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इन दिनों मिर्ज़ा ग़ालिब और आधुनिक पंडित, 1857 दिल्ली आजादी | डॉ योगेन्द्र

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11 मई 1857 को मेरठ से चल कर आज़ाद सिपाही दिल्ली पहुँचे थे। उन्होंने जहाँ जहाँ अंग्रेज़ों को देखा, उसे कत्ल किया। दया- माया का कोई सवाल नहीं था। नफ़रत के बिना न तो अंग्रेज़ कत्ल करते थे, न सिपाही । आज़ादी के लिए कत्ल ज़रूरी था और ग़ुलाम बनाने के लिए भी। बहादुर शाह ज़फ़र अंग्रेज़ों के रहमोकरम पर जी रहे थे। यों वे अंदर से बादशाह थे, बाहर से ग़ुलाम ।

विद्रोह सफल नहीं हुआ और पुनः अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया

महान शायर और दार्शनिक मिर्ज़ा ग़ालिब दिल्ली में मौजूद थे। उन्हें सामंत का दर्जा प्राप्त था और पेंशन पर जीते थे। उनकी चेतना भी हिली । आज़ादी के सपने भी देखे, लेकिन उसकी चेतना भययुक्त नहीं थी। वे साथ ही साथ आशंकाओं से भी घिरे थे। सिपाही विद्रोह सफल नहीं हुआ और पुनः अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया तो क्या होगा? उन्हें अपने परिवार और खुद की भी फ़िक्र थी। दिल्ली 11 मई 1957 से लेकर 18 सितंबर 1957 तक आज़ाद रही। अंग्रेज़ जब पुनः लौटे तो उन्होंने भी सिपाहियों की तरह ही कत्ल किया।

अंग्रेज़ों की रोटी और नमक

जहाँ जहाँ विद्रोही मिले, उनके सिर कलम किये ही, जिन पर संदेह हुआ, उसे भी मार डाला । ग़ालिब की चेतना में भयंकर तूफ़ान आया । उन्होंने अपने को निरपराध साबित करने के लिए एक किताब लिखी-‘ दस्तम्बू’। किताब के आरंभिक पृष्ठों में लिखा है-“ इस किताब के पाठकों को यह ज्ञात होना चाहिए कि मैंने अंग्रेज़ों की रोटी और नमक खाया है तथा बहुत बचपन से ही इन विश्व विजेताओं के दस्तरख़ान से अपना भूखा पेट भरा है। “ उन्होंने अंग्रेज़ों की तारीफ़ में चुन चुन कर विशेषण जुटाए । ग़ालिब ने स्वीकार किया है कि उसने सारा जीवन मूर्खो की प्रशंसा में व्यतीत किया।

जिसके पास सत्ता, उसके पास ही सारे अधिकार

ग़ालिब बहुत महान शायर थे। इसमें कोई शक नहीं, लेकिन हालात के सामने मजबूर भी हुए । वैसे भी उस वक़्त कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं थी। न कोई संविधान था, न जनता की कोई अदालत। जिसके पास सत्ता होती थी, उसके पास ही सारे अधिकार होते थे। अंग्रेज़ों के सामने उनकी बौद्धिक चेतना मजबूर थी। आज देश में लोकतंत्र है। संविधान भी है और न्यायपालिका भी। आज़ादी के दिवानों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था का सपना देखा।

बोलने की आज़ादी पर पहरा

संविधान बनाया। संविधान में दर्ज किया कि आज़ाद भारत के नागरिक भयमुक्त होकर अपनी बात कह सकेंगे। ग़ालिब को सुरक्षा सत्ता देती थी, अब सबकी सुरक्षा में संविधान खड़ा है । यह अलग बात है कि संविधान की क़सम खाकर जो लोग सत्ता में जाते हैं, वे जनता के प्रतिरोध को दबाते हैं और उन्होंने बोलने की आज़ादी पर पहरा बैठा दिया है। ऐसी दशा में बहुत से ग़ालिबों ने सुगम रास्ता अपना लिया है। जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी कीजिए के आधार पर वे बदलती सत्ता के साथ हो लेते हैं। चूँकि वे सामान्य नागरिक नहीं हैं, इसलिए अपने बदलाव के लिए तर्कों का पहाड़ खड़ा करते हैं । वे ऐसा दृश्य उत्पन्न करते हैं कि वे ही वक्त को पहचान रहे हैं।

बौद्धिकों को फिसलने में देर नहीं लगती

शेष पोंगापंथी हैं या वक्त को पहचानने में वे काफ़ी पीछे रह गए । बौद्धिकों को फिसलने में देर नहीं लगती । ख़ासकर वैसे बौद्धिकों को जिनका जुड़ाव सिर्फ़ किताब- बुद्धि से है। दुनिया एक संक्रमण से गुज़र रही है, जहाँ उदार मानवीयता खतरे में है। संकीर्णता ही राष्ट्र का लक्ष्य है। बड़े बड़े तथाकथित देश बनिया बना बैठा है। उसे जैसे तैसे कर संपत्ति चाहिए । अमेरिका अड़ानी के खिलाफ धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी ख़त्म करने की तैयारी में है। उसके बदले में अड़ानी 95 हज़ार करोड़ निवेश और 15 हज़ार नौकरियाँ पैदा करने को तैयार है । ‘ बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैय्या का युग है। बहुतों का बहुत कुछ उतर रहा है, ऐसी दशा में आधुनिक ग़ालिबों ने अपना चोला उतार दिया है , तो क्या बुरा किया है!

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