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Swami Ramdev Book Controversy: स्वामी रामदेव पर लिखी किताब को लेकर विवाद, पटना हाईकोर्ट ने पब्लिशर के खिलाफ केस किया खारिज
Swami Ramdev Book Controversy: पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी धार्मिक गुरु या आध्यात्मिक नेता की कथित मानहानि से आहत हो जाने पर उनके अनुयायी को मानहानि के आपराधिक मुकदमे को दायर करने का अधिकार नहीं मिलता। मानहानि का मुकदमा केवल वही व्यक्ति कर सकता है, जो वास्तव में उस अपराध का शिकार हुआ हो।
न्यायाधीश आलोक कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने स्वामी रामदेव की जीवनी ‘गॉडमैन टू टाइकून: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ स्वामी रामदेव’ के प्रकाशक जैगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ दर्ज आपराधिक शिकायत को रद्द करते हुए यह निर्णय सुनाया।
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के अनुयायी या शिष्य होने के आधार पर उसे अपने गुरु की कथित मानहानि के मामले में अभियोजन का अधिकार नहीं मिल जाता। इसके लिए आवश्यक है कि शिकायतकर्ता स्वयं उस कथित मानहानिकारक टिप्पणी से प्रभावित हुआ हो। मामले में, वैशाली के अमित कुमार ने खुद को स्वामी रामदेव का अनुयायी बताया।मी रामदेव का अनुयायी बताते हुए वर्ष 2017 में शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत में यह आरोप लगाया गया कि पुस्तक में स्वामी रामदेव के जीवन और उनके कार्यों को इस तरह से दर्शाया गया है कि इससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है।
पुस्तक में उन्हें तीन आध्यात्मिक व्यक्तियों की मृत्यु के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी ठहराया गया है, साथ ही उनके पहनावे पर भी आपत्ति उठाई गई।
धार्मिक भावनाओं की ठेस पहुंचाने का आरोप भी लगाया गया है
शिकायतकर्ता का कहना है कि इस पुस्तक के कारण उनकी और स्वामी रामदेव के अन्य अनुयायियों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। हाजीपुर में स्थित ट्रायल अदालत ने प्रकाशक के खिलाफ आईपीसी की धाराएँ 295-ए, 500, 501 और 502 के तहत संज्ञान लेते हुए समन जारी किया है।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 199(1) के अंतर्गत मानहानि के मामलों में पीड़ित की शिकायत का होना अनिवार्य है।
अतः, जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में राज्य या केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति लेना जरूरी है।
इस मामले में ऐसी अनुमति प्राप्त नहीं की गई थी। इसके अलावा, शिकायत में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया था कि पुस्तक में किस धार्मिक विश्वास का जानबूझकर अपमान किया गया है।
अदालत ने यह निर्णय लिया कि अभियोजन आवश्यक कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करता है। परिणामस्वरूप, 7 और 9 अक्टूबर 2017 के संज्ञान आदेशों सहित संबंधित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया गया।
