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Bihar Investment Environment: विज्ञापन बाजी तो तेज है पर निवेश वातावरण निचले पायदान पर है

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Bihar Investment Environment: नीति आयोग के सर्वेक्षण में बिहार और झारखंड का नाम गायब

नीति आयोग के ताजा सर्वेक्षण से सबक यह मिलता है कि बिहार निवेश वातावरण बनाने में फिसड्डी राज्य है।

गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र के साथ-साथ उड़ीसा और केंद्र शासित प्रदेश गोवा को 50% से अधिक अंक मिला है।

सम्राट चौधरी ने बिहार के अखबारों में पहले पेज पर विज्ञापनों की झड़ी लगा रखी है। बहुत शोर शराबा मचाया है। परंतु निवेश के अनुकूल सूचकांक में बिहार फिसड्डी राज्य बना हुआ है।

नीति आयोग ने जो आंकड़ा जारी किया है उसमें बिहार और झारखंड का नाम भी नहीं है। दोनों राज्य सबसे पीछे हैं।

पूर्वी प्रांत में उड़ीसा अच्छा कर रहा है और असम ने भी अच्छे संकेत दिए हैं। पूर्वोत्तर के सात राज्य अशांत राज्यों में हैं परंतु यहां निवेश के लिए वातावरण है। बिहार में नहीं है।

रोजगार और बुनियादी ढाँचे की वास्तविक स्थिति

रोजगार के मौके बनाने में बिहार एकदम पीछे है। यह झारखंड और पश्चिम बंगाल से कदमताल कर रहा है। तो रोजगार कहां से पैदा होगा। रोजगार के लिए माहौल बनाने में सरकार एकदम पीछे है।

जहां उड़ीसा को निवेश के लिए अनुकूल माहौल के सूचकांक में 52% से ज्यादा अंक मिला है, वहीं बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल एकदम पीछे हैं।

28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों को 8 मानदंडों पर देखा गया। निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाने में गुजरात को 57% तक और महाराष्ट्र को 54% तक अंक प्राप्त हुआ। तमिलनाडु 53% और केंद्र शासित प्रदेश गोवा 53% से ज्यादा रहा। उड़ीसा भी 52% से ज्यादा रहा। इस तरह केवल पांच राज्य ही 50% से ज्यादा अंक पा सके हैं।

बिहार में कारोबारी माहौल नहीं है और बुनियादी ढांचा का भी अभाव है। यहां निवेश नहीं हो रहा है। तमिलनाडु एकमात्र राज्य है जहां बुनियादी ढांचा और कारोबारी माहौल बेहतर है।

नीति आयोग ने यह सर्वेक्षण किया है और नतीजों को जाहिर किया है। जो टेबल सबसे ज्यादा ध्यान खींचते हैं उसमें बिहार झारखंड का नाम नहीं है।

बिहार में सुधार के लिए बहुत कुछ करना है और यहां कुछ करने के नाम पर आम जनता को परेशान करने के अलावा बहुत खास काम नहीं किया जा रहा है।

बुनियादी विकास, सड़क, बिजली और ज़मीनी हकीकत

बिहार में शहरी आबादी नहीं है। इसके लिए नीतीश सरकार ने कई ग्राम पंचायत को नगर पंचायत बनाकर कोशिश की। पर नगर की आबादी बढ़ने का यह कृत्रिम तरीका किसी अंजाम तक नहीं पहुंच रहा है।

नीतीश सरकार ने बिजली और सड़क का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया। हर मौसम में तेजी से पटना पहुंचने वाली सड़क लगातार बनाई गई। और 4 घंटे में पटना पहुंच जाएं यह लक्ष्य रखा गया। हर टोल बस्ती को हर मौसम में गाड़ी जाने लायक सड़कों से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया।

बिजली लगभग सभी गांवों में पहुंच गई। अभी भी यहां वे लोग जो वास भूमि के अभाव में रहते थे उनके लिए नीतीश सरकार ने सात निश्चय में ऊंची घोषणा की। पूरे प्रशासन तंत्र ने इस लक्ष्य को पूरा होने नहीं दिया। परंतु खुद से और सामाजिक राजनीतिक संगठनों के सहयोग से भूमिहीन जनता ने नए सिरे से बस्तियां बसा लीं। पर उन तक बिजली नहीं पहुंची है।

कृषि संकट और फूड प्रोसेसिंग उद्योगों का अभाव

रोजगार के लिए और हर खेत को सिंचित बनाने और बिहार में पूंजी का निवेश करने की बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गईं, उसका हासिल बहुत कम है। गांव में 85% से ज्यादा लोग अभी भी रह रहे हैं और इनमें से आधे से ज्यादा लोग खेती पर निर्भर हैं।

परंतु खेती में रोजगार पैदा करने के माहौल का पूरा अभाव है। अभी भी पंजाब बहुत अधिक तरक्की कर रहा है। जबकि हरित क्रांति के परिणामों पर फिर से विचार हुआ और बिहार, असम तथा बंगाल जैसे प्रांतों में सदाबहार कृषि क्रांति की बात होने लगी।

बिहार में खेती करने वाले लोग चाहे जितना भी जोर लगा लें, सरकार का सहयोग काफी कम है। किसान की खेती घाटे में है। खेतिहर श्रमिक दूसरे प्रदेशों में पलायन कर रहे हैं। मध्यम किसान बर्बाद हो रहे हैं।

खेती से जुड़े उद्योगों के विकास के लिए भी निवेश का वातावरण नहीं है। फूड प्रोसेसिंग यानी खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए भी कोई निवेश संकेत नहीं मिल रहा है।

बिहार की इन नाकामियों की जड़ नीति आयोग के इस ताजा सर्वेक्षण से पकड़ में आती है। जानते चलें कि नीति आयोग ने 8 स्तंभों में पहले 84 संकेतकों पर 100 अंकों के आधार पर अलग-अलग राज्य को अंक दिया था।

सरकारी नीतियाँ और औद्योगिक दिशा की कमी

सम्राट चौधरी की सरकार बने, उसके पहले एक विवादास्पद घोषणा पर चर्चा चल रही थी। अदानी को भागलपुर के पीरपैंती में 1010 एकड़ जमीन बिना पैसा लिए दे दिया गया। अदानी ताप बिजली घर बना रहा है।

सम्राट सरकार ने दूसरी घोषणा की है कि भागलपुर से सटे जिले बांका के बेलहर में परमाणु बिजली घर बनाया जाएगा। इसको लेकर आदिवासी बहुल इलाके में अशांति है।

कुछ समझ में नहीं आया तो बिहार में 11 सैटेलाइट सिटी बनाने की घोषणा कर दी। इस बारे में प्रभावित लाखों परिवारों से राय-मशविरा भी नहीं किया गया। इनमें लाख एकड़ जमीन पर रहने वाली और खेती करने वाली आबादी पूरी तरह से अशांत हो गई है।

बिहार जैसे प्रांत में मुख्यमंत्री के दिमाग में आर्थिक प्रगति की प्राथमिकता रहनी चाहिए। वित्त मंत्री आर्थिक दृष्टि से संपन्न व्यक्ति को होना चाहिए। वित्त सचिव के लिए इस योग्य व्यक्ति का चुनाव किया जाना चाहिए।

उद्योग विभाग में किसी मंत्री के बने रहने का आधार यह होना चाहिए कि औद्योगीकरण की दिशा में उसका ट्रैक रिकॉर्ड क्या है। उद्योग लगाने की सफलता के आधार पर उद्योग विभाग का प्रधान सचिव या सचिव योग्य माना जाए।

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