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जमशेदपुर में जलेस द्वारा रेड बुक्स डे व अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर साम्राज्यवाद बनाम राष्ट्रवाद पर तीखा विमर्श, साम्राज्यवाद के खिलाफ बुलंद आवाज़

International Mother Language Day
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‘साम्राज्यवाद बनाम राष्ट्रवाद’ विषय पर हुआ तीखा वैचारिक विमर्श, कविता और गीतों से गूँजा भोजपुरी भवन

Red Books Day
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जनवादी लेखक संघ (जलेस), सिंहभूम इकाई द्वारा दिनांक 21-02-2026 को संध्या 05:00 बजे भोजपुरी भवन, गोलमुरी में रेड बुक्स डे एवं अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को साम्राज्यवाद विरोधी दिवस के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर “साम्राज्यवाद बनाम राष्ट्रवाद” विषय पर गंभीर और समकालीन संदर्भों से जुड़ा विमर्श आयोजित किया गया।

वैचारिक प्रश्नों से हुआ विषय प्रवेश

कार्यक्रम की शुरुआत काशीनाथ प्रजापति ने जोशीले गीत “तू जिंदा है तो जिंदगी के जीत पर यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर” की प्रस्तुति से की।

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विषय प्रवेश कराते हुए वरुण प्रभात ने कहा कि साम्राज्यवाद बनाम राष्ट्रवाद का प्रश्न केवल राजनीतिक विमर्श नहीं, बल्कि हमारे समय का नैतिक प्रश्न है। उन्होंने कहा कि हमें तय करना होगा कि हम वैश्विक पूंजी और सांस्कृतिक वर्चस्व के आगे आत्मसमर्पण करेंगे या जनवादी राष्ट्रवाद की उस राह पर चलेंगे, जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को पुनर्स्थापित करती है।

वक्ताओं ने साम्राज्यवाद के वर्तमान स्वरूप पर डाली रोशनी

सीयाशरण शर्मा ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से साम्राज्यवाद और राष्ट्रवाद एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं, किंतु वर्तमान समय में राष्ट्रवाद का जो स्वरूप उभर रहा है, वह लोकतांत्रिक पद्धति को भीतर से खोखला कर साम्राज्यवाद का हितैषी बनता जा रहा है।

डॉ. राम कविन्द्र ने फिलिस्तीन, वेनेजुएला और यूक्रेन के उदाहरण देते हुए साम्राज्यवाद की “सूरसा-सी भूख” का उल्लेख किया। शशी कुमार ने कहा कि अमेरिका के नेतृत्व में वैश्विक साम्राज्यवादी शक्तियाँ दुनिया की संपदा पर कब्जा करने की मुहिम चला रही हैं, जिसे समझना और उसके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करना समय की मांग है।

तत्पश्चात लिटिल इप्टा के बच्चों ने संजय सोलोमन रचित गीत “चलो कि आज अपने सारे बंधनों को तोड़ दें” की प्रस्तुति वाद्य यंत्रों के साथ दी, जिसे श्रोताओं ने सराहा।

डी.एन.एस. आनंद ने रेड बुक्स डे की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि मार्क्सवादी दर्शन वैज्ञानिक दृष्टि से परिपूर्ण है और इंकलाबी पुस्तकों का अध्ययन समय की आवश्यकता है।

मुख्य वक्ता डॉ. सुभाष चंद्र गुप्त ने कहा कि 21वीं सदी में भी यातना शिविरों का अस्तित्व यह प्रमाणित करता है कि नाजीवाद, फासीवाद और उपनिवेशवाद बदले रूप में आज भी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी सत्ता को समझने के लिए उसकी नीतियों की दिशा पर नजर डालना आवश्यक है।

शैलेन्द्र अस्थाना ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षीय उद्बोधन में अशोक शुभदर्शी ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में चेतना का विकास सबसे महत्वपूर्ण है। एक विकसित चेतना ही मुकम्मल मनुष्य का निर्माण करती है और वही समाजवाद की आधारशिला रख सकती है।

कविता और गीतों से गूँजी प्रतिरोध की आवाज़

इस अवसर पर राजदेव सिन्हा, दिव्या, निशांत सिंह, सौरभ अस्थाना, संजय सोलोमन एवं संदीप सिंह गौतम ने कविता पाठ किया। कार्यक्रम का समापन मशहूर शायर Faiz Ahmed Faiz की रचना “हम देखेंगे” के सामूहिक गायन से हुआ, जिसकी प्रस्तुति रमण ने दी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता अशोक शुभदर्शी ने की। संचालन सतीश कुमार ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन देवाशीष मुखर्जी ने दिया।

सामूहिक सहयोग से सफल हुआ आयोजन

कार्यक्रम को सफल बनाने में विनय कुमार, अर्पिता, दामोदर प्रजापति, साहिल नाग, अभिषेक नाग, गुंजन नाग, सरवन नाग, कल्याणी दीप, नमीता नाग, सुजल, अजय कुमार दास, दिव्या हरपाल, सुरभी हरपाल, ध्रुव कुमार सहित अनेक साथियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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