Vimarsh News
Khabro Me Aage, Khabro k Pichhe

वार्ता की सहमति के बाद भी नहीं हुई मुलाकात, आउटसोर्सिंग कर्मियों के मुद्दों पर जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय प्रशासन से महासंघ नाराज

JWU Image
0 6

JWU Image
JWU Image

झारखण्ड राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ ने जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय प्रशासन के रवैये पर गहरी नाराजगी एवं क्षोभ व्यक्त किया है। महासंघ के प्रतिनिधियों के अनुसार, विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. एला कुमार द्वारा दिनांक 30.10.2026 को ई-मेल के माध्यम से सहमति प्रदान किए जाने के बाद दिनांक 02.11.2026 को पूर्वाह्न 11:00 बजे विश्वविद्यालय के सिदगोड़ा परिसर में महासंघ के प्रतिनिधियों के साथ वार्ता निर्धारित की गई थी। इसके बावजूद आज निर्धारित समय पर न तो कुलपति वार्ता के लिए उपस्थित हुईं और न ही बैठक स्थगित किए जाने अथवा उनकी अनुपलब्धता के संबंध में महासंघ को कोई पूर्व सूचना दी गई।

कुलपति द्वारा ई-मेल के माध्यम से वार्ता की सहमति दिए जाने के बावजूद विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर महासंघ के प्रतिनिधियों को प्रवेश करने से रोकने का प्रयास किया गया। विश्वविद्यालय के सुरक्षा पर्यवेक्षक श्री निरंजन पाण्डेय द्वारा प्रतिनिधियों को यह कहते हुए रोका गया कि ऐसा करने का आदेश कुलसचिव, डॉ. सलोमी कुजूर का है।

एक ओर कुलपति द्वारा स्वयं ई-मेल के माध्यम से वार्ता की सहमति दी गई थी और उक्त ई-मेल में कुलसचिव डॉ. सलोमी कुजूर को भी प्रतिलिपि (Forward/CC) के माध्यम से सूचित किया गया था, वहीं दूसरी ओर मुख्य द्वार पर सुरक्षा पर्यवेक्षक द्वारा कुलसचिव के आदेश का हवाला देकर महासंघ के प्रतिनिधियों को रोका जाना विश्वविद्यालय प्रशासन के भीतर गंभीर संवादहीनता एवं विरोधाभासी कार्यप्रणाली को दर्शाता है।

प्रॉक्टर डॉ. सुधीर कुमार साहू परिसर में उपस्थित थे। प्रतिनिधियों द्वारा उनसे इस संबंध में संवाद स्थापित करने एवं स्थिति स्पष्ट करने का अनुरोध किया गया, लेकिन उन्होंने किसी भी प्रकार का संवाद अथवा संचार करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।

इतना ही नहीं, जब महासंघ के प्रतिनिधियों ने कुलसचिव डॉ. सलोमी कुजूर से संपर्क कर ई-मेल एवं निर्धारित वार्ता के संबंध में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया, तो उन्होंने इस संबंध में किसी प्रकार की जानकारी होने से स्पष्ट इनकार कर दिया। जबकि कुलपति द्वारा महासंघ को भेजे गए ई-मेल में कुलसचिव को भी प्रतिलिपि भेजी गई थी। महासंघ के प्रतिनिधियों द्वारा दूरभाष के माध्यम से भी उनसे संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।

यह अत्यंत विचित्र एवं विरोधाभासी स्थिति है कि कुलपति की सहमति से निर्धारित वार्ता की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक ई-मेल के माध्यम से भेजे जाने के बावजूद विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर प्रतिनिधियों को रोका जाता है, प्रॉक्टर संवाद से इनकार करते हैं और कुलसचिव जानकारी होने से ही इनकार कर देती हैं। आखिर विश्वविद्यालय प्रशासन में आपसी समन्वय एवं जवाबदेही की स्थिति क्या है?

कुलपति के साथ वार्ता के लिए केवल निम्नलिखित तीन विषय निर्धारित किए गए थे, जिनकी जानकारी पूर्व में ही कुलपति को दे दी गई थी:

  1. श्री रंजीत कुमार राय एवं श्री जय किशोर प्रसाद का स्थानांतरण: दोनों कर्मचारियों द्वारा अपनी समस्याओं के निराकरण हेतु सामूहिक रूप से पत्र समर्पित किए जाने के बाद उनका स्थानांतरण किया जाना प्रथम दृष्टया प्रतिशोधात्मक कार्रवाई प्रतीत होता है। यह कार्रवाई उनके Natural Rights एवं सेवा संबंधी हितों को प्रभावित करती है। महासंघ इसी विषय पर विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष जानने एवं न्यायोचित समाधान की मांग करने के लिए वार्ता करना चाहता था।
  2. वित्त विभाग द्वारा फरवरी 2026 में निर्गत मैन-मंथ रेट (Man-Month Rate) संबंधी आदेश का अनुपालन: झारखण्ड सरकार के वित्त विभाग द्वारा निर्गत आदेश का विश्वविद्यालय में अब तक अनुपालन नहीं किए जाने तथा इससे संबंधित कर्मियों को देय लाभ सुनिश्चित करने के विषय पर चर्चा प्रस्तावित थी।
  3. झारखण्ड मैनपावर प्रोक्योरमेंट (आउटसोर्सिंग) मैनुअल, 2025 का अनुपालन: विश्वविद्यालय में कार्यरत आउटसोर्सिंग कर्मियों को छह दिवसीय कार्य सप्ताह वाले विभागों के लिए निर्धारित 18 दिनों के अवकाश की सुविधा उपलब्ध कराने तथा उक्त मैनुअल में निर्धारित वैधानिक एवं प्रक्रियात्मक प्रावधानों के अनुरूप आउटसोर्सिंग एजेंसी द्वारा कार्य सुनिश्चित कराने के संबंध में वार्ता प्रस्तावित थी।

ये तीनों विषय कर्मचारियों के सेवा संबंधी अधिकारों, कार्य परिस्थितियों एवं न्यायोचित मांगों से जुड़े हुए हैं। महासंघ ने जानबूझकर वार्ता का दायरा केवल इन तीन विषयों तक सीमित रखा था, ताकि विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ सकारात्मक एवं सार्थक संवाद के माध्यम से समाधान निकाला जा सके।

विश्वविद्यालय प्रशासन के इस पूरे रवैये पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि पहले कर्मचारियों की सामूहिक समस्याओं को उठाने पर स्थानांतरण जैसी कार्रवाई किए जाने का मामला सामने आता है और अब कुलपति की सहमति से निर्धारित वार्ता के लिए आने वाले कर्मचारी प्रतिनिधियों को विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर रोकने का प्रयास किया जाता है। यह घटनाक्रम विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली, संवाद के प्रति उसकी प्रतिबद्धता तथा कर्मचारियों के प्रतिनिधियों के प्रति उसके व्यवहार पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

किसी भी विश्वविद्यालय का प्रशासनिक पद केवल अधिकारों के प्रयोग का माध्यम नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता एवं संवाद की जिम्मेदारी भी लेकर आता है। कुलपति द्वारा वार्ता की सहमति देने के बाद स्वयं अनुपस्थित रहना, कोई पूर्व सूचना नहीं देना तथा दूसरी ओर विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों द्वारा महासंघ के प्रतिनिधियों के साथ संवाद से इनकार करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। इसे किसी भी स्थिति में स्वस्थ प्रशासनिक परंपरा नहीं कहा जा सकता। कुलपति एवं विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे घटनाक्रम पर स्थिति स्पष्ट की जाए तथा पूर्व निर्धारित तीनों विषयों पर वार्ता के लिए शीघ्र नई तिथि निर्धारित की जाए। साथ ही भविष्य में महासंघ के अधिकृत प्रतिनिधियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार न हो तथा विश्वविद्यालय प्रशासन संवाद एवं लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सम्मान करे।

महासंघ ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों के नैसर्गिक एवं वैधानिक अधिकारों की रक्षा तथा उनके न्यायोचित हितों के लिए आवाज उठाना महासंघ की जिम्मेदारी है। प्रशासनिक दबाव, संवादहीनता अथवा इस प्रकार के व्यवहार से महासंघ अपने दायित्वों से पीछे हटने वाला नहीं है। महासंघ कर्मचारियों के हितों से जुड़े इन विषयों को उचित प्रशासनिक एवं वैधानिक मंचों पर उठाता रहेगा।

नोट: हालांकि, इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष नहीं लिया जा सका है। विश्वविद्यालय का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समाचार में शामिल किया जाएगा।

Leave a comment