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India most expensive divorce: 1.7 अरब डॉलर बॉन्ड जमा करने का आदेश; जानिए क्या है मामला
जोहो के संस्थापक और सीईओ श्रीधर वेम्बू का तलाक अब तक भारत का सबसे महंगा तलाक (India most expensive divorce) माना जा रहा है। कैलिफोर्निया में चल रहे इस मामले के दौरान, अदालत ने उन्हें 1.7 अरब डॉलर के बॉन्ड जमा करने का निर्देश दिया है।
मुख्य कारण कस्टडी और जोहो में शेयरों के संबंध में मतभेद
श्रीधर वेम्बू और उनकी पत्नी प्रमिला श्रीनिवासन के बीच तलाक के पीछे मुख्य कारण कस्टडी और जोहो में शेयरों के संबंध में मतभेद है। इस मामले में विवाद का मूल कारण कैलिफोर्निया में रहते हुए दंपति द्वारा एकत्रित की गई वैवाहिक संपत्ति का बंटवारा है।
आईआईटी-मद्रास से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, श्रीधर वेम्बू 1989 में प्रिंसटन विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी करने के लिए अमेरिका चले गए। अमेरिका में चार साल बिताने के बाद, 1993 में उन्होंने एंटरप्रेन्योर प्रमिला श्रीनिवासन से विवाह कर लिया।
1996 में, श्रीधर वेम्बू ने अपने साथी व्यवसायियों के साथ मिलकर एडवेंटनेट नामक एक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी की स्थापना की, जिसे 2009 में जोहो कॉर्पोरेशन के नाम से जाना जाने लगा।
सर्वोच्च अदालत ने वेम्बू को 1.7 अरब अमेरिकी डॉलर का बॉंड जमा करने का आदेश
श्रीधर और प्रमिला श्रीनिवासन ने कैलिफोर्निया में लगभग तीन दशकों तक निवास किया और उनका एक 26 वर्षीय बेटा भी है। 2019 में, श्रीधर वेम्बू भारत लौट आए और तमिलनाडु के अपने पैतृक गांव मथलमपरा में बस गए।
फोर्ब्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, वेम्बू ने अगस्त 2021 में तलाक के लिए आवेदन दिया था। प्रमिला श्रीनिवासन ने यह आरोप लगाया कि वेम्बू ने कंपनी के अधिकांश शेयर अपनी बहन राधा वेम्बू और भाई शेखर को ट्रांसफर कर दिए हैं।
वर्तमान में, राधा के पास कंपनी में लगभग 47.8% हिस्सेदारी है, जबकि उनके भाई शेखर, जो वेम्बू टेक्नोलॉजीज के संस्थापक हैं, के पास 35.2% हिस्सेदारी है। स्वयं वेम्बू के पास अब केवल 5% हिस्सेदारी है, जिसकी कुल मूल्य 225 मिलियन अमेरिकी डॉलर है। श्रीधर वेम्बू ने पत्नी के सभी आरोपों को निराधार बताकर खारिज कर दिया और इसे एक मनगढ़ंत कहानी करार दिया।
जनवरी 2025 में, कैलिफोर्निया की सर्वोच्च अदालत ने वेम्बू को 1.7 अरब अमेरिकी डॉलर का बॉंड जमा करने का आदेश दिया है, जो भारतीय मुद्रा में 14,000 करोड़ रुपये से अधिक है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि श्रीनिवासन के वैवाहिक संपत्ति पर अधिकारों की संभावित हानि से रक्षा के लिए यह कदम उठाना आवश्यक था।
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