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राष्ट्रपति का बेटा हो या भंगी की संतान, सबको शिक्षा एक समान – डॉ योगेन्द्र
देश की हवा में छात्रों की गूँज तो है ही, शिक्षा को लेकर चिंताएँ भी हवा में तैर रही हैं। जंतर-मंतर से लेकर देश के विभिन्न इलाक़ों में शिक्षा पर बहसें हो रही हैं। कहना चाहिए कि आज राजनीति के केंद्र में भी शिक्षा आ गई है। यह अच्छी बात है। मगर मेरे मन में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और जंतर मंतर पर बैठे सोनम वांगचुक से कुछ बुनियादी सवाल हैं।
राहुल गांधी विभिन्न परीक्षाओं में लीक हुए प्रश्न पत्रों को लेकर सरकार पर हमलावर हैं तो सोनम वांगचुक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े को लेकर अड़े हैं। दोनों में एक बात कॉमन है कि वे एक ज़िम्मेदार सिस्टम चाहते हैं जो कम से कम प्रश्न पत्र लीक न होने दे। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ज़िम्मेदार प्रशासन बनाने के लिए यहां तक कह दिया कि सोनम वांगचुक को केंद्र में शिक्षा मंत्री बनाया जाए। कितनी उथली है अरविंद केजरीवाल की शिक्षा संबंधी समझ। क्या सोनम वांगचुक बीजेपी सरकार में शिक्षा मंत्री बनते ही शिक्षा में क्रांति हो जाएगी? ये लोग कितने भोले हैं या फिर कितने शातिर हैं।
बीजेपी सरकार का शिक्षा मंत्रालय आरएसएस चलाता है। आरएसएस को वर्तमान शिक्षा पद्धति पसंद नहीं है । वैसे आरएसएस की शिक्षा संबंधी समझ उतनी ही लचर है। उसने शिक्षा पर अपनी विंग भी बना रखी है। उसके अपने शिशु मंदिर भी हैं । विश्वविद्यालयों के अंदर भी घुसपैठ जारी है। कॉलेजों और विभागों की रिक्तियों में अपने लोगों को वह भर रहा है और विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति उसके निर्देश पर भरे जा रहे हैं । बीजेपी जानबूझकर वर्तमान सिस्टम को बर्बाद कर रही है ।यही वजह है कि सरकारी संस्थानों को बेच देना उसके दायें- बाएँ का खेल है।
बीजेपी की बात छोड़िए । फ़िलहाल जो आंदोलनरत हैं, जिनमें कुछ संभावनाएं हैं , उनके बारे में सोचिए । देश को एक ज़िम्मेदार सिस्टम चाहिए, लेकिन क्या यह ज़िम्मेदार सिस्टम मात्र प्रश्न पत्र लीक रोक कर शिक्षा में क्रांति कर लेगा? राहुल गांधी और सोनम वांगचुक सहित तमाम लोग समस्याओं की जड़ पर प्रहार नहीं कर रहे। समस्या यह है कि शिक्षा के मामले में यह देश भटक गया है ।
आज़ाद भारत में नारा लगा था- राष्ट्रपति का बेटा हो या हो भंगी की संतान, शिक्षा सबको एक समान। क्या राहुल गांधी या सोनम वांगचुक यह चाहते हैं कि देश के तमाम बेटे- बेटियों के लिए शिक्षा एक समान हो? क्या इसकी तैयारी है? राहुल गांधी जिस सिस्टम को सड़ा हुआ कह रहे हैं, उसकी सड़ांध यह है कि किसी सरकार ने एक समान शिक्षा देने की बात नहीं सोची आज यह सवाल भी कोई नहीं कर रहा। देश के सभी बच्चों के पठन- पाठन की ज़िम्मेदारी सरकार ले और उसके सिलेबस और सुविधाएं एक तरह की हों। देश के सभी बच्चों का मौलिक अधिकार होना चाहिए कि वे समान शिक्षा के हकदार हों।
दूसरी बात- सरकार सरकारी स्कूलों को बंद कर रही है और निजी स्कूलों की स्थापना में पूँजीपतियों के ख़ूँख़ार समूह घुस आए हैं । उनके लिए शिक्षा एक उद्योग है , जहाँ बेशुमार मुनाफ़ा कमाया जा सकता है। विश्वविद्यालयों में भी देशी- विदेशी हस्तक्षेप जारी है। निजीकरण से शिक्षा तबाह हो गई है और पाँच किलो अनाज पर पलने वाले बच्चों के लिए शिक्षा दूर की कौड़ी बनती जा रही है। क्या राहुल गांधी या सोनम वांगचुक शिक्षा के निजीकरण रोकने का काम करेंगे?
तीसरी बात है कि महंगे- महंगे कोचिंग संस्थान । कोचिंग संस्थानों की बाढ़ आ गई है। स्कूलों की शिक्षा ऐसी क्यों नहीं है कि बच्चों को खुद पर भरोसा हो सके? अगर राहुल गांधी या सोनम वांगचुक शिक्षा को लेकर गंभीर हैं तो इस दिशा में भी काम करना होगा।
