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Ram Mandir Controversy: ‘जिन्होंने राम को नहीं छोड़ा, वे…’, डॉ. योगेन्द्र ने बीजेपी और आरएसएस पर साधा निशाना

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Ram Mandir Controversy: यह सदी इस बात का गवाह बनेगी कि अपने ही लोगों के द्वारा कैसे मंदिर लूट लिया गया । अभी तक मंदिरों को लूटने वालों में बाबर, गजनी और गोरी के नाम आते थे, अब कुछ नये नाम जुड़ते जा रहे हैं । यह देश का दुर्भाग्य है कि जो हिंदू धर्म की राजनीति कर रहे है, वे ही हिंदू धर्म के साथ खेल खेल रहे हैं । पिछले दिनों बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के सामने बीजेपी का झंडा लेकर हनुमान जी नृत्य करते नजर आए।

पूर्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हनुमान जी को पतंग बना कर उड़ा चुका हैं । हद तो तब हो गई, जब कर्नाटक बीजेपी द्वारा अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन के अवसर वैसे चित्र को शेयर किया गया जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क़द राम जी के बाल रूप के क़द से काफ़ी बड़ा था और वे रामलला की उंगली पकड़कर उन्हें आगे ले जा रहे थे। धर्म बीजेपी के लिए बहुत काम की चीज़ है। उनके लिए यह मामला आस्था का नहीं, बल्कि सत्ता का है। आस्था रहती तो चंदा चोरी भी नहीं होती, न हनुमान जी बीजेपी का झंडा लेकर नाचते नजर आते, न पतंग बन हवा में उड़ते।

सत्ता में बैठे हैं, उनके अंदर की आस्था बहुत पहले मर चुकी

जो सत्ता में बैठे हैं, उनके अंदर की आस्था बहुत पहले मर चुकी है । वरना, ऐसी घटनाओं के लिए देश से माफ़ी माँगते । राम मंदिर में चंदे की चोरी हुई । यह संख्या कितनी बड़ी है, बताना मुश्किल है। चंदे की चोरी की साज़िश इतनी बड़ी थी कि सीसीटीवी कैमरे को भी ख़राब कर दिया गया । अगर मामला छोटे स्तर का होता तो सीसीटीवी कैमरे बंद नहीं कर दिए जाते । ये लोग कितने शातिर हैं कि जो सवाल पूछ रहे हैं और कह रहे हैं कि चंदा चोरों के असली सरगना को पकड़ो , तो ये लोग उनसे ही सवाल करते हैं । निर्लज्जता की हद तो यह है कि वे यह कहने से नहीं हिचक रहे कि मैंने मंदिर बनवाया, मैंने चोरी की, इसमें तुम्हारा क्या जाता है?

पिछले दस- बारह वर्षों में हिंदू धर्म का जो स्वरूप उभरा है, उससे कई सवाल उठ खड़े हुए हैं । पहला सवाल यह है कि सचमुच में हिंदू धर्म का स्वरूप यही है जो बीजेपी और आरएसएस के द्वारा परोसा जा रहा है? अगर यही स्वरूप है , तो इसमें नफ़रत भी घुली है और पाखंड और लूट भी। भारत में न धार्मिक व्यक्ति की कमी है, न धार्मिक ग्रंथों की। बुद्ध, महावीर नानक, कबीर, आलवार संत, विवेकानंद आदि संत हुए । उन्होंने घृणा और नफ़रत का कोई पाठ नहीं पढ़ाया । उन्होंने संपत्ति और सत्ता का त्याग किया। उन्होंने मानवीय करूणा का प्रचार किया।

लोग विवेकानंद की तस्वीर लिए फिर रहे हैं, वे भी नफ़रत का बाज़ार लगाकर बैठे हैं

साथ ही ईर्ष्या- द्वेष और सांसारिक वासना से मुक्ति का रास्ता बताया। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो की धर्म सभा में जो भाषण दिया, वह मील का पत्थर है। आश्चर्य यह है कि जो लोग विवेकानंद की तस्वीर लिए फिर रहे हैं, वे भी नफ़रत का बाज़ार लगाकर बैठे हैं। वे विवेकानंद तक को नहीं पढ़ते। उन्होंने ने शिकागो में कहा- “मुझे उस धर्म का अनुयायी होने पर गर्व है जिसने विश्व को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति सिखाई है। हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि सभी धर्मों को सत्य मानते हैं।

मुझे उस राष्ट्र का अनुयायी होने पर गर्व है जिसने पृथ्वी के सभी धर्मों और राष्ट्रों के सताए हुए लोगों और शरणार्थियों को शरण दी है। “ मगर अब बात उलट गई है। सत्ता में बैठे लोग इसी तिकड़म में लगे रहते हैं कि कैसे किसको भगाया जाए । जो भी हो, देश सिर्फ़ उनका नहीं है। हमारा आपका भी है। हमें तो सोचना चाहिए कि धर्म क्या है और धर्म विरोधी लोग किस तरह धर्म का नाश कर रहे हैं।

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