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क्या 2030 तक दुनिया ख़त्म हो जाएगी? डॉ. योगेन्द्र ने AI, अणु बम और आधुनिक सभ्यता पर उठाए गंभीर सवाल

क्या 2030 तक दुनिया ख़त्म हो जाएगी
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क्या 2030 तक दुनिया ख़त्म हो जाएगी? यह सवाल आज केवल विज्ञान-कथा का हिस्सा नहीं रह गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, परमाणु हथियार, युद्ध और आधुनिक सभ्यता के भविष्य को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। इसी संदर्भ में डॉ. योगेन्द्र ने आधुनिक सभ्यता, गांधी, आइंस्टीन, अणु बम और AI के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।

डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था- आधुनिक सभ्यता के दो महत्वपूर्ण देन हैं- एक गांधी और दूसरे अणु बम।

अणु बम को बनाया अल्बर्ट आइंस्टीन ने और आइंस्टीन ने गांधी के बारे में कहा-“आनेवाले समय में कोई विश्वास नहीं करेगा कि धरती पर हाड़ मांस का ऐसा पुतला हुआ था?”

अब दोनों नहीं हैं- न गांधी, न आइंस्टीन।

उनके बाद की दुनिया हमारे सामने पसरी है।

हाड़- मांस के गाँधी के पुतले संदेह के घेरे में हैं। उन पर वैचारिक हमले भी हो रहे हैं और उनके पुतले गिराये भी जा रहे हैं।

आइंस्टीन का अणु बम कमाल कर रहा है। विश्व अणु बम में अपनी सुरक्षा ढूंढ रहा है। हरेक देश अणु बम बनाने में लगा है। विश्व की सुरक्षा के लिए बम चाहिए, बुद्धि नहीं।

हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु बम का कहर

आइंस्टीन का अणु बम कभी हिरोशिमा-नागासाकी पर बरसाया गया था। पहला बम गिरा हिरोशिमा पर।

तारीख़ थी- 6 अगस्त 1945 और बम का नाम था- लिटिल बॉय। बम का नाम था लिटिल बॉय, लेकिन इस लिटिल बॉय ने हिरोशिमा को क्षण भर में राख कर दिया। लोग चीख भी नहीं सके और वे पिघल गये। तिल तिल कर मरे। हर तरफ तबाही का मंजर।

आधुनिक सभ्यता के नख, दंत और पंजे मानव को लहूलुहान कर रहे थे।

अमेरिका इससे भी संतुष्ट नहीं हुआ। 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर बम गिराया। बम का नाम था फैट मैन। नतीजा हुआ कि नागासाकी रो भी नहीं सका और धूल में मिल गया। आज भी हिरोशिमा-नागासाकी में बच्चे लूले-लंगड़े और अंधे पैदा होते हैं।

हम इतिहास से कुछ नहीं सीखते?

हम इतिहास से कुछ नहीं सीखते। पढ़ने-लिखने से क्या होता है? किताबों में ज्ञान है और बाहर हिंसा, रक्तपात और नफरत की आँधी है।

पढ़ी-लिखी दिव्या श्रीवास्तव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से सवाल पूछ दिया। लफ़ंगों ने उसे घेर लिया, डराया धमकाया और उसे नौकरी से निकाल दिया।

अज्ञानियों ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया है।

सत्ता के सामने आदमी की अभी कोई औक़ात नहीं है।

हिरोशिमा पर बम गिराने को लेकर क्या कहा गया?

जानते हैं हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराने के पूर्व अमेरिकी सेनाध्यक्ष ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन से कहा-“जापान खुद सरेंडर कर रहा है। उस पर बम गिराने की कोई जरूरत नहीं है।”

राष्ट्रपति ट्रुमैन ने सेनाध्यक्ष को कहा-“तुम बम गिराओ। मुझे बम का असर देखना है। बम गिराने के बाद आखिर होता क्या है?”

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रुमैन कोई अज्ञानी तो था नहीं। वह जानता था कि बम गिराने से लोग मरेंगे, लेकिन उसे बम का असर देखना था। लोग मरे या जीये- उससे कोई मतलब नहीं था।

गांधी पीछे छूटे, अणु बम वाली सभ्यता आगे बढ़ी?

आइंस्टीन की बम वाली सभ्यता चल निकली है, गांधी तो कहीं दूर छूट गये।

ब्रिक्स सम्मेलन में चीन के जिनपिंग भी हैं, रूस के पुतिन भी और ईरान के पेजेश्कियान भी। इसके अलावे भी कई देश के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति हैं। वे साथ मिल कर हँसते हैं, बोलते हैं। खाते-पीते और सैर-सपाटे करते हैं, लेकिन हरेक के हाथ में कटार है।

मनुष्य सभ्यता कितनी पतित हो गई है कि वह बात करेगी शांति और सौहार्द की, लेकिन व्यवहार में वह हिंसा और ख़ून खराबा करेगी।

पुतिन यूक्रेन के साथ मारकाट कर रहा है, जिनपिंग भारत की सीमा लूटने के लिए तैयार है और पेजेश्कियान कह रहे हैं कि वे इज़रायल के नेतन्याहू के सामने झुकने वाले नहीं हैं।

आदमखोरों की जमात क्यों इकट्ठे होते हैं, वे जानें, लेकिन उनके हाथ ख़ून से रंगे हैं और विश्व को वे क़तई सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकते।

हथियार, बाजार और वैश्विक राजनीति

दरअसल सभी लोग एक दूसरे को ठगना चाहते हैं। उनको आदमी की रक्षा-सुरक्षा से कोई मतलब नहीं। वे एक दूसरे को तौलते हैं कि कौन कितने पानी में है? और किसका कितना टेटुआ दबाया जा सकता है।

किसी को हथियार बेचना है, किसी को कच्चा माल चाहिए। कोई आपके बाज़ार पर क़ब्ज़ा जमाना चाहता है।

करोड़ों फूँकने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूरी है कि जिस जिनपिंग को लाल-लाल आँखें दिखाना चाहते थे, वे उनके लिए लाल कारपेट बिछा रहे हैं।

भारत को सभी के सामने अपने अहंकार और भव्यता का प्रदर्शन करना था, इसलिए भारत मंडपम् बना।

क्या AI आधुनिक सभ्यता के लिए नया खतरा है?

खैर, यह सब ढोंग-ढकोसला तो चलता रहेगा, लेकिन क्या आइंस्टीन वाली आधुनिक सभ्यता दुर्घटनाग्रस्त होनेवाली है?

यह सवाल इसलिए भी विचारणीय है कि एक 27 साल के AI रिसर्चर जैकब कॉक्सन ने AI कंपनी एंथ्रोपिक से इस्तीफा देने के बाद X के एक पोस्ट में कहा है कि AI बनाने वाले लोग यह मानते हैं कि 2030 के अंत तक AI दुनिया को ख़त्म कर सकती है।

जैकब ने चेतावनी देते हुए कहा है कि इस तकनीक की ताकत को कम मत आंकिए। ये जल्द ही ऐसे ‘सुपरह्यूमन’ सिस्टम बन जाएंगे।

महर्षि अरविंद ने सुपरमैन की कल्पना की थी और अब हमारे सामने AI का सुपरह्यूमन है।

आइंस्टीन को अंतिम समय में अपनी थ्योरी से बने बम पर अफ़सोस हो रहा था और गांधी को आधुनिक सभ्यता के बेरोटा पिस्तौल की गोलियों ने जान ले ली थी।

आगे आने वाले दिन में हम मृत्यु का उत्सव मनाएँगे या आधुनिक सभ्यता की लाश पर फूल चढ़ायेंगे?

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