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Bihar में Govt Doctors की प्राइवेट प्रैक्टिस खत्म! अस्पताल ड्यूटी पर फोकस, नीतीश govt की हाईलेवल कमेटी

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बिहार (Bihar) की राजनीति में स्वास्थ्य के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कदम उठाया गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सरकारी डॉक्टरों (Govt Doctors) की निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने की जो घोषणा समृद्धि यात्रा के दौरान की थी, अब वह सिर्फ एक घोषणा नहीं रही, बल्कि इसके कार्यान्वयन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। इस दिशा में स्वास्थ्य विभाग ने एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जिसका उद्देश्य इस विषय पर नीति बनाना है। कहने का मतलब यह है कि सरकार अब सफेद कोट के साथ अनुशासन को लागू करने के लिए अपने कदम बढ़ा रही है।

स्वास्थ्य विभाग ने एक छह सदस्यीय समिति का गठन किया है, जिसकी अगुवाई निदेशक प्रमुख (नर्सिंग एवं रोग नियंत्रण) डॉ. रेखा झा करेंगी। इस समिति में पीएमसीएच के अधीक्षक, एनएमसीएच के प्राचार्य, बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ के अध्यक्ष डॉ. के. के. मणी, महासचिव डॉ. रोहित कुमार, और आईजीआईएमएस के नेत्र रोग विभाग के प्रमुख डॉ. विभूति प्रसाद सिंह भी शामिल हैं। इस निर्णय से स्पष्ट है कि सरकार ने इसे केवल एक औपचारिक आदेश नहीं माना, बल्कि इसमें डॉक्टरों की भागीदारी को प्रमुखता दी है, जिससे यह नीति अधिक प्रभावी और सामूहिक दृष्टिकोण से बनी है।

निर्णय ‘सात निश्चय-3’ के एजेंडे के अंतर्गत

नीतीश सरकार का यह निर्णय ‘सात निश्चय-3’ के एजेंडे के अंतर्गत लिया गया है, जिसका उद्देश्य सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना है। सरकार का मानना है कि जब सरकारी डॉक्टर निजी क्लीनिकों और नर्सिंग होमों में व्यस्त होते हैं, तब सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सहायता नहीं मिल पाती। इस नीति के माध्यम से सरकारी अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है।

स्वास्थ्य विभाग के आदेश में यह उल्लेख किया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं को सुधारने के लिए डॉक्टरों को विशेष प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसका मतलब यह है कि एक ओर प्राइवेट प्रैक्टिस पर सख्त नियम लागू होंगे, जबकि दूसरी ओर सरकारी योजनाओं में काम करने वालों के लिए इंसेंटिव प्रदान किए जाएंगे।

राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय सरकार की सोच को स्पष्ट करता है कि वह स्वास्थ्य सेवा को व्यवसाय के रूप में नहीं, बल्कि सेवा के रूप में देखना चाहती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि डॉक्टरों के बीच यह नीति कितनी लोकप्रियता हासिल करती है और क्या यह वास्तव में सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाने में सफल हो पाती है।

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