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गांधी जब सोनम वांगचुक से मिले — डॉ. योगेंद्र

गांधी जब सोनम वांगचुक से मिले — डॉ. योगेंद्र
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बाहर बहुत शोर मचा हुआ था। इससे महात्मा गांधी की नींद उचट गई। राजघाट पर वे सत्त्तर साल से सोये थे। उन्हें याद आया कि कोई नवयुवक प्रार्थना सभा में आया था जिसने पहले पांव छुए और फिर गोली मार दी। उन्हें यह भी याद आया कि महाराष्ट्र के पंचगनी में उससे पहली मुलाक़ात हुई थी। खैर वर्षों बाद महात्मा गांधी अपनी कब्र से उठे। फिर उन्होंने राजघाट को निहारा। अनेक लोग उनकी कब्र पर फूल चढ़ा रहे थे और हाथ जोड़े खड़े थे। उन्होंने अपने शरीर को देखा। कलेजे पर तीन गोलियों के निशान थे। निशान के चारों तरफ रक्त की सूखी पपड़ियाँ थीं । उन्होंने पहले सोचा कि इसे धो लिया जाए । फिर उनका मन बदला। उन्होंने तय किया कि जब इतने वर्षों से पपड़ियाँ पड़ी हैं । किसी ने धोया नहीं तो मैं क्यों धोऊँ? शरीर पर लँगोटी वैसी ही थी। गोली लगते वक़्त शरीर पर जो चादर थी, उस पर ख़ून के छींटे थे, लेकिन वह अब तक साबूत थी। उन्होंने अपनी लाठी ढूंढी । वह ग़ायब थी। अलबत्ता उनका वह चश्मा अभी तक क़ायम था, जिसमें डंडी के बदले रस्सी लगी थी। उन्होंने अपनी टायर वाली चप्पल की तलाश की। वह बग़ल में पड़ी थी। उस पर बहुत धूल जमी थी। उन्होंने धूल साफ़ की और पैरों में डाल लिया।

गांधी जब सोनम वांगचुक से मिले

चूँकि लाठी नहीं थी और वर्षों से वे चले नहीं थे, इसलिए पाँव उठ नहीं पा रहे थे। किसी तरह ज़ोर देकर पांव को आगे बढ़ाया और राम मनोहर लोहिया अस्पताल चल पड़े । ज़ेहन में जब लोहिया की तस्वीर उभरी तो वे मुस्कुराए । बड़ा बातूनी था लोहिया। नटखट भी। हर समय छेड़ता रहता था। कभी कभी उस पर खीज भी आती थी। मगर वह बहुत तार्किक था और ज़िद्दी भी। सम्मान भी बहुत करता था , लेकिन अपने विचारों पर अड़ा रहता था। गांधी राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुँचे। अस्पताल में डॉक्टर, नर्स और सैकड़ों बीमार लोग । वे उस वार्ड में पहुँचे, जहाँ संसद मार्च के दौरान घायल हुए बच्चे थे। उन्होंने बच्चों को देखा। किसी के सिर पर पट्टी लगी थी तो किसी के पांव पर प्लास्टर। किसी के टूटे हाथ झूल रहे थे तो कोई लेटा हुआ कराह रहा था। दसियों बच्चे ट्रैक्शन पर थे। एक अच्छी बात यह थी कि कोई नाउम्मीद नहीं था। वहां से वे वेदांता अस्पताल पहुँचे । वे सोनम वांगचुक से मिले। सोनम वांगचुक उन्हें देखकर हड़बड़ाये।

“बापू , आप और यहाँ? “ वांगचुक आगे बोल नहीं पा रहे थे।

“ हाँ , मैं । मैं तुम्हें देखने आया । सुना था कि तुम बच्चों के लिए अनशन पर थे। कल तुम्हारे पास कोई मंत्री आये थे। उन्होंने जूस पिलाया तुम्हें? खूब मजा आया होगा ! “

सोनम वांगचुक समझ नहीं पा रहे थे कि गांधी जी आशीर्वाद दे रहे हैं या व्यंग्य कर रहे हैं । वे भौंचक्के से थे कि गांधी फिर बोल पड़े – “ तुम्हारी मांगें पूरी हो गईं?”

“ उन्होंने आश्वासन दिया है बापू ।” वांगचुक की घिग्घी बंध रही थी।

“ तो तुम सरकार से आश्वासन लेने के लिए उपवास पर थे।” सोनम वांगचुक चुप रहे।

आगे गांधी जी ने कहा कि तुम्हारी माँग जवाबदेह सरकार बनाने और शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े के लिए थी, क्या ये मांगें पूरी हो गई?

सोनम वांगचुक को काटो तो ख़ून नहीं ।

गांधी जी ने ग़ुस्से में कहा-“ तुम्हें या तो अनशन नहीं करना था और अगर करना था तो बिना माँग पूरी हुए लौटना नहीं था। यह तो धोखा है। जिन बच्चों के लिए तुमने अनशन किया था । उनसे तुमने पूछा कि मैं अनशन तोड़ूँ या नहीं? उन्हें तुमने मरने के लिए या तो जंतर मंतर पर छोड़ दिया या फिर राम मनोहर लोहिया अस्पताल में। तुमने उसकी कराह सुनी? कैसे अनशनकारी हो तुम? अपने बारे में ही सोचते रहे । ऐसी कलंकित ज़िंदगी लेकर जिओगे तुम । छींह…” और बापू वांगचुक के कमरे से निकल पड़े।

बापू वेदांता अस्पताल के गलियारे में ज्योंही आये। सोनम वांगचुक फफक- फफक कर रो पड़े।

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