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“खुदा मेहरबान तो गदहा पहलवान” — देश के हालात, बाबाओं के साम्राज्य और गंगा की व्यथा पर डॉ. योगेन्द्र का तीखा प्रहार

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– डॉ. योगेन्द्र

कैबिनेट भी अजीब चीज़ है। जिसमें एक निर्देश देता है और सब पालन करता है। यहां कोई बहस-मुबाहिसे नहीं। असहमति का तो सवाल नहीं है। एक औपचारिकता है जिसे निबाहनी है। कल तो खैर भारतीय लोकतंत्र की अविस्मरणीय घटना घटी। प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों को निर्देश दिया कि देश में गर्मी काफ़ी है, इससे बचने के लिए खूब पानी पियें। मजा यह था कि यह ख़बर ब्रेक कर गयी और चैनल पर महान एंकरों ने इसे ब्रेकिंग ख़बर बनाया।

लोकतंत्र सिर्फ़ मूर्खो का ही शासन नहीं है। यह उजड्डों का पनाहगाह भी है। कैबिनेट बेरोज़गारी पर शांत है। वह महँगाई का म भी नहीं बोल पा रहा। महंगाई डायन अब सुंदर लगने लगी है।

कॉरपोरेट बाबा और पैरोल का खेल

कल बाबा रामदेव से एक पत्रकार भिड़ गया। पत्रकार ने पूछा कि आपने तो कहा था कि पेट्रोल 35 रुपये लीटर मिलेगा। अब 110 रुपये है। इस पर आप कुछ बोलते क्यों नहीं? इस पर वे भड़क गए और तैश में बोले- मैं जवाब देने के लिए मजबूर नहीं हूँ। सचमुच बाबा मजबूर नहीं हैं। वे तो बाबा से कॉरपोरेट बन गये। उनका बिज़नेस धड़ल्ले से चल रहा है। उन्हें किस बात की फ़िक्र है। बाबाओं का राज है। बाबा चाहें तो क्या नहीं कर सकते।

एक हरियाणा के बाबा हैं – गुरमीत राम रहीम। मात्र हत्या और बलात्कार के सजायाफ्ता हैं। उन्हें सरकार ने सोलहवीं बार पैरोल दिया है। गुरमीत कभी साधु था। उसने एक्टर बनने की भी कोशिश की। लोगों को खूब ठगा। ऐय्याशी उसके ख़ून में है। अपने आश्रम में बलात्कार भी किया और हत्या भी। अब वह सजा भी काट रहा है। लेकिन खुदा मेहरबान तो गदहा पहलवान जैसी कहावत सार्थक हो रही है।

“अनेक भारतीय बिना किसी अपराध के जेल में हैं। कोर्ट उसे ज़मानत तक नहीं दे रहा और दूसरी तरफ बलात्कारी और हत्यारे को पेरोल पर पेरोल दिया जा रहा है।”

जो ताक़तवर हैं, सत्ता पर आसीन हैं, वे क़ानून की भी ऐसी की तैसी कर रहे हैं। गुरमीत को पेरोल एकाध दिन का नहीं मिलता, कभी तीस दिन तो कभी चालीस दिन का पेरोल मिलता है। उसके लिए तो जेल पिकनिक की तरह है। मनुस्मृति से जिन्हें प्यार है, उनकी सरकार ऐसी ही बेहूदगी करेगी।

पढ़े-लिखे लोगों का डर और देश की स्थिति

एक तरफ बशीर बद्र हैं जिन्होंने लिखा— ‘ज़िंदगी तूने मुझे कब्र से कम दी है ज़मीं, पांव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है’। एक तरफ करोड़ों लोगों की सिसकियाँ और आहें हैं तो दूसरी तरफ गुरमीत, आसाराम और उनके समर्थकों की ऐय्याशियां हैं। साधुओं और कॉरपोरेट्स ने मिलकर ज़मीन पर कुहराम मचा रखा है।

बशीर बद्र दुनिया से विदा हो गए। उन्होंने लिखा था— ‘काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के, दीवाने बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गए।’ बे-पढ़े अब देश चला रहे हैं। पढ़े डरे-सहमे हैं। निडरता उनके नाम है, डर इनके नाम। तालीम ऐसी दी जा रही है कि डर पढ़े-लिखे लोगों की ज़ेहन में रच-बस गया है।

भागलपुर का महर्षि मेंहीं आश्रम और गंगा की दुर्दशा

खैर, अंत में भागलपुर में घटित प्रेरणादायी क़िस्सा। भागलपुर के गंगा किनारे महर्षि मेंहीं आश्रम है। आश्रम धीरे-धीरे सजता जा रहा है। हर महीने कुछ नया जुड़ जाता है। जब महर्षि मेंहीं यहां भटकते हुए आये तो यह जगह चोरों-बटमारों के लिए सुरक्षित थी। मरी भी यहाँ चीरी-फाड़ी जाती थी। गिद्धों का डेरा था। कुल मिलाकर श्मशान की तरह ही माहौल था। यहां आकर तपस्या की। मूलतया वे निर्गुणमार्गी थे।

सौ वर्ष की उनकी ज़िंदगी रही। लाखों परिवार उनसे प्रभावित रहा। प्रवचन तो करते ही थे, साथ ही साथ नशा के खिलाफ अभियान चलाया और अपने सद्विचारों से लोगों को प्रभावित किया। 1986 में उनकी मृत्यु हुई, लेकिन आज भी उनके लाखों शिष्य हैं।

कभी इसके किनारे से ही गंगा हहराती हुई जाती थी। अब इसके किनारे नाले की शक्ल में बहती है। बड़ी ख़्वाहिशें पाल कर गंगा ने जिस बेटे को बुलाया था, उस बेटे से भी वह निराश हो चली है। लगता है कि दस-बीस वर्षों में गंगा विदा हो जाएगी, जैसे सरस्वती हो गई थी।

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