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जमशेदपुर में गूँजी प्रगतिशील कविता की हुंकार: निराला जयंती पर जलेस का 45वां स्थापना दिवस बना ऐतिहासिक

nirala jayanti jamshedpur
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जनवाद, प्रेम और प्रतिरोध पर गंभीर विमर्श, साहित्य सम्मान एवं कवि सम्मेलन ने बाँधा समां

jalesh jamshedpur
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जनवादी लेखक संघ (जलेस), सिंहभूम इकाई द्वारा दिनांक 15-02-2026 को प्रातः 10:00 बजे भोजपुरी भवन, गोलमुरी में निराला जयंती-सह-जलेस स्थापना दिवस का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम चार सत्रों में सम्पन्न हुआ, जिसमें साहित्यिक विमर्श, सम्मान समारोह, स्थापना दिवस उत्सव एवं कवि सम्मेलन-सह-मुशायरा शामिल रहे।

प्रगतिशील कविता और निराला पर केंद्रित पहला सत्र

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में “कविता की प्रगतिशील धारा और निराला” विषय पर गंभीर विमर्श किया गया। सत्र की सामूहिक अध्यक्षता अशोक शुभदर्शी, डॉ. अली इमाम खान, गोपाल प्रसाद, कुमार सत्येंद्र, जयनंदन एवं डॉ. अहमद बद्र ने की। सत्र का शुभारंभ निराला की तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर किया गया। काशीनाथ प्रजापति ने जनगीत प्रस्तुत किया तथा वरुण प्रभात ने आगंतुकों का शब्द-सुमनों से स्वागत किया।

अपने विचार रखते हुए डॉ. अली इमाम खान ने कहा कि निराला ने साहित्य को पारंपरिक धारा से अलग कर उसे बहिष्कृत और श्रमजीवी समाज से जोड़ा। जयनंदन ने कहा कि जिस कविता में आम आदमी की पीड़ा और प्रगतिशीलता नहीं है, वह कविता नहीं कही जा सकती।

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शैलेन्द्रअस्थाना ने अपने वक्तव्य में कहा कि हमारी दृष्टि हमेशा एक बेहतर भविष्य की ओर रही है और निराला की कविता जीवन तथा समाजवाद की पक्षधर रही है। उन्होंने कहा कि छायावादी काल में ही निराला की रचनाओं में प्रगतिशील चेतना का बीजारोपण हो चुका था और मुक्त छंद के माध्यम से उन्होंने हिन्दी कविता को नई दिशा दी।

डॉ. अहमद बद्र ने निराला की रचनाओं भिक्षुक’, ‘कुकुरमुत्ता और वह तोड़ती पत्थर का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कविताओं में चित्रित सामाजिक यथार्थ आज भी प्रासंगिक है। युवा वक्ता निशांत सिंह ने निराला को संघर्ष और परिवर्तन का कवि बताया।

इस सत्र को कृपाशंकर, गोपाल प्रसाद, कुमार सत्येंद्र, उदय प्रताप हृयात, संध्या सिन्हा एवं अर्चना अरुप ठाकुर ने भी संबोधित किया। सत्र का संचालन अजय महताब ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन सौरभ अस्थाना ने दिया।

नंद कुमार उन्मन स्मृति साहित्य सम्मान-2026 प्रदान

दूसरे सत्र में “नंद कुमार उन्मन स्मृति साहित्य सम्मान-2026” का आयोजन हुआ। अध्यक्ष मंडल में अशोक शुभदर्शी, डॉ. अली इमाम खान, गोपाल प्रसाद, कुमार सत्येंद्र, जयनंदन एवं अरविंद विद्रोही उपस्थित रहे। इस वर्ष शैलेन्द्र अस्थाना और अजय महताब को सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप अंगवस्त्र, मोमेंटो, प्रशस्तिपत्र एवं पुष्पगुच्छ प्रदान किए गए। सत्र का संचालन वरुण प्रभात एवं धन्यवाद ज्ञापन सरिता सिंह ने किया।

जलेस के 45वें स्थापना दिवस पर वैश्विक संकट में साहित्य की भूमिका पर चर्चा

सामूहिक भोजन के पश्चात तीसरे सत्र में जलेस का 45वां स्थापना दिवस मनाया गया। विषय था —“जनवाद, प्रेम और प्रतिरोध: वैश्विक संकट के दौर में साहित्य की भूमिका।” इस अवसर पर जलेस झारखंड की पत्रिका ‘उत्तरा झारखंड’ का लोकार्पण किया गया।

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कुमार सत्येंद्र ने जनवादी लेखक संघ की स्थापना और उद्देश्यों को रेखांकित करते हुए जनवाद और सामूहिक एकता की आवश्यकता पर बल दिया। डी.एन.एस. आनंद ने स्थापना काल के संस्मरण साझा किए। जन संस्कृति मंच  से प्रो. सुधीर सुमन ने आपातकाल के दौर की चर्चा करते हुए वर्तमान परिस्थितियों पर टिप्पणी की और जलेस को शुभकामनाएँ दीं। सत्र का संचालन उदय प्रताप हृयात तथा धन्यवाद ज्ञापन देवाशीष मुखर्जी ने किया।

कवि सम्मेलन-सह-मुशायरा में साहित्यिक रंग

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में आयोजित कवि सम्मेलन-सह-मुशायरा ने पूरे वातावरण को साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया। कार्यक्रम की शुरुआत लिटिल इप्टा के बच्चों द्वारा जोशपूर्ण जनगीत प्रस्तुति से हुई, जिसने श्रोताओं में उत्साह का संचार कर दिया।

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इसके पश्चात नजीर अहमद नजीर, अनमोल, उदय प्रताप हृयात, राजदेव सिन्हा, सरिता सिंह, अर्चना अरुप ठाकुर, सौरभ अस्थाना, मनिष पाठक, प्रियंका सिंह, अर्चना अनुपम कर्ण, साबिर नवादवी, वीणा कुमारी, सुजल, असर भागलपुरी, अशोक शुभदर्शी, अहमद बद्र, सुनिता सोहनी, संदीप सिंह गौतम, डॉ. सुनिता वेदी, रिजवान औरंगाबादी, नीलिमा कुमारी, सकलैन मुश्ताक, विमल किशोर विमल, आलोक तिवारी, निशांत सिंह, रमेश हंसमुख, सुधीर सुमन, सतीश कुमार, संजय सोलोमन एवं कुमार सत्यम सहित अनेक कवियों ने अपनी कविताओं, गीतों और ग़ज़लों की प्रस्तुति दी।

काव्य-पाठ के दौरान जनवाद, प्रेम, प्रतिरोध और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विविध रंग उभरकर सामने आए। श्रोताओं ने कवियों की प्रस्तुति पर भरपूर तालियाँ और वाह-वाह कर उनका उत्साहवर्धन किया।

कौन थे निराला?

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (21 फरवरी 1899 – 15 अक्टूबर 1961) हिन्दी साहित्य के छायावाद युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। उनका जन्म बंगाल (वर्तमान पश्चिम बंगाल) के महिषादल में हुआ था, जबकि उनका पैतृक संबंध उत्तर प्रदेश से था। वे बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे—कवि, उपन्यासकार, निबंधकार और अनुवादक।

निराला ने हिन्दी कविता को पारंपरिक छंदों की सीमाओं से मुक्त कर मुक्त छंद को प्रतिष्ठित किया और उसे सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। वे केवल प्रकृति और श्रृंगार के कवि नहीं थे, बल्कि शोषित, वंचित और श्रमजीवी वर्ग के पक्षधर रचनाकार थे।

उनकी प्रमुख कृतियों में परिमल, अनामिका, गीतिका, राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, भिक्षुक, कुकुरमुत्ता और वह तोड़ती पत्थर शामिल हैं। उनकी कविता राम की शक्तिपूजा को हिन्दी साहित्य की क्लासिक कृतियों में गिना जाता है।

निराला का जीवन संघर्षपूर्ण रहा। आर्थिक अभाव, पारिवारिक विषमताएँ और सामाजिक उपेक्षा के बावजूद उन्होंने अपनी लेखनी को जनपक्षधरता, विद्रोह और मानवीय करुणा से जोड़े रखा। वे साहित्य में स्वाधीन चेतना, सामाजिक न्याय और मानवीय समानता के प्रखर स्वर थे। आज भी निराला हिन्दी साहित्य में एक ऐसे कवि के रूप में स्मरण किए जाते हैं जिन्होंने कविता को केवल सौंदर्य-बोध नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया।

निराला: विद्रोह, क्रांति और पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध स्वर

वक्ताओं ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष बल दिया कि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ केवल छायावाद के प्रमुख कवि ही नहीं थे, बल्कि वे मूलतः एक क्रांतिकारी चेतना के कवि थे। उन्होंने साहित्य को शोषित-वंचित समाज की आवाज़ बनाया और स्थापित सामंती-पूँजीवादी मूल्यों को खुली चुनौती दी।

निराला की कविताओं भिक्षुक’, ‘कुकुरमुत्ता और वह तोड़ती पत्थर में श्रमजीवी वर्ग की पीड़ा, असमानता और व्यवस्था की क्रूरता का यथार्थ चित्रण मिलता है। ‘कुकुरमुत्ता’ में उन्होंने अभिजात्य और पूँजीवादी मानसिकता पर तीखा व्यंग्य करते हुए समाज में व्याप्त वर्गीय विभाजन को उजागर किया। वक्ताओं का मत था कि निराला का विद्रोह केवल साहित्यिक प्रयोगों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अन्याय के विरुद्ध एक वैचारिक प्रतिरोध था।

मुक्त छंद को अपनाकर उन्होंने परंपरागत छंद-बद्ध संरचना को तोड़ा, जो अपने आप में स्थापित साहित्यिक सत्ता के विरुद्ध एक रचनात्मक विद्रोह था। उनके लेखन में जनपक्षधरता, समानता और सामाजिक न्याय की स्पष्ट पक्षधरता दिखाई देती है।

वक्ताओं ने कहा कि आज के वैश्विक पूँजीवादी संकट और सामाजिक असमानताओं के दौर में निराला की क्रांतिकारी दृष्टि और अधिक प्रासंगिक हो उठती है। उनका साहित्य केवल भावुकता नहीं, बल्कि बदलाव की चेतना और प्रतिरोध की ऊर्जा का स्रोत है।

सामूहिक प्रयास से सफल हुआ साहित्यिक आयोजन

कार्यक्रम की सफलता में जय किशोर प्रसाद, बी. विश्वनाथ राव, प्रो. बी.एन. प्रसाद, चैतन्य शिरोमणि, विनय कुमार, रविश कुमार, संध्या ठाकुर एवं अर्पिता सहित अनेक साथियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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