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Tivsha Sharma Case: आत्महत्या और स्त्री जीवन की घुटन पर डॉ योगेन्द्र की बड़ी टिप्पणी
Tivsha Sharma Case: भोपाल के पूर्व जिला जज गिरिबाला सिंह की बहू टिवशा शर्मा ने माँ और पिता को चैट में लिखा-“ मुझे बहुत घुटन हो रही है माँ । ये लोग न रोने देंगे, न हँसने की वजह देंगे ।” फिर उसने अपनी सहेली को चैट में सलाह दी- “ मैं फँस गई हूँ, तुम मत फँसना ।” और फिर उसने फाँसी लगाकर जान दे दी। टिवशा जान देकर मुक्त हो गई, लेकिन करोड़ों औरतों की कहानियाँ घुटती रहती हैं । ज़्यादातर अनकही । अंदर से टिवशा शर्मा की कहानी उद्भेदन करती है । लालची था पति- ससुर। पैसे के लिए प्रताड़ना और जब इसकी पूर्ति नहीं हुई तो चरित्रहीनता का आरोप । कोई कितना सहे। सहने की कथा ही तो है स्त्रियों का जीवन ।
नारी तुम केवल श्रद्धा हो? क्यों?
कामायनी में जयशंकर प्रसाद ने लिखा है-“नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में। पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।” नारी श्रद्धा केवल बन कर रह जाए ! क्यों? यों नारियों का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। उसके कौशल, हुनर और ताक़त का । भारत में अनेकानेक स्त्रियां हुई जिन्होंने इतिहास रचा है।
गार्गी, मैत्रेयी और सावित्रीबाई फुले का रास्ता
गार्गी मिथिला के राजा जनक के दरबार के नवरत्नों में से एक थीं। उन्होंने अपने समय के सबसे महान दार्शनिक, ऋषि याज्ञवल्क्य को ज्ञान और सृष्टि के रहस्य (ब्रह्म) पर शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी थी। महर्षि याज्ञवल्क्य को दो पत्नी थी- मैत्रेयी और कात्यायनी । जब महर्षि याज्ञवल्क्य ने संन्यास लेने से पहले अपनी संपत्ति अपनी दोनों पत्नियों में बाँटने का निर्णय लिया , तो मैत्रेयी ने संपत्ति लेने से इंकार कर दिया। इसके बजाय, उन्होंने पूछा कि क्या यह धन उन्हें अमरता दे सकता है। जब उत्तर नहीं आया तो उन्होंने उसका त्याग कर दिया और बह्म ज्ञान की ओर उन्मुख हुई। सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की एक महान महिला थी जिसने ताउम्र ज्ञान के लिए अपने को समर्पित कर दिया । स्त्रियों की मुक्ति ज्ञान के माध्यम से ही संभव है ।
समाज की कमजोर संरचना और कुंडली का ढोंग
समाज का जो सरंचना है उसमें हज़ारों टिवशा दम तोड़ती रहेंगी । वैवाहिक मौके पर कुंडली मिलायी जाती है । मंत्र पढ़े जाते हैं और उस वक़्त सब कुछ निरर्थक हो जाती हैं, जब आग में जलने पड़ता है और गले में फाँसी लगानी पड़ती है । मौजूदा समाज का स्टैक्चर कमज़ोर लोगों को हड़प लेता है। इससे मुक्ति के लिए तो गार्गी और सावित्रीबाई फुले ही एकमात्र रास्ता है । स्त्रियों की कितनी कहानियाँ काल के अँधेरे में विलीन हो जाती हैं । यंत्रणा का दुर्वह बोझ लिए बिना कुछ कहे संसार- पट से उतर जाती हैं । परिवार में भी वह न्यूनतम सुविधाओं के साथ रहती हैं । अख़बारों के पन्ने रंगे रहते हैं । यदा कदा समाज में हलचल होती है और फिर सन्नाटा फैल जाता है । फिर पुरानी कहानियाँ दुहरायी जाती हैं ।
बचपन की यादें और आज स्त्रियों की दशा
मुझे बचपन में पढ़ाई से एलर्जी थी । किताबें देखकर मन ही मन लेखकों को गालियाँ देता था । वह इसलिए कि उन्हें और कोई काम नहीं था जो बच्चों के सिर पर किताबों का बोझ डाल दिया । पिताजी खूब पीटते । लप्पड़- थप्पड़ से स्वागत करते ही और कहते- ‘ रोना नहीं है ।’ रुलाई अंदर ही अंदर घुटती रहती और ओठ कॉंप कर रह जाते । आज स्त्रियों की दशा कॉंपते ओठों की तरह है या अंदर ही अंदर घुटते घुटन की तरह ।
प्रतिरोध और विद्रोह ही मुक्ति का एकमात्र द्वार
स्त्रियों ने अनेकानेक आंदोलनों में हिस्सा लिया । शहादत दी, मगर मुक्ति के द्वार रुद्ध रहे। जो भी हो, स्त्रियों को टिवशा शर्मा की तरह नहीं होनी चाहिए । प्रतिरोध और विद्रोह के रास्ते से ही उनकी मुक्ति के द्वार खुलेंगे ।
