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अंखमुन्ना विकास के दुष्परिणाम: भागलपुर में टाउनशिप योजना के खिलाफ उठा विरोध | डॉ योगेन्द्र

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अंखमुन्ना विकास के दुष्परिणाम: भागलपुर में कल बीस-पच्चीस लोग जुटे। घंटाघर चौक पर माइक लगाया और नुक्कड़ पर भाषण देने लगे। भाषण के केंद्र में था बिहार सरकार की नयी टाउनशिप योजना और नीट परीक्षा के लीक प्रश्न पत्र।

भागलपुर को रेशम नगरी कहा जाता है। धीरे-धीरे इसके रेशम उद्योग बंद पड़ गये। कुछ लूम खटर-पटर करते रहते हैं। भागलपुर में डीआरएम कार्यालय बनना था जिसे रेलवे मंत्रालय ने वापस ले लिया। यहाँ आयुर्वेदिक और होम्योपैथी कॉलेज थे, जो बंद पड़े हैं। विक्रमशिला विश्वविद्यालय की घोषणा दस वर्ष पूर्व हुई थी, वह भी अधर में लटका है। हवाई अड्डा हर चुनाव में बनता है और बिगड़ता है। कोई नया कल-कारख़ाना नहीं लगा।

सरकार पूँजीपतियों, बिल्डरों, व्यापारियों और ठेकेदारों से घिरी

नये नवेले मुख्यमंत्री योगदान करते ही चौबीस हज़ार एकड़ ज़मीन पर नयी टाउनशिप बनायेंगे। यहाँ की जनता या प्रतिनिधियों की कोई राय नहीं ली गयी। जनता को क्या ज़रूरत है, नहीं है, यह न जानना है, न पूछना है। ऊपर से घोषित कर देना है। विकास इसलिए उल्टी धारा में चल रहा है। विकास को जनता से सरकार की ओर चलना था तो वह सरकार से जनता की ओर चल पड़ा है।

सरकार पूँजीपतियों, बिल्डरों, व्यापारियों और ठेकेदारों से घिरी रहती है। दरअसल चुनाव में यही लोग सरकार की फंडिंग करते हैं। नतीजा होता है कि सरकार बनते ही ‘निर्मल बाबा’ की कृपा बरसने लगती है। इसी बरसात को आजकल विकास कहते हैं।

लोकतंत्र का शिकारी जनता को दाना डालता है

आजकल का विकास एक साज़िश है जो जनता, पर्यावरण और देश के खिलाफ रची जाती है। इस विकास के लाभुक जनता नहीं है। यह कहावत है— “शिकारी आयेगा, दाना डालेगा, लोभ में फँसना नहीं।” लोकतंत्र का शिकारी जनता को दाना डालता है। टाउनशिप योजना में कहा जा रहा है कि किसानों को चार गुना दाम मिलेगा।

पहली बात यह है कि चौबीस हज़ार एकड़ ज़मीन पर टाउनशिप क्यों बनाना है? यहाँ कोई उद्योग नहीं है कि बहुत सारे लोग घरों के लिए बौख रहे हैं। हाँ, यह संभव है कि जिन्होंने खूब काला धन कमाया है, वे लोग रियल स्टेट में पैसा इन्वेस्ट करें।

बुलडोज़र चलाने और लाठी बरसाने पर सवाल

टाउनशिप योजना के अंतर्गत कम से कम तीस-चालीस प्रतिशत ऐसी आबादी है, जिनके पास कट्टा-दो कट्टा ज़मीन है या वे भूमिहीन हैं। जैसे-तैसे कर जीवन जी रहे हैं। ये लोग गांव से पलायन करने के लिए मजबूर होंगे। वे दिल्ली, पंजाब, कश्मीर, कोलकाता जायेंगे। वहां ठेला लगायेंगे या घुपचुप (पानी-पूड़ी) बेचेंगे या सड़क पर और कोई धंधा करेंगे।

आजकल की सरकार उस पर भी बुलडोज़र चलाने और लाठी बरसाने से नहीं चूक रही। बंगाल में महान सरकार आयी और झुग्गियों पर टूट पड़ी। गांव से विस्थापित, पीड़ित और निर्धन कहाँ जायें? वे देश के नागरिक हैं या नहीं हैं? जो चमकती सड़कों के आसपास बसे हैं, जो सत्ता के लाभुक हैं और देश को लूटने में माहिर हैं, क्या वे ही देश के नागरिक हैं?

हमारा काम ख़बरदार करना

करोड़ों लोग जो सड़क किनारे छोटी-मोटी दुकानें लगाते हैं, वे तथाकथित विकास नीति के ही दुष्परिणाम हैं। अपराधी वे नहीं हैं जो सड़कों पर रोज़ ठेला लगाते हैं, बल्कि वे लोग अपराधी हैं जो सत्ता संचालित करते हैं। हमें चमक-दमक की आदत लग गई है। जिनके घरों में अँधेरा है, वे आज घृणा के पात्र हैं। मजा यह है कि उनकी चेतना में भी गंदा नारा भर दिया गया है।

हम सब बीस-पच्चीस लोग थे। सरकार को भी सुनाया और जनता को भी। हम सब जानते हैं कि हमारी बात सरकार नहीं सुनेगी, न जनता। लेकिन हमारा काम ख़बरदार करना है।

कहलगाँव में एनटीपीसी बनने लगा था तो हमलोगों ने आगाह किया था। उस क्षेत्र में पैदल चल कर लोगों को कहा था। वहाँ के ठेकेदारों ने मुझे धमकाया भी कि मार कर पेड़ में टाँग देंगे। आज कहलगाँव क्षेत्र के लाखों लोगों की जान टँगी हुई है।

अब देश को अंखमुन्ना विकास नहीं चाहिए। प्रकृति, धरती और जनता को केंद्र में रख कर ही विकास की रूपरेखा बनाई जा सकती है।

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