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चलनी दूसे सूपा को: डॉ. योगेन्द्र ने प्रधानमंत्री, बेरोजगारी और लोकतंत्र पर उठाए सवाल
चलनी दूसे सूपा को
सुबह जगा तो अचानक एक गाने के बोल बजने लगे- ‘ तुम्हें देखती हूँ तो लगता है ऐसे , कि जैसे युगों से तुम्हें जानती हूँ ।’ नीम अँधेरा ही था। बिजली अँधेरे को तोड़ रही थी । आसमान में हल्के बादल थे। ठंड वातावरण पर उतरने लगी है । देर तक यह बोल मेरे अंदर कायम रहा। युगों से कोई किसी को जान सकता है? क्या कोई ऐसी संभावना है? क़सम आदि खाने या प्रभाव क़ायम करने के सिलसिले में ऐसी बात कही जाय, तो क्षम्य है। भावुकता भरे क्षणों में आदमी पता नहीं, क्या क्या कहता रहता है, जब नींद खुलती है तो खालिस सपने को लहूलुहान देखता है।
आदमी तो अपने युग को नहीं जान पाता, युगों युगों को क्या जानेगा? जिस युग में हम सब हैं, क्या इसे हम जान पा रहे हैं? प्रधानमंत्री ग़ुस्से में हैं । भाषण और भाषा में गर्मी है। वे बहकते जा रहे हैं । ‘ऐसे प्रधानमंत्री नहीं बनोगे, वैसे प्रधानमंत्री नहीं बनोगे’ – प्रधानमंत्री बक रहे हैं । आप कैसे प्रधानमंत्री बन गए थे? याद कीजिए । आदमियत शेष है तो ईमानदारी से जवाब दीजिए । आपने झूठे वादे कर देशवासियों के साथ धोखा नहीं किया? अभी भी क्या कर रहे हैं? प्राइवेट गुंडों को प्रदर्शन में भेजना- इसमें कौन सी नैतिकता है? हो सकता है कि आपने नहीं भेजा हो, लेकिन उसे कोई सजा नहीं हो रही। पुलिस के साथ जुगलबंदी चल रही है । आप प्रधानमंत्री हैं । आँखें हैं ही। फिर ऐसे लफ़ंगों पर नकेल क्यों नहीं कस रहे? चूँकि आप नकेल नहीं कस रहे हैं , फिर यह बात क्यों नहीं कही जाए कि आपके पाले हुए गुंडे हैं ।
आप देश चला नहीं रहे। मैं देश नहीं बिकने दूँगा – कहने से देश नहीं बिका? बैंक, रेल, भेल , सेल, हवाई अड्डे, सरकारी जमीनें। कहाँ जाकर रूकेंगे? आपको गुस्साना है तो खुद पर गुस्साइए । विश्व में आपकी अर्थव्यवस्था पांचवें स्थान पर है। गले में ढोल बाँध लीजिए और पीटिए। करोड़ों बेरोज़गार युवकों के गले में भी लटका दीजिए । कुपोषित बच्चों को भी लाइन में लगाइए। उनके हाथ में कटोरा थमाइए और राम मंदिर के सामने बैठा दीजिए । दाता दानी आयेंगे । कटोरा में कुछ डाल दीजिए । आप हजार करोड़ का हवाई जहाज़ लेकर बचे खुचे देश घूम आइए । प्रधानमंत्री जी, चिंता करनी है तो अपनी कीजिए । कुर्सी कभी स्थायी रही है क्या? आज है, कल ग़ायब ।
19 वर्षीया अंकिता भंडारी के साथ क्या क्या न हुआ? उसके माँ बाप सड़क पर बैठे । आपकी पुलिस उठा ले गयी । आप उसे बुला कर बात नहीं कर सकते थे? आरोपी को राज्यपाल बनाने की इतनी हड़बड़ी क्यों थी? लोकतंत्र संवाद से चलता है। आप युवाओं से बात कर सकते थे। उनकी समस्याओं को सुन सकते थे, लेकिन लाठी भाँज रहे हैं । लड़कियों को पटक रहे हैं, पीट रहे हैं । आपको इतना भी याद नहीं है कि देश में लोकतंत्र है।
वादे करते हैं और मुकरते हैं । फिर एक नया वादा करते हैं । प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ कर झूठ बोलना कौन सी नैतिकता है। कांग्रेस को सीख मत सिखाइए । वह ग़लत करेगी । जनता उसे सिखाएगी । आप खुद को सिखाइए और खुद से पूछिए कि आपने ऐसा कौन सा तीर मार लिया है कि देश आपका स्वागत करे?
