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जब संसद पशु मेला में तब्दील हो जाए तो जनता को कमान संभालनी पड़ेगी – डॉ. योगेन्द्र

sansad pashu mela janta ko kaman sambhalni padegi dr yogendra
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जब संसद पशु मेला में तब्दील हो जाय , तो संसद की कमान जनता को ही लेना पड़ेगा । दिल्ली पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने एक लंबी कविता लिखी थी , जिसकी कुछ पंक्तियाँ हैं –

“वैभव की दीवानी दिल्ली!
कृषक-मेध की रानी दिल्ली!
अनाचार, अपमान, व्यंग्य की
चुभती हुई कहानी दिल्ली!”

बेशर्म बादशाह ने दिल्ली को भी बेशर्म बना दिया है। जिस दिल्ली में सांसद बिकते हों, उस दिल्ली के कालेपन का विस्तार पूरे देश में हो रहा है। सांसद क्या कोई मामूली चीज़ है? वह क़ानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था का सदस्य है। उसे मालूम नहीं है कि वह क्या कर रहा है? ज़िंदगी तो आती जाती रहेगी, लेकिन कुकर्मो की फ़ेहरिस्त जीवित रहेगी । सयानी घोष को चुनाव के दौरान मैंने सुना था। लगता था कि भविष्य की वह बड़ी नेत्री होगी, लेकिन ममता बनर्जी हारी और भाग खड़ी हुई । भाग ही नहीं गई, जिसके खिलाफ गीत गाती थी, उसके शरण में पहुँच गई । क्या ममता बनर्जी जीत जाती, तब भी वह भागती? मौक़ापरस्ती तात्कालिक सुख दे सकती है, लेकिन ज़िंदगी तो तबाह हो ही जाती है । इतना ही डर था तो वह इस्तीफ़ा दे देती। सुविधाओं में ही जीवन जीना था तो अभिनय क्या बुरा था?

सयानी घोष अकेली नहीं है। सांसद के बिक्री केंद्रों पर अग्रिम बुकिंग चालू है। किस पार्टी के सफीने में कहाँ छेद होगा, कहना मुश्किल है। सत्ता जब क्रूर हो, पाखंड और बददिमाग़ हो। नियम – नैतिकता की तिलांजलि दे रखी हो, तो वह कुछ भी कर सकती है । नैतिकता का दम भरने वाला इतना अनैतिक हो सकता है, यह कल्पना से परे है । ऐसी परिस्थितियों के लिए दुष्यंत कुमार ने सही लिखा है

रहनुमाओं की अदाओं पर फ़िदा है दुनिया,
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारों।
कैसे आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।

दिल्ली कितनी बहक गई है कि मीडिया घोषणा करती है कि फ़लाँ पार्टी की ख़रीदारी हो गई, अब फलॉं की बारी है और सचमुच यह खेल शुरू हो जाता है। ऐसी असुविधाजनक परिस्थिति में जो खड़ा है, इतिहास उसी के साथ रहेगा । वह रहे या मिट जाए, लेकिन आनेवाली पीढ़ी पढ़ेगी कि जब सब ईमान बेच रहा था तो अमुक- अमुक लोगों को सत्ता ख़रीद नहीं सकी। मरेंगे तो सभी। लेकिन जीवित वही रहेंगे जिन्होंने आँधियों का सामना किया ।

लंगोटी लपेट कर जिसने जीवन जीया, वह इतिहास में है। सोने- चाँदी, हीरे-जवाहरात से लदे रजवाड़े सभी मिट गये । जिसने ताना- भरनी का काम किया, वे लोगों की ज़ुबान पर हैं। जो सांसद और विधायक बिक रहे हैं, जो ख़रीदार हैं, जिन पूँजीपतियों ने इस कुकृत्य में धन लगाया है, वे देश के साथ ग़द्दारी कर रहे हैं । गद्दारों को सबक सिखाना आज भारतीयों का प्राथमिक दायित्व है। लोकतंत्र लोकलाज से चलता है और जब लोकतंत्र चलाने वालो के चेहरे पर से लोकलाज उतर जाय, तो फिर सिर पर कफ़न बाँधने की तैयारी करनी ही पड़ती है ।

बाब डायलन की एक अंग्रेज़ी कविता के अनुवाद की कुछ पंक्तियाँ हैं-

“सीनेटरों, कांग्रेस सदस्यों,
कृपया इस आह्वान पर ध्यान दें।
द्वार पर खड़े न रहें,
मार्ग को अवरुद्ध न करें,
क्योंकि जो
विलंब करेगा वही घायल होगा।
बाहर एक युद्ध चल रहा है
और वह भयंकर रूप से जारी है।
यह जल्द ही आपकी खिड़कियों को हिला देगा
और आपकी दीवारों को कंपकंपा देगा,
क्योंकि समय बदल रहा है।”

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