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इन दिनों: उन्हें देश उजाड़ने का हुनर प्राप्त है | डॉ योगेन्द्र का सत्ता, शिक्षा और मीडिया पर तीखा हमला

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कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट में बरसों से बसी पुस्तकों की बस्तियों को उजाड़ने की तैयारी हो रही है। सत्ता को पुस्तकें रास नहीं आती, क्योंकि पुस्तकों में विद्रोह छिपा रहता है। जो भी पुस्तकों से गुज़रेगा, उसकी चेतना में हलचल रहेगी। यह हलचल सत्ता के लिए असुविधाजनक होती है।

लेख में कहा गया है कि नई सत्ता का मुख्य स्वभाव “उजाड़ना” बन गया है। लेखक के अनुसार सत्ता निर्माण से ज़्यादा ध्वंस और बिक्री की राजनीति में रुचि रखती है।

बुलडोज़र, सत्ता और “अच्छे दिन” का सवाल

लेख में दिल्ली से बंगाल तक बुलडोज़र कार्रवाई का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि जिन लोगों ने सत्ता को समर्थन दिया, वे भी अपने घर और अस्तित्व को सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं।

लेखक का तर्क है कि राज्य सरकारों से लेकर केंद्र तक, “उजाड़ने” की राजनीति व्यापक रूप ले चुकी है।

अर्थव्यवस्था, सोना और रुपये पर टिप्पणी

लेख में दावा किया गया है कि सरकार ने बड़ी मात्रा में सोना बेचा, जबकि बाज़ार में रुपया दबाव में बना हुआ है।

लेखक ने सवाल उठाया है कि यदि पूर्व सरकारों ने कुछ बनाया ही नहीं था, तो वर्तमान व्यवस्था किस संपत्ति की बिक्री कर रही है?

राजनीति, मीडिया और सामाजिक तनाव

लेख राजनीति और मीडिया को “युद्धभूमि” के रूप में देखता है, जहां लगातार टकराव और चुनौती की संस्कृति विकसित हो रही है।

लेख में टीवी एंकरों, न्यायपालिका से जुड़े विवादों और युवाओं की प्रतिक्रियाओं का उल्लेख करते हुए सामाजिक तनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण पर टिप्पणी की गई है।

शिक्षक, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक भूमिका

लेख का अंतिम हिस्सा शिक्षकों की भूमिका पर केंद्रित है।

लेखक के अनुसार शिक्षकों ने अपनी भूमिका सीमित कर ली है और वे राष्ट्र तथा समाज की व्यापक ज़रूरतों से कटते जा रहे हैं।

लेख में कहा गया है कि यदि शिक्षक ऐतिहासिक भूमिका निभाना चाहते हैं, तो उन्हें निडर होकर सच बोलने की आवश्यकता होगी।

निष्कर्ष

यह लेख पुस्तक संस्कृति, राजनीति, अर्थव्यवस्था, मीडिया और शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में व्यापक सामाजिक-राजनीतिक चिंताओं को सामने रखता है। डॉ योगेन्द्र ने अपने लेख में सत्ता संरचना, सामाजिक चेतना और शिक्षकों की भूमिका पर कई तीखे सवाल उठाए हैं।

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