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Bihar Politics: Nitish kumar के नेतृत्व पर बहस; स्वास्थ्य, ‘Dummy CM’ आरोप और शासन की समीक्षा की मांग
बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish kumar) को लेकर एक बार फिर तीखी बहस सामने आई है। सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक/सार्वजनिक विमर्शों में उनके स्वास्थ्य और निर्णय क्षमता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी क्रम में मांग की जा रही है कि मुख्यमंत्री के स्वास्थ्य की जांच कराई जाए और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि मतदाताओं को नेतृत्व की स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी मिल सके।
‘जनादेश के बावजूद’ नेतृत्व पर सवाल क्यों?
आलोचकों का कहना है कि चुनावी जनादेश मिलने के बाद भी शासन प्रमुख की सक्रियता और सार्वजनिक व्यवहार को लेकर जो चर्चाएं चल रही हैं, उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुछ लोगों का तर्क है कि लोकतंत्र में जनता को यह अधिकार है कि वह जान सके कि सरकार का शीर्ष नेतृत्व प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाने की स्थिति में है या नहीं।हालांकि, समर्थक पक्ष यह भी कहता रहा है कि सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई है और मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का निर्णय संवैधानिक/राजनीतिक प्रक्रियाओं के दायरे में होता है। ऐसे में स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आधिकारिक मेडिकल जानकारी और संस्थागत प्रक्रिया जरूरी मानी जाती है।
‘कठपुतली’ और निहित स्वार्थ के आरोप
विमर्श में एक बड़ा आरोप यह भी उभरता है कि नीतीश कुमार को सामने रखकर वास्तविक शासन कुछ अन्य समूह चला रहे हैं। इनमें सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर के हित-समीकरण, नौकरशाही के एक हिस्से की भूमिका और कुछ नेताओं/व्यवसायिक हितों की चर्चा की जाती है।इस संदर्भ में जद(यू) नेता अशोक चौधरी का नाम भी बहस में लिया जाता है। आरोपों का हवाला देते हुए कहा जाता है कि उनके खिलाफ पूर्व में जमीन/संपत्ति से जुड़े आरोप सार्वजनिक मंचों से लगाए गए, लेकिन उन पर जांच की मांगें राजनीतिक विमर्श तक सीमित रह गईं। (यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आरोप सिद्ध होना और जांच/कार्रवाई होना अलग प्रक्रिया है।)
भाजपा के लिए ‘रणनीतिक मजबूरी’ वाली चर्चा
कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी कहते हैं कि भाजपा के लिए नीतीश कुमार अगले चुनावी पड़ाव तक एक “रणनीतिक सहारा/समीकरण” हो सकते हैं, जबकि अन्य लोग इसे “राजनीतिक खेल” की तरह देखते हैं। दूसरी तरफ, भाजपा-जद(यू) गठबंधन के समर्थक इसे स्थिर सरकार और प्रशासनिक निरंतरता का तर्क देकर सही ठहराते हैं।
महिला सशक्तिकरण: नीतीश शासन की बड़ी उपलब्धियों का पक्ष
नीतीश कुमार के शासनकाल की चर्चा में महिला सशक्तिकरण को उनकी प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाता रहा है। आलोचक भी मानते हैं कि 2010 के बाद कई नीतिगत कदमों से महिलाओं की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी बढ़ी। प्रमुख बिंदु इस प्रकार बताए जाते हैं:पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए [50\%] आरक्षण का प्रावधानछात्राओं के लिए साइकिल/छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं का विस्तारराज्य सरकार की नौकरियों में महिलाओं को [35\%] आरक्षण (नीतिगत निर्णय के तौर पर)महिला मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का विस्तारइसी क्रम में हाल के समय में महिलाओं के लिए प्रोत्साहन राशि जैसी घोषणाएं/योजनाएं भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रही हैं, जिसे समर्थक वर्ग महिला वोटबेस को मजबूत करने वाली नीति के रूप में देखता है।
मांग: शासन की समीक्षा और स्वास्थ्य पर पारदर्शिता
विमर्श का निष्कर्ष यही सामने आता है कि एक ओर शासन की उपलब्धियों—खासतौर पर महिला सशक्तिकरण—को रेखांकित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर नेतृत्व की सक्रियता/स्वास्थ्य और “कौन चला रहा है शासन” जैसे सवालों पर पारदर्शिता की मांग तेज हो रही है।राजनीतिक रूप से यह मुद्दा आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है, क्योंकि स्वास्थ्य, नेतृत्व और प्रशासनिक नियंत्रण—तीनों ही विषय सीधे मतदाता के भरोसे और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़े हैं।
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