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PM Modi और Dimagi Naxal: 12 सालों से वही पुरानी बातें

PM Modi और Dimagi Naxal
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PM Modi और Dimagi Naxal: प्रधानमंत्री के हालिया भाषण में एक नया शब्द सुना गया – “दिमागी नक्सल”। इसके साथ ही पारंपरिक विषयों जैसे “नौकरी” या “रोजगार” का जिक्र भी नहीं हुआ। एक तरह से ऐसा लगता है कि पिछले 12 सालों से वही पुरानी बातें दोहराई जा रही हैं।

“दिमागी नक्सल” उस अहिंसक और बुद्धिजीवियों द्वारा की जाने वाली अवधारणा का संकेत है, जो भीषण असमानता के खिलाफ संगठित विचारशीलता और राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक है।

असमानता का हाल यह है कि विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार, केवल 10% जनसंख्या के पास राष्ट्रीय आमदनी का 58% है, जबकि 50% लोगों के पास केवल 15% आमदनी है।

यदि कोई यह बातें बार-बार अहिंसक तरीके से व्यक्त करता है, तो उसे “दिमागी नक्सल” के नाम से पुकारा जाने लगता है।

क्या यह सच है कि हमारा देश केवल शीर्ष 10% लोगों के लिए है? असमानता को कम करने की दिशा में काम करने के बजाय, क्या इन्हें नजरअंदाज कर दिया जाए? यह किस प्रकार का देशप्रेम है, और यह देश के प्रति क्या संदेश देता है?

“दिमागी नक्सल” (जिसे अंग्रेजी में Urban Naxal कहा जाता है) एक राजनीतिक-सामाजिक शब्द है, जिसका उपयोग हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति और सार्वजनिक चर्चा में काफी बढ़ गया है।

सरल शब्दों में इसका अर्थ:

पारंपरिक नक्सलियों या माओवादियों की तरह, जो जंगलों और ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसा के माध्यम से राज्य के खिलाफ संघर्ष करते हैं, ‘दिमागी नक्सल’ या ‘अर्बन नक्सल’ वे लोग हैं जो शहरी क्षेत्रों में रहते हुए—शिक्षा, कला, साहित्य, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), कानून व्यवस्था या मीडिया के जरिए—माओवादी या उग्रवादी विचारधारा को बढ़ावा देते हैं। वे किसी प्रकार की सहानुभूति, विचारधारा का समर्थन या पृष्ठभूमि में लॉजिस्टिक्स उपलब्ध कराते हैं।

हालांकि, इस पर आलोचकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई बार सरकार या व्यवस्था की आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को चुप कराने के लिए इस शब्द का इस्तेमाल एक ‘लेबल’ के रूप में किया जाता है।

दिमागी नक्सलवाद क्या है?

‘दिमागी नक्सल’ कोई हथियार उठाकर हमला नहीं करता। उसका असली हथियार उसकी भाषा, उसकी लेखनी और उसकी कहानी है! यह शब्द उन विचारकों, प्रोफेसरों, वकीलों या मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए प्रयोग किया जाता है, जो कथित तौर पर… शहरों में बैठकर माओवादी विचारधारा का इकोसिस्टम तैयार करते हैं।

इनका काम क्या होता है?

पहला: जंगलों में सक्रिय नक्सलियों को आम जनता और मीडिया के बीच सहानुभूति प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना।

दूसरा: मानवाधिकारों के नाम पर उनके कानूनी मामलों की पैरवी करना और वित्तीय या लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करना।

तीसरा: युवाओं के मन में राज्य और संविधान के प्रति अविश्वास और नफरत की भावना विकसित करना।

लेकिन इस मुद्दे का एक और पहलू भी है, जिसे समझना आवश्यक है। अनेक समाजशास्त्री, पत्रकार और मानवाधिकार विशेषज्ञ मानते हैं कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को अक्सर एक ‘राजनीतिक औजार’ के रूप में उपयोग किया जाता है। जब भी कोई नागरिक, छात्र या पत्रकार सरकार की नीतियों, आदिवासियों के पुनर्वास या कॉर्पोरेट अधिग्रहणों के खिलाफ सवाल उठाता है, तो उसे कई बार ‘दिमागी नक्सल’ या देशद्रोही के रूप में लेबल किया जाता है- ताकि उस व्यक्ति की आवाज़ को दबाया जा सके।

संक्षेप में कहें तो, जंगल का नक्सलवाद यदि देश की सुरक्षा के लिए ‘बंदूक का खतरा’ है, तो दिमागी नक्सलवाद ‘वैचारिक युद्ध’ का रूप ले लेता है।) का हिस्सा माना जाता है।

लेकिन असली चुनौती यह तय करना है कि देश के खिलाफ साज़िश रचने वाले असली दिमागी नक्सल कौन हैं, और लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले सच्चे नागरिक कौन!

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