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Nitish Kumar Hijab Controversy: कुछ भिन्न मत!

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यह असंतुलित आचरण है। परंतु इस प्रकरण को असंतुलित तरीके से नहीं उठाया जाए।

पूरा एहसास है कि इस मुद्दे पर मेरी राय से अनेक साथी असहमत होंगे, फिर भी अपनी बात रखने का दुस्साहस कर रहा हूं.

मुद्दा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला (मुसलिम) डॉक्टर का ‘हिजाब’ हटाने का है, जो सुर्खियों में है!

इस मुद्दे पर आई गर्मी का एक कारण राजनीतिक भी है. यह राजनीतिक रूप से दो खेमों में बंट गये समाज/लोगों के स्टैंड से भी जाहिर है. दोनों तरफ मुझे कुछ अतिवाद दिख रहा है.

बेजा हरकत

नीतीश कुमार की कथित बेजा हरकत को डिफेंड करने वालों में अधिकतर तो बीमार मानसिकता के हैँ- किसी बहाने किसी मुसलिम को अपमानित करने में उन्हें परपीड़क सुख मिलता है। , यह उनके एजेंडे के अनुरूप भी है.

स्त्री- (अपने’ समाज की भी- ) के प्रति इन लोगों के मन में, कोई सम्मान तो नहीं ही है.

उत्तर प्रदेश के एक मंत्री के वायरल हो रहे इंटरव्यू में सवाल पूछ रहे पत्रकार और जवाब दे रहे मंत्री की मुद्रा और शब्दों में गंदगी व लंपटता साफ देखी जा सकती है.

तय है कि भाजपा से इतर व विरोधी दल के किसी नेता के ऐसे ही आचरण पर उनका तर्क भिन्न होगा.
कोई कांग्रेसी या सपा नेता– किसी हिंदू महिला का घूँघट जबरन हटा देता — तो उनकी ऐसी ही प्रतिक्रिया होती?

जो लोग, खासकर स्त्रियां, इसे स्त्री की निजता और गरिमा पर हमला मान रही हैँ, उनकी बात अलग है. वे किसी दलीय पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं हैँ. मगर खेमेबंदी इतना गहरी है , कि एक पक्ष की महिलाएं सिर्फ इस कारण नीतीश कुमार का बचाव कर रही हैँ, क्योंकि वे ‘अपने’ पाले में हैँ!

मगर इस घटना को लेकर नीतीश कुमार पर टूट पड़ने वालों के लिए भी यह संघ जमात के एक करीबी नेता पर हमला करने का बहाना बन गया लगता है!

बेशक नीतीश कुमार का व्यवहार अशालीन ही नहीं, निंदनीय था । , उनकी मानसिक स्थिति पर भी सवाल उठता है. यह सवाल भी किया जा सकता है कि ऐसा व्यक्ति मुख्यमंत्री पड पर कैसे रह सकता है. मगर उनकी मंशा को निर्विवाद रूप से दूषित- स्त्री विरोधी, खास कर मुसलिम विरोधी- मान लेने का भी कोई ठोस आधार नहीं है. अचरज की बात है कि वे भी इस ‘कांड’ को इतना तूल दे रहे हैँ, जो हर समुदाय में स्त्री को जबरन परदे में रखनेकी परंपरा को स्त्री विरोधी मानते रहे हैँ!

यह सवाल किसी के मन में क्यों नहीं उठा कि जिस आयोजन में डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र मिलना था, डॉ नुसरत का चेहरा ढँक कर वहां जाना सही था? हिजाब और नकाब के अंतर को भी समझने की जरूरत है- हिजाब में सिर ढंका, पर चेहरा खुला रहता है. नकाब में पूरा चेहरा ढंका रहता है. किसी के आधार कार्ड में, वोटर कार्ड में, पासपोर्ट में, जन्म प्रमाण पत्र में, ड्राइविंग लाइसेंस में ऐसा फ़ोटो नहीं लगता, जिसमें चेहरा न दिखता हो. इस घटना से जुड़ी खबर के साथ छपे फ़ोटो में डॉ नुसरत हिजाब में नहीं, नकाब में दिख रही हैं.
कल डॉ नुसरत या कोई अन्य महिला डॉक्टर किसी मरीज का इलाज नकाब लगा कर करना चाहे, यह उचित होगा? मरीज को संदेह हो कि यह कोई और तो नहीं, तब भी डॉक्टर नकाब नहीं हटाने की जिद कर सकती है?

नीतीश कुमार की मानसिक अवस्था एकदम दुरुस्त होती तो शायद वे नकाब हटाने के लिए हाथ नहीं, अपनी जुबान चलाते. उस महिला डॉक्टर से पूछते कि नकाब पहन कर ईलाज कैसे करेंगी?

बहरहाल, इस शोर में उन घटनाओं पर कोई चर्चा नहीं हो रही, जब स्त्री पर नयी तरह की पाबंदियाँ लगाने का प्रयास हो रहा है. कुछ दिन पहले यूपी के किसी शहर में अपने छोटे भाई के साथ मंदिर गयी एक युवती से एक पुलिसकर्मी पूछ रहा था- बिना ‘गार्जियन’ के क्यों घूम रही हो? यही नहीं, उसके परिवार के किसी का मोबाइल नंबर लेकर उनसे भी कहा कि जवान लड़की को इस तरह बाहर जाने की छूट क्यों देते हैँ?
पुलिस कौन होती है किसी लड़की से इस तरह पूछताछ करने वाली? वह कब कहां किसके साथ जाए या न जाए, यह सरकार तय करेगी? हिजाब और नकाब को भी मजहब की पहचान बताने और थोपने के पीछे भी वही मानसिकता काम करती है. इसके प्रति सचेत रहने की जरूरत है.

संयत ढंग से सोचें, तो यह हिजाब प्रकरण उतना बड़ा मामला है नहीं, जितना बड़ा इसे बनाया जा रहा है.

बेशक हम एक बीमार समाज में जी रहे हैँ

मगर यह बीमारी किसी एक समाज की नहीं है. चिंता की बात यह है कि स्त्री विरोधी जिस धारणा के कारण समाज में ऐसी विकृति है, उसे बदलने का कोई गंभीर प्रयास नहीं हो रहा!

लेखक- श्रीनिवास

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