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राम मंदिर घोटाले में खंडित आस्था और राम की मर्यादा

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राम मंदिर घोटाले में खंडित आस्था: राम मंदिर और बद्रीनाथ के बाद अब राजस्थान के बुटाटी धाम मंदिर में 22 करोड़ रुपये का बड़ा घोटाला सामने आया है। आरोप है कि मंदिर में चढ़ाए गए सोने-चांदी के आभूषण गायब कर दिए गए और खर्चे दिखाकर भारी लूट की गई।

निराला की कविता “राम की शक्ति पूजा” में राम भी रावण से हारते हुए दिखाए गए थे। कविता की पंक्तियाँ हैं — “स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय, रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय”। राम विभीषण से कहते हैं — “मित्रवर, विजय होगी न समर; यह नहीं रहा नर-वानर का राक्षस से रण, उतरीं पा महाशक्ति रावण से आमंत्रण; अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति!”
निराला ने अपने युग में महसूस किया था कि अन्याय की तरफ शक्ति होती है। आज भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। जो अन्यायी है, उसी के पास शक्ति है।
सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठे हैं। एक हृदयहीन सत्ता उनके सामने है। सत्ता थोड़ी भी नहीं हिल रही। कोई मरे या जिए, उसके रोएँ भी नहीं सिहरते।

सत्ता मंदिर बनाने के लिए बनी है और मंदिर लूटने के लिए भी

क्या अंतर पड़ता है कि पाँच दिनों तक किसी नाबालिग युवती के साथ बत्तीस लोग रेप करते हैं? सत्ता इसके लिए तो नहीं बनी थी। अगर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में नब्बे बार विभिन्न परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होते हैं तो कौन-सी बड़ी बात है? अगर सैकड़ों युवक हर साल आत्महत्या कर लेते हैं तो करें, इसमें सत्ता क्या करेगी?

आपने सुना नहीं। राम की कथा बाँचने वाले अनिरुद्धाचार्य कह रहे हैं कि राम मंदिर सरकारी मंदिर है। सरकार के हर कार्यालय में चोरी हो रही है। राम मंदिर में चोरी हो गई तो कौन-सी बड़ी बात है!
साधु से व्यापारी बने बाबा रामदेव कहते हैं कि हर मंदिर में चोरी होती है। राम मंदिर में चोरी हो गई तो हो गई। रामभद्राचार्य की आँख प्रकृति ने छीन ली। अब उनके पास दिमाग़ भी नहीं बचा है। वे कहते हैं — राम मंदिर में कोई चोरी नहीं हुई। यह राम मंदिर को बदनाम करने की साज़िश है।

यह है तथाकथित साधुओं का नैतिक-बोध और राम में आस्था। राम में कोई आस्था नहीं है। जहाँ राम मंदिर में हुई डकैती का समर्थन किया जाता हो, वहां कहाँ से टिकेंगी मर्यादाएँ?

अगर मर्यादाएँ नहीं टिकीं तो महाभारत का हश्र होगा

अगर मर्यादाएँ नहीं टिकीं तो महाभारत का हश्र होगा। महाभारत युद्ध के बाद विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं — “भीष्म ने कहा था, गुरू द्रोण ने कहा था, इसी अंत:पुर में आकर कृष्ण ने कहा था — मर्यादा मत तोड़ो। तोड़ी हुई मर्यादा कुचले हुए अजगर सा गुंजलिका में कौरव-वंश को लपेट कर सूखी लकड़ी-सी तोड़ डालेगी।”

महाभारत के पूर्व न धृतराष्ट्र ने सुनी कोई बात, न दुर्योधन ने। खंडित मर्यादाओं ने रक्त से धरती को लाल कर दिया।
चोरी-डकैती, हत्या-बलात्कार, धूर्तता और झूठ का जो समर्थन करने लगे, उसके पास कोई मर्यादा नहीं बची है।
सोनम वांगचुक सहित तमाम युवा जो आंदोलनरत हैं, उन्हें गिड़गिड़ाने और निवेदन का रास्ता छोड़ देना चाहिए। उन्हें कृष्ण के शब्द याद करना चाहिए।
तुलसीदास ने कहा था — सियाराममय सब जग जानी। अयोध्या या दिल्ली में कहाँ हैं सिया या राम? वहाँ तो धूर्तों का मेला लगा है।

हरिश्चंद्र पांडेय की कविता ‘अयोध्या’ की पंक्तियाँ हैं — “जहाँ सूर्य, वहाँ दिवस। जहाँ राम, वहाँ अयोध्या। कितनी बड़ी अयोध्या सौंप गए थे तुलसी हमें। कितनी छोटी रह गई है अयोध्या — मतपेटिका-सी छोटी।”
अयोध्या में राम की आस्था नहीं है। बल्कि राम को मतपेटिका में बदल दी गई है।

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