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सदियों का ऊहापोह कायम है: मनुस्मृति, जाति और आरक्षण पर डॉ. योगेन्द्र की बड़ी टिप्पणी

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डॉ. योगेन्द्र

सुबह टहलने हर रोज़ निकलता हूँ। रास्ते में एक बड़ा बग़ीचा पड़ता है। आम के बड़े-बड़े दरख़्त, कटहल और सागवान। फल या मंज़र का कोई सवाल नहीं, लेकिन कभी कोई अकेली चिड़िया दिखाई पड़ जाती है। मंज़र या अमोरियों के दिनों में कोयल ख़ास तौर से ध्यान खींचती है। अन्य अनजाने पक्षी भी मौज में रहते हैं।

वैसे सावन का महीना है। कभी-कभार आकाश टपक पड़ता है तो दरख़्तों पर हरियाली तारी हो जाती है। पत्ते अक्सर शांत रहते हैं, क्योंकि हवा में वह तेज़ी नहीं है जो अप्रैल, मई और जून में रहती है। लेकिन देश में रफ़्तार है। आरक्षण को लेकर पुरानी बहस फिर सतह पर है। धर्म को लेकर झूठे-सच्चे क़िस्से चल रहे हैं। और कॉकरोच जनता पार्टी का स्कूल ठीक करो अभियान आशा जगाता है।

जाति की सड़ांध अब भी कायम है

जाति की सड़ांध हिन्दू समाज का पीछा नहीं छोड़ रही। हम कितने ही प्रचार करें कि जाति नहीं बची, लेकिन सच यह है कि जाति हिन्दुओं की नस-नस में है।

पुणे में छात्रों की गूँज पर राहुल गांधी ने मनुस्मृति के नवम अध्याय के एक श्लोक का उद्धरण देकर कहा कि पुरुष सत्ता का यह माइंडसेट अभी भी कायम है। इसके बाद तथाकथित बड़े लोग और सवर्ण जाति के लड़के उस मनुस्मृति के बचाव में उतर आए, जो समाज में पुरुषवाद और जातिवाद स्थापित करती है।

संत से बने राजनेता से बहुत उम्मीद रहती है कि कम से कम ऐसे लोग इंसानियत के पक्ष में खड़े होंगे। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे लोग समाज के लिए ज़्यादा ख़तरनाक हैं। ये इंसान के पक्ष में नहीं, जाति के पक्ष में खड़े होते हैं और गैर-बराबरी को स्थापित करने में गर्व अनुभव करते हैं।

मनुस्मृति के दो श्लोक

एक स्त्री के बारे में और दूसरा जाति के बारे में।

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। रक्षन्ति स्थविरे पुत्राः न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति।। (मनुस्मृति, नवम अध्याय, श्लोक-3)

हिन्दी अनुवाद: बाल्यावस्था में स्त्री की रक्षा पिता करता है, यौवनावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है। वह सदा अधीन रहती है, क्योंकि वह स्वतंत्रता के योग्य नहीं है।

दूसरा श्लोक—

उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्यैष्ठ्याद् ब्रह्मणश्चैव धारणात्। सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः।। (मनुस्मृति, प्रथम अध्याय, श्लोक-94)

हिन्दी अनुवाद: ब्रह्मा के उत्तम अंग अर्थात मुख से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण शेष तीनों वर्णों (क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) से बड़े हैं। वे वेद को धारण करने के कारण संसार में सर्वश्रेष्ठ हैं और शेष तीनों वर्णों को उनके विधान का पालन करना चाहिए।

मनुस्मृति और मनुष्यता का सवाल

ऐसे श्लोकों से मनुस्मृति भरी पड़ी है। तब भी कोई उसकी प्रशंसा या बचाव में उतरता है तो उसके माइंडसेट पर संदेह ज़रूर करना चाहिए।

मनुस्मृति सिर्फ़ स्त्री और शूद्र के खिलाफ नहीं है। वह मनुष्यता के खिलाफ एक षड्यंत्र है।

जो लोग यह कहते नज़र आते हैं कि जाति बची नहीं और अब आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए, वही लोग कहीं करणी सेना बनाते हैं, कहीं मैथिल संघ, कहीं ब्राह्मण महासभा और कहीं दूसरी जातीय सभाएँ।

जातीय महासभाएँ क्या बताती हैं?

इसकी प्रतिक्रिया दूसरी तरफ भी होती है। वे भी कुशवाहा महासभा, यादव महासभा, कुर्मी महासभा से लेकर दबी-कुचली जातियों की सभाएँ बनाते हैं।

जाति-सभाएँ दोधारी तलवार हैं। जाति की सुरक्षा के नाम पर बहुत सारे खेल होते हैं। ये सभाएँ ही बताती हैं कि जाति पूरी ताकत के साथ जीवित है। समाज में जातिगत भेदभाव, शोषण और दमन कायम है।

आरक्षण की बहस और सत्ता

सवर्ण जातियों का एक समूह आरक्षण के खिलाफ जंतर-मंतर पर बैठा। उसे समझाने तुरंत उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पहुँच गए। उन्होंने आश्वासन दिया कि ऊपर के नेताओं से बात करेंगे और समस्या का समाधान करेंगे।

नरेंद्र मोदी की सरकार ने आर्थिक आधार पर सवर्ण जातियों को दस प्रतिशत आरक्षण दिया है। जबकि संविधान इसकी इजाज़त नहीं देता। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने से क्या तथाकथित प्रतिभा कुचली नहीं जाएगी? और क्या जाति-दंभ भी कायम नहीं रहेगा?

असली सवाल नौकरियों का है

आश्चर्य यह है कि केंद्र सरकार के मातहत विभिन्न विभागों में लगभग दस लाख पद खाली हैं। ये लोग उन्हें भरने का आंदोलन नहीं कर रहे। इन्हें हर हाल में जाति-वर्चस्व चाहिए, नौकरी नहीं।

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