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सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है? युवाओं के गुस्से और देश की मौजूदा उथल-पुथल का सच- डॉ योगेन्द्र
लोकप्रिय शायर शहरयार की ग़ज़ल की दो पंक्तियां हैं-
सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है।
सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है?
रांची हो या इलाहाबाद, पटना हो या दिल्ली- हर शहर में उथल- पुथल मचा है। यह उथल पुथल क्यों है ? क्यों युवाओं के सीने में जल रहे हैं ? देश में आया चतुर्दिक तूफ़ान का क्या मतलब है? कुछ महीने पहले जब भी सड़क पर लोग सरकार के खिलाफ आते थे, उन पर लाख तोहमतें लाद दी जाती थीं । तरह-तरह के इल्ज़ाम और उसके पीछे गोदी मीडिया और बीजेपी का आई टी सेल लग जाते थे। फिर सरकार की पुलिस सक्रिय हो उठती थी और झूठे मुक़दमे लाद दिए जाते थे। आज भी कई आंदोलनकारी जेलों में बंद हैं । यहाँ तक कि अन्नदाता किसान दिल्ली आये तो रास्ते में ख़ंदक खोदे गए, कीलें बिछायी गईं । वे दिल्ली से दूर ही रोक दिए गये। सात सौ किसान तिल- तिल कर मरे। बीजेपी की सरकार मदमस्त बनी रही। जब लगा कि चुनाव पर इस आंदोलन का दुष्प्रभाव पड़ सकता है, तब उसने किसानों पर लादे तीन क़ानून वापस किए गए। सरकार को चिंता नहीं है कि ग़लत नीतियों के कारण लाखों किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उसे अपने विज्ञापनों , दुष्प्रचारों और पूँजीपति- मित्रों पर बहुत भरोसा है। आज देश के युवा भले व्याकुल हैं, लेकिन बीजेपी व्याकुल नहीं है। आज बीजेपी सबसे बड़ी धनाढ्य पार्टी है। उसके ख़ज़ानों में करोड़ों करोड़ रुपए जमा हैं । वोट ख़रीदना हो या सांसद- ख़ज़ानों में कोई कमी नहीं है । एक निर्धन मुल्क में किसी पार्टी -फ़ंड में अकूत पैसा न केवल चौंकता है , बल्कि वह लोकतंत्र के काले अध्याय की कथा भी कहता है।
2014 में युवाओं की पूरी जमात नरेंद्र मोदी जी के सामने हर हर मोदी कर रही थी
2014 में युवाओं की पूरी जमात नरेंद्र मोदी जी के सामने हर हर मोदी कर रही थी। कितनी आशाएं जुड़ गईं थीं, मोदी जी। घनघोर अँधेरे में एक नयी उम्मीद बन कर वे आये थे । उनकी लुभावनी बातों से ऐसा अहसास होता था कि देश को उन्नति के शिखर पर ले जाने के लिए उनके पास मुकम्मल स्क्रिप्ट है। जब वे चुनावी सभाओं में कहते- ‘ अच्छे दिन ‘ तो जनता आगे पूरी करती- आयेंगे। देश को पक्का भरोसा हो गया था कि दुर्दिन के दिन गये और चमकदार दिन आये। और फिर उन्होंने युवाओं के लिए उनका ज़बर्दस्त पैकेज की घोषणा की- प्रति वर्ष दो करोड़ की नौकरी। बेरोजगार युवाओं को तपती गर्मी में ठंडी हवा का झोंका- सा लगा। मोदी जी जो कहते , युवाओं को उन पर पूरा यकीन होता। यहां तक कि जब नरेंद्र मोदी जी ने यह कह दिया कि देश में सत्तर सालों में कुछ नहीं हुआ। युवाओं को लगा कि सचमुच देश में कुछ नहीं हुआ है। नारों में देश खो गया और खो गयी युवाओं की चेतना । बीच- बीच में संदेह होता , लेकिन फिर युवा उनके पीछे चल देते।
पहले चुनावों से अच्छे दिन के नारे ग़ायब हुए
पहले चुनावों से अच्छे दिन के नारे ग़ायब हुए । दो करोड़ नौकरियों का वादा भी लुप्त हुआ। और फिर नरेंद्र मोदी जी की चौकीदारी शुरू हुई। ‘ मैं हूँ चौकीदार ‘ से एक नयी चमकदार यात्रा शुरू हुई । कुछ वर्षों में दसियों लुटेरे देश का करोड़ों करोड़ लेकर चंपत हो गये । ललित मोदी, विजय माल्या, मेहुल चौकी जैसे लुटेरे विदेशों में आराम से रह रहे हैं। बीजेपी सरकार जनता को भरोसा दिलाती रही कि सभी को पकड़कर लायेंगे, लेकिन कोई नहीं पकड़ा गया। भगोड़े लोगों और बीजेपी सरकार से क्या आंतरिक संबंध है, इसकी जाँच हो तो चौंकाने वाले नतीजे आयेंगे। बीजेपी सरकार की चालें और पूँजीपरस्त नीतियों के कारण युवाओं के सपने भंग होते गये। युवाओं को महसूस होने लगा कि पाँवों में पड़ी बेड़ियां और गर्दन पर लटकी तलवार के खिलाफ जंग लड़ना ही होगा। यही कारण है कि वर्षों से जो आवाज़ें रूकी थीं, वे फूट पड़ीं हैं। वर्तमान की पीड़ा और भविष्य की असुरक्षा उनकी चेतना में तूफ़ान बन कर आई है। सरकार उसे पुराने तरीक़ों से दबाने की कोशिश कर रही है। उन्हें पुलिस की लाठी, अपने लंपट कार्यकर्ताओं और पिटे- पिटाए नारों पर बहुत भरोसा है। मोदी जी नौकरियों का पिटारा लेकर आ गए हैं। पुलिस डंडे चलाने से चूक नहीं रही। उनके टीकाधारी कार्यकर्ता आंदोलनकारी बच्चियों को धमका कर माफ़ी मँगवा रहे हैं। यहां तक कि बलात्कार करने तक की धमकियाँ देने से नहीं चूक रहे । बीजेपी के मातृ संस्था आर एस एस के लोगों को सड़कों पर आये छात्रों को देशद्रोही बताना तो आम बात है। लेकिन यह एक भयावह सच है कि युवा पीढ़ी इस सदी का सबसे बड़ा संकट झेल रही है और इसका हल अंततः सड़कों पर बुलंद होती आवाजों से ही निकलेगा।
