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ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है | डॉ योगेन्द्र

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बारिश, खेत और पिता की याद

रात में आकाश बरसता रहा । सुबह सूरज भरखर रोशनी लेकर आया। जहाँ पर हूँ, सामने खेत ही खेत है। नीम – आम के वृक्ष और एक व्यस्त सड़क । भागलपुर के गंगा ब्रिज के टूट जाने से ज़्यादातर ट्रकें मुंगेर ब्रिज से गुज़रने लगी हैं । दिन भर यह सड़क ट्रकों को ढोने में व्यस्त है । यों अभी जेठ है। गर्म महीना, लेकिन मौसम ने इसे आषाढ़ में तब्दील कर दिया है।
खेत और बारिश मुझे मेरे पिता की याद दिलाते हैं । पिता किसानी करते थे। हल- बैल तो उनके जिगर के टुकड़े हुआ करते थे।

कृषि संस्कृति और खोते शब्द

अब किसानी करने के तरीक़े बदल गए । हल की जगह ट्रैक्टर आ गया। खेती की भरी पूरी संस्कृति बदली ही, शब्द तक बदल गए । शब्द सिर्फ़ बदले नहीं, वे ज़िंदगी से ग़ायब हो गए । जैसे- हल- फ़ॉल, दमाही, कड़ाम, ओसाना, चीरनी, फारनी, चास आदि । वे अब कभी वापस नहीं आयेंगे।

अब उसकी जगह ट्रैक्टर, रोटावेटर सीड ड्रिल , हार्वेस्टर जैसे शब्दों का प्रयोग शुरू हो गया है । पुराने कृषि के साधन बदले तो उसकी जगह नये शब्द आ गए । शायद वे शब्द अब कभी नहीं आयेंगे या आयेंगे भी तो बदले हुए आयेंगे।

प्रकृति का विनाश और लुप्त होती प्रजातियाँ

हो सकता है, यह सभ्यता टूट- बिखर जाये । नयी सभ्यता खड़ी हो और मनुष्य नये तरीक़े से जीने लगे तो फिर नये- नये शब्द भी जीवन में आ जायें।
जीवन के बदलते तरीक़ों में हमने एक तरीक़ा सीखा है कि प्रकृति की कत्ल करते जायें। नतीजा है कि डोडो, तस्मानियन टाइगर, स्टेलर, समुद्री गाय, गोल्डन टॉड आदि जीवों की प्रजाति ख़त्म हो गई । गिद्ध, गौरैया, बाघ आदि पर भी खतरे मँडरा रहे हैं । उन्हें बचाने के लिए हम अभयारण्य बनाने का ड्रामा भी कर रहे हैं।

बदलता वक़्त और संकट

जो भी हो। वक़्त तो बदलता है- स्वाभाविक गति से भी और ज़ोर- ज़बर्दस्ती से भी। कभी-कभी भौगोलिक घटनाओं के कारण भी। बदलती हुई दुनिया अपने सामने कभी-कभी बड़े संकट लेकर आती है । मनुष्य को पता नहीं चलता और धरती पांव तले से खिसक जाती है । और तब सारे विचार, सभ्यता की गगनचुंबी इमारतें और दुनिया के संजाल धरे के धरे रह जाते हैं।

मनुष्य की अंतहीन तृष्णा और असंतोष

मनुष्य के अंदर अदम्य भूख भरी हुई है । अंतहीन तृष्णा । वह क्या चाहता है , कहना मुश्किल है । कभी वासनाओं के जाल में उलझ जाता है, तो कभी संन्यस्त होकर दुनिया से मुक्त होना चाहता है।

दुनिया में भाँति- भाँति तरह के लोग हैं । लेकिन लगता है कि एक भावना हरेक के अंदर है- असंतोष की भावना । आजकल तो साधु भी बिलबिलाये हुए हैं । उन्हें तप- तपस्या के लिए आधुनिक साधन चाहिए ।
दुनियावी लोगों की अपनी त्रासदी है। रहने के लिए एक घर काफ़ी है। पैसे की लूट में जिन्हें महारत हासिल है, उन्होंने कई शहरों में आलीशान मकान बना लिए हैं । तब भी वे संतुष्ट नहीं हैं।

मनुष्य की क्षमता: सृजन या विनाश?

दुनिया को तबाही के कगार पर अगर कोई जीव ला सकता है तो वह मनुष्य ही है । मनुष्य में बदलने की अपूर्व क्षमता है । यह क्षमता किसी प्राणी में नहीं है । बदलाव की इस संभावना में सृजन भी छिपा है और विनाश भी।
संयत होकर जीवन को सौंदर्य से आपूरित कर जीते रहें तो लंबे समय तक यह दुनिया चलेगी, लेकिन मनुष्य में नकारात्मक भावनाओं का उद्रेक हो जाय तो दुनिया का विनाश भी संभव है।

AI का उदय और अनिश्चित भविष्य

एआई एक कथा रच रही है। भविष्य में उसका आकार और स्वरूप कैसा होगा, कहना मुश्किल है । एआई से जो खेल रहे हैं, उन्हें भी मालूम नहीं है । तत्काल तो इतना भर है कि पूंजी के लोभी उससे अकूत लाभ उठा रहे हैं।

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