Sen your news articles to publish at [email protected]
शब्दों का विस्फोट और चुप्पियों की तलाश | आधुनिक जीवन, प्रकृति और मनुष्य पर गहन विचार
शब्दों का विस्फोट और चुप्पियों की तलाश: आकाश बादलों से भरा। लगता था कि अब बारिश होगी कि तब बारिश होगी। बारिश के डर से छाता भी रख लिया गया। ठंडी हवा। हवा में तैरती- खेलती चिड़िया। चिन – चिन करती एक छोटी सी चिड़िया एक स्थल पर ही रहती है। अब मेरी आदत सी हो गयी है कि उस स्थल पर पहुँच कर हर रोज़ चिड़िया को ढूँढता हूँ। वह चिड़िया चिनचिनाती हुई कभी बिजली के तारों पर तो कभी दीवारों पर मिल ही जाती है।
आगे एक स्कूल है। वहाँ सहेर के सहेर बगरो अर्थात् गौरैया मिलती है। यों सड़कें जगह जगह टूटी हैं, मगर आदत सी हो गयी है। आदतें बहुत बुरी होती हैं। एक तो मन कोल्हू का बैल हो जाता है। नयेपन से आँखें मूँदने लगती हैं। मनुष्य- मन के अंदर नयेपन की ललक न हो, तो ज़िन्दगी उदासियों से भर जाती हैं। जीवन उदासी से भर जाय तो राष्ट्र कैसे खुश रह सकता है? राष्ट्र कोई मानचित्र मात्र तो है नहीं। राष्ट्र तो मनुष्य, पशु पक्षी, जंगल, नदी, मैदान, खेत, पहाड़, सागर आदि से बने हैं।
सभ्यता का प्रसार, शब्दों का उतना ही विराट रूप
मनुष्य में अन्य जीवों की तुलना में एक महाशक्ति का विकास हो गया है- दूसरे के हिस्सों को हड़पने की शक्ति। उसे कितना ही प्राप्त हो जाए, वह हर समय असंतुष्ट रहता है। यह असंतोष दुख का बहुत बड़ा कारण है। सोचता हूँ कि प्रधानमंत्री का पद तो बहुत बड़ा है, फिर भी वे शांत क्यों नहीं रहते? क्यों हर समय जीत के लिए परेशान रहते हैं? क्यों देश की जनता को ठगते रहते हैं? जो वे कर नहीं सकते, उसकी आशा क्यों दिलाते हैं ? मेरे एक सीनियर हैं। उनमें हुनर है कि झूठ को सच बनाकर परोसने की।
उनके साथ बैठिए तो आपको मालूम नहीं पड़ेगा कि वे झूठ बोल रहे हैं। बाद में समझ में आयेगा कि वे झूठ बोल रहे थे। कई लोग ऐसे होते हैं जिनमें हिप्टोनाइज करने के गुण आ जाते हैं। हिटलर शब्दों में लोगों को ऐसे बाँधता था कि लोग उसकी ओर बह जाते थे। चिड़िया सुमधुर स्वर में लोगों को आकर्षित कर सकती है, लेकिन मनुष्य अपनी अपार शब्द- संपदा से नाश और निर्माण की रूपरेखा गढ़ सकता है।
ज्यों ज्यों सभ्यता का प्रसार होता गया, शब्दों का उतना ही विराट रूप दिखाई पड़ा। जंगली युग में कम ही शब्दों से काम चल जाता है। आज भी जो जंगलों में रहते हैं, कम ही बोलते हैं। जब खेती करने लगे तो शब्दों का विस्तार हुआ। नये काम के लिए नये शब्द। फिर वस्तुओं के व्यापार शुरू हुआ। हाट और बाज़ार। उसके सफलतापूर्वक संचालन के लिए नये नये शब्द आये। फिर यांत्रिक युग आया। शब्दों का विस्फोट हो गया। पहले श्रम से शब्द बनते थे। अब श्रम से दूर व्यक्ति नये नये शब्दों से लोगों को रिझाता है।
श्रमहीनता ने अनेक रोगों को जन्म दिया है। अकेलापन, फ़्रस्ट्रेशन और उदासी। जब श्रम नहीं करते। सिर्फ़ शब्दों पर जीवित रहते हैं, वे दूसरों को शिकार भी करते हैं और शिकार भी होते हैं। सभ्यता के इस फैलाव में कभी-कभी शब्द निरर्थक हो उठते हैं। आदमी शब्दों से इतना परेशान हो जाता है कि उसके अंदर मौन की भावनाएँ जागृत होती हैं। यहाँ तक कि मौन की वह प्रैक्टिस करता है।
चुप्पियों का सहारा लेता है। गाँव में कम शब्दों से काम चल जाता है। शहर और महानगर शब्दों में ही जीता है, इसलिए शहर के लोग ऊब कर एकांत की तलाश में जंगल, सागर और बर्फीले प्रदेश की ओर चल पड़ते हैं।
