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Delhi Assembly Election: धूल भरी गलियों की खाक छानते केजरीवाल की जीत पर कांग्रेस का पहरा

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rajiv ranjan nag

  • राजीव रंजन नाग, वरिष्ठ पत्रकार

Delhi Assembly Election: पूरे देश की निगाहें राष्ट्रीय राजधानी की नई दिल्ली” सीट पर टिक गई है। यहां से ईमानदारी के लिए रेमन मेगसासे अवार्ड से नवाजे गए पूर्व नौकरशाह से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल चौथी दफा चुनाव लड़ रहे हैं। दस साल पहले अंतराष्ट्रीय आइकन के तौर पर देश और दुनिया में उभरे केजरीवाल को इस दफा सफेदपोशों की लुटियंस क्षेत्र में त्रिकोणीय मुकाबला का सामना करना पड़ रहा है। इस बार उनके सामने दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटों से मुकाबला है।

कांग्रेस के संदीप दीक्षित और भाजपा के परवेश वर्मा दोनों ही लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं और वे युवा तेवर लिए अनुभवी राजनेता हैं। संदीप अपनी मां शीला दीक्षित के दिल्ली पर तीन कार्यकाल की विरासत और राजधानी की राजनीति पर उनकी छाप को याद दिला रहे हैं ।
नयी दिल्ली सीट को दिल्ली की सत्ता का केंद्र माना जाता है। नयी दिल्ली सीट पर सरकारी कर्मचारियों की संख्या लगभग 20 फीसदी से ज्यादा है। यहां की राजनीति में बाबुओं की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रहती है।
पिछले तीन चुनाव में आम आदमी पार्टी के मुफ्त बिजली और पानी के वादे के कारण सरकारी कर्मचारियों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया था। लेकिन दिल्ली चुनाव के बीच केंद्र सरकार ने 8वें वेतन आयोग के गठन का ऐलान से भाजपा प्रत्याशी परवेश वर्मा फायदा हो सकता है। सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना को लागू करने की मांग के मद्देनजर केंद्र सरकार नयी पेंशन योजना लेकर आयी है। ऐसे में इस बार सरकारी कर्मचारियों के लिए 8 वें वेतन आयोग की घोषणा का असर चुनाव पर दिखने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “आप” को “आप-दा” बता चुके हैं।

संदीप दीक्षित अपनी मां द्वारा सवांरी गई “साडा दल्ली” अपनी दिल्ली के बलबूते चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले चुनावों में कांग्रेस जहां तीसरे नम्बर की पार्टी थी वही इस दफा निवर्तमान मुख्यमंत्री केजरीवाल के लिए वही पार्टी सिरदर्द बन गयी है। विकासवादी मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित केजरीवाल की तरह ही गैर सरकारी संगठन (NGO) के रास्ते राजनीति में आए हैं। संदीप के पास मां शीला दीक्षित का विकास है, जबकि वर्मा अपने पूर्व मुख्यमंत्री पिता साहिब सिंह वर्मा के विरासत के जरिए राजनाति में हैं। शीला दीक्षित यह सीट जीत कर मुख्यमंत्री तक पहुंची थीं। बीते तीन दशक से नई दिल्ली का यह चुनाव क्षेत्र मुख्यमंत्री चुनता रहा है। लिहाजा इसे वीवीआईपी सीट मानी जाती है।

अपने 15 साल के कार्यकाल के दौरान, शीला दीक्षित को दिल्ली को उसके जटिल शासन तंत्र के बावजूद एक “विश्व स्तरीय शहर” में बदलने का श्रेय दिया जाता है। ,” तीन बार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित ने कहा “जब भी लोग विकसित और बढ़ती दिल्ली की बात करते हैं, तो शीला जी का नाम याद किया जाता है।“

दिल्ली के पूर्व एलजी विजय कपूर कहते हैं -वह दिल्ली की अनूठी स्थिति के बावजूद केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बनाने में सक्षम थीं। पूर्व एलजी कपूर ने कहा कि दिल्ली में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को पूरा करना हमेशा से जटिल रहा है क्योंकि इसमें कई एजेंसियां शामिल हैं। उन्होंने कहा, “लेकिन, दीक्षित ने चतुराई से काम पूरा किया। ”

दीक्षित का बुनियादी ढांचा उनके प्रमुख फोकस क्षेत्रों में से एक था। दिल्ली की पहली मेट्रो लाइन – 2002 में शाहदरा और तीस हजारी के बीच – का उद्घाटन और आगे के विस्तार ने शहर में लोगों के आवागमन के तरीके को बदल दिया। “दिल्ली मेट्रो के लिए, उन्होंने सभी अधिकारियों को हर संभव तरीके से मदद करने का निर्देश दिया। दिल्ली के एक पूर्व मुख्य सचिव कहते हैं- तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने बारापुला फ्लाईओवर के निर्माण का विरोध किया था। अंबिका सोनी ने भी इस परियोजना पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि इससे हुमायूं के मकबरे का दृश्य प्रभावित होगा। लेकिन, दीक्षित ने उन्हें मना कर एक रास्ता निकाला।

दीक्षित के कार्यकाल के दौरान लगभग 65 फ्लाईओवर बनाए गए थे। एम्स, धौला कुआं, आउटर रिंग रोड और बारापुला में फ्लाईओवर की परिकल्पना दीक्षित के कार्यकाल के दौरान की गई थी। इसके बाद 2010 के राष्ट्रमंडल खेल के लिए दीक्षित ने दिल्ली के कायाकल्प का बीड़ा उठाया, जिसमें IGI एयरपोर्ट का आधुनिकीकरण भी शामिल था।

पूर्व मुख्य सचिव पीके त्रिपाठी के अनुसार, सड़कों के निर्माण का विचार दीक्षित ने 2010 के खेलों के दौरान पेश किया था। त्रिपाठी ने कहा कि दीक्षित तब भी दृढ़ रहीं, जब उन्हें हर तरफ से आलोचना का सामना करना पड़ा। त्रिपाठी राष्ट्रमंडल खेलों के समय प्रधान सचिव भी थे। त्रिपाठी याद करते हैं -2010 का राष्ट्रमंडल खेल वित्तीय अनियमितताओं में उलझा रहा, जिसने शीला दीक्षित के अंतिम कार्यकाल को कमजोर कर दिया।

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दिल्ली में लगभग 32 लाख यात्रियों के दैनिक सार्वजनिक परिवहन शीला दीक्षित सरकार द्वारा खरीदी गई लगभग 5,500 बसों द्वारा पूरा किया गया। क्लस्टर बस योजना और ऑटो-रिक्शा और बसों को सीएनजी में बदलना सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार था, लेकिन दीक्षित कड़े प्रतिरोध के बावजूद अपने फैसले पर कायम रहीं। कुछ दिनों बाद उन्होंने सीएनजी पर शिफ्टिंग को मंजूरी दे दी।” ये कुछ उपलब्धियां हैं जो संदीप दीक्षित की दावेदारी को मजबूत करती हैं।

नौकरशाही से राजनीति में आए केजरीवाल ने इस बार फिर अपना चुनावी शुरुआत मध्य दिल्ली के उसी वाल्मीकि मंदिर में पूजा-अर्चना से की, जिसका वे 2013 से प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और उन्होंने चुनावी राजनीति की शुरुआत इसी मंदिर में पूजा अर्चना कर की थी। यह मंदिर केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (आप) के लिए बहुत प्रतीकात्मक महत्व रखता है क्योंकि यहीं से उन्होंने 2013 में अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की थी।

दिल्ली की राजनीति में एक ”बिग किलर” के रूप में उभरे केजरीवाल कांग्रेस की दुर्जेय शीला दीक्षित को हरा कर मुख्यमंत्री के रूप में उनके तीन कार्यकाल के शासन को समाप्त कर दिया। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में वाल्मीकि समुदाय ने अपने को “आप” से जोड़ा है। वाल्मीकि समुदाय पारंपरिक रूप से सफाई के कामों से जुड़ा रहा है और आप के पार्टी चिह्न “झाड़ू” से भी उनका व्यवासायिक जुड़ाव है।

10 साल की सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों के कारण अपने 12 साल की राजनीतिक करियर में केजरीवाल और आप को इस बार दिल्ली में अपने सबसे कठिन चुनाव का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें धूल भरी गलियों की खाक छाननी प़ड़ रही है और अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए लगातार पोपुलिस्ट वादे और घोषणायें करनी पड़ रही है। उन्हें शीश महल पर सफाई देनी पड़ रही है। केजरीवाल को और उनकी पार्टी को सत्ता विरोधी रुझान का भी सामना करना पड़ रहा है।

राजनीतिक ईमानदारी का भरोसा देकर अन्ना हजारे की नाराजगी के बावजूद राजनीति में आए केजरीवाल और उनकी सरकार गंभीर आरोपों से घिरी हुई है। शराब घोटाले के आरोप में उन्हें जेल जाना पड़ा था । वह जमानत पर हैं। भ्रष्टाचार के इन आरोपों के कारण जनता में उनकी इमेज धूमिल हुई है। उन्हें व उनकी पार्टी को अनेक मोर्चों पर बचाव की स्थिति का समना करना पड़ रहा है। सत्ता विरोधी रुझान के कारण आप पार्टी के कई नेताओं को टिकट काटना पड़ा है और कईयों को अपना चुनाव क्षेत्र बदलना पड़ा है। मनीष सिसोदिया इसके खास उदाहरण हैं।

कांग्रेस और भाजपा केजरीवाल के खिलाफ दिग्गज उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। 60 वर्षीय संदीप गैर-सरकारी क्षेत्र में थे और राजनीति में आने से पहले उन्होंने सामाजिक विकास पर शोध में विशेषज्ञता हासिल की थी। उनका अभियान उनकी मां शीला दीक्षित की विरासत पर टिका है और केजरीवाल को उनकी चुनौती को उनकी मां की हार का बदला लेने के लिए बेटे के प्रयास के रूप में देखा जाएगा।
पश्चिमी दिल्ली से दो बार सांसद रह चुके 47 वर्षीय परवेश वर्मा पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे हैं। वर्मा दिल्ली में भाजपा के प्रमुख जाट चेहरे हैं। दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने कहा: “कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची से यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी इस चुनाव में आप के लिए मुश्किलें पैदा कर देगी। अरविंद केजरीवाल के खिलाफ संदीप दीक्षित की उम्मीदवारी से पता चलता है कि कांग्रेस गंभीरता से चुनाव लड़ा रही है। वहीं केजरीवाल अपने आक्रामक रुख के लिए जाने जाते हैं।

2020 में उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शन का समर्थन करने के लिए केजरीवाल को आतंकवादी तक कह दिया था। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा कहते हैं, “अरविंद केजरीवाल इस बार स्पष्ट रूप से बैकफुट पर हैं। वह लोगों द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देने से बच रहे हैं।“ भाजपा इस चुनाव में केजरीवाल पर सीधे निशाना साध रही है और कह रही है कि उन्होंने दिल्ली की जनता का भरोसा तोड़ा है।”

अपनी ओर से, आप ने नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र में लड़ाई को “दो CM के बेटे और एक दिल्ली का बेटा” के बीच की लड़ाई करार दिया है। हालांकि, आप नेताओं को लगता है कि केजरीवाल को 2020 की तुलना में इस बार अधिक आक्रामक तरीके से प्रचार करना होगा। उनकी पत्नी सुनीता को किले की रक्षा के लिए मैदान में उतरना पड़ा है। सुनीता भारतीय राजस्व सेवा की सीनियर अधिकारी रह चुकी हैं।

आप के दिल्ली संयोजक गोपाल राय ने कहा: “अरविंद केजरीवाल शासन की राजनीति के प्रतीक हैं। उन्होंने जो वादा किया था, उसे पूरा किया है। दूसरी पार्टियाँ इस तरह का सिद्ध ट्रैक रिकॉर्ड होने का दावा नहीं कर सकतीं।”
नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र दिल्ली विधानसभा की सबसे प्रतिष्ठित सीट है। इसका महत्व इसकी लोकेशन से भी है क्योंकि इसमें राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र लुटियंस दिल्ली शामिल है जहां राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री निवास , संसद , माननीयों की कोठियां, नौकरशाहों के बंगले, बाबुओ के रिहायशी कालोनिया केंद्र सरेकार के संवेदनशील प्रतिष्ठान,सहित विदेशी दूतावास नई दिल्ली लोकसभा सीट के अंतर्गत आते हैं। 2008 से 2013 तक शीला दीक्षित इस सीट से विधायक रहीं। वोटर फिलहाल वॉ एड वाच की भूमिका में है।

  • दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन नाग की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

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