ लिया । बोला- ‘ आपने मुझे पहचाना? ‘

मैंने कहा-‘ नहीं ।’

अमूमन मैं साफ़- साफ़ इंकार नहीं करता। हज़ारों छात्रों को मैंने पढ़ाया है । समय के साथ छात्रों के चेहरे बदल जाते हैं । अब सीधे कह दिया जाए कि नहीं पहचानता हूँ तो शायद छात्र को अच्छा न लगे। लेकिन इस आदमी की नज़र मेरी जेब पर थी और वह मेरे हाथ पर और भी दबाव बनाता जा रहा था। कोई भी छात्र ऐसा नहीं कर सकता और जान- पहचान के लोग भी हों तो उसका व्यवहार भी ऐसे नहीं हो सकते!

पीछे- पीछे अलका चल रही थी। वह कुछ से कुछ बोले जा रहा था और मैं जितना हाथ खींचता, वह उतना ही हाथ कस कर पकड़ लेता । मैं सचमुच डर गया था। उसने मेरी जेब में हाथ डाल दिया । जो भी रुपये थे, उसे निकाल लिया । तब तक अलका मेरे पीछे आकर खड़ी हो गयी थी । उसे अहसास हुआ कि मैं अकेला नहीं हूँ । आसपास में और लोग चल ही रहे थे। संयोग ऐसा था कि खुदरे रुपये सामने वाली जेब में थे जो उसके हाथ में थे और पाँच सौ के कुछ नोट अंदर वाली जेब में थे। जब से मोबाइल की चोरी हुई है, तब से बाज़ार में मोबाइल लेकर चलता नहीं । उसे लगा कि ज़्यादा कुछ नहीं मिलने वाला और हो सकता है कि हल्ला- गुल्ला हो तो भारी पड़ सकता है । उसने रुपया पुनः मेरी जेब में रख दिया।बोलने लगा कि मैं आपको जानता हूँ । मैं बोरिंग करने का काम करता हूँ । अगर कोई ऐसा ग्राहक हो तो बता दीजिएगा। मेरी दुकान शाह मार्केट में है। फिर वह तेज़ी से खिसक गया ।

भागलपुर से जुड़ी पुरानी यादें

भागलपुर में आज़ाद महसूस करता रहा हूँ । हर चौक- चौराहे, गलियाँ और लोग अपने जैसे लगते हैं । टी एन बी कॉलेज से पढ़ाई शुरू हुई और विश्वविद्यालय हिंदी विभाग से सेवानिवृत्त हुआ । लगभग पचास वर्ष का समय। इतने वर्षों की जान- पहचान है इस शहर से। इस बीच आंदोलन, जेल – यात्रा, शैक्षणिक कार्य, चार- चार चुनाव । जहाँ इतने कार्यों में सहभागिता हो, वह शहर अनजान कैसे रहेगा?

शहर का बदलता स्वरूप

लेकिन अब लगता है कि शहर बदल गया है । शहर के अंदर एक नया शहर उग आया है । जैनियों, बौद्धों और नाथों का शहर। बिहुला- बिषहरी की यादों का शहर । तिलकामांझी की संघर्ष और शहादत भूमि । सिद्धों द्वारा पुरोहिताई के ख़िलाफ़ आवाज़ देने वाला शहर । शरतचंद्र- वनफूल का शहर । हज़ारों कही- अनकही कहानियों का शहर ।

शहर पर कई दाग भी हैं तो सुनहरे पल भी। यहाँ मैं अपने को सुरक्षित पाता हूँ । बीस हज़ार करोड़ का जबसे सृजन घोटाला हुआ है । इस शहर का मिज़ाज बदल गया। नयी – नयी चमकती दुकानें, अनेकों अपार्टमेंट। राजनीति में पैसे की चमक। अब इसके पुराने आख्यान पुराने हो गये।

अपराध, दंगे और बदलती चेतना

जब पढ़ने आया था तो यहाँ अपराधियों के कई गुट थे। वे आपस में मारकाट करते। आम जीवन उससे कम ही प्रभावित थे। सबसे भयानक था, यहाँ हुए 1989 के दंगे। गंगा के दियारे में सत्तर के दशक के खूनी खेल भी कम भयावह नहीं थे। तब भी मुझे कभी डर नहीं लगा। साथियों का एक समूह था और किसी से भी टक्कर ले लेने की हिम्मत थी।

सक्रियता में आज भी कमी नहीं है, लेकिन लगता है कि यह शहर अब मेरा शहर नहीं है। अंदर ही अंदर बहुत तेज़ी से बदल रहा है। घर – दरवाज़े तो बदल ही रहे । लोगों की चेतना में भी अभूतपूर्व बदलाव है।

वैसे यह कोई मेरे शहर की कहानी नहीं है । हर शहर उदारीकरण के बाद अपना सत्व खोया है।

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