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जंतर-मंतर पर गांधी जी के सवाल: लोकतंत्र, सत्ता और आज़ादी पर डॉ योगेंद्र का बड़ा लेख

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गांधी जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के घर से बेआबरू होकर निकले थे। रह रह कर नरेंद्र मोदी जी के द्वारा कहे अपशब्द कानों में गूँज रहे थे। वे जंतर- मंतर की ओर चल पड़े। जंतर मंतर वहां से दूर नहीं था।

रास्ते में उन्होंने बहुत कुछ देखा। मंत्री और सांसदों की कोठियाँ, उनकी चमक- दमक और कोठियों से गूँजते अहंकार। गांधी जी सोचते थे कि लोकतंत्र को गाँवों से संचालित होना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र कोठियों में समा गया है। सभी लोगों को कोठियाँ चाहिए। अंग्रेज़ थे तो उन्हें कोठियाँ चाहिए थीं।

जब देश के विभाजन की नींव रखी जा रही थी तो वे तीन- चार बार वायसराय हाऊस गये थे। क्या उनके ठाट थे। 320 एकड़ में बने 340 कमरे। उनके गलियारे ही लगभग तीन किलोमीटर के हैं।

सत्ता की कुर्सियों पर नक़लची

राजागोपालाचारी जी भारत के पहले गर्वनर जनरल बने। जब वे वायसराय हाऊस पहुँचे तो उन्हें बहुत बुरा लगा। भला इतने बड़े भवन में निर्धन मुल्क का शासक कैसे रह सकता है? लेकिन बाद में आदत हो गई।

डॉ राजेंद्र प्रसाद भी भूंजा फाँकते हुए यहीं रहे। गांधी जी का मन 1948 के ही दौर में था, लेकिन सच यही था कि गंगा में बहुत सारा पानी बह चुका था। अंग्रेज़ों की कोठियों में देशी अंग्रेज़ आ गये। इनके नख- दंत भी वैसे ही हैं, जैसे अंग्रेज़ों के थे। क्या बदला इस देश में? सत्ता की कुर्सियों पर नक़लची अंग्रेज़ बैठे हैं।

गांधी जी को याद आया। रक्त में डूबी हुई आज़ादी का झंडा जब 15 अगस्त को फहराया जा रहा था, तो वे कोलकाता में थे। आज़ादी की सफेद चादर पर ख़ून के छींटे थे। उन्होंने लाख मना किया था कि देश के टुकड़े न करो।

हम लेके रहेंगे आज़ादी” का क्या मतलब है

जिन्ना, माउंटबेटन, नेहरू, पटेल सबको समझाया कि विभाजन आत्मघाती होगा, लेकिन हरेक को लगता था कि बँटवारा ही मारकाट को रोक सकता है। बँटवारा हुआ, लेकिन कहाँ रूका मारकाट का सिलसिला। एक से दो देश हुए, दो से तीन हुए, लेकिन विभाजन के ज़हर से मुक्ति नहीं मिली। अब तो नफरत के शोलों पर तीनों देशों में राजनीति की रोटियां सेंकी जा रही हैं।

यह सब सोचते- सोचते गांधी ज़ी जंतर मंतर पहुँच गए। वहाँ का मजमा टूट चुका था। सभी आंदोलनकारी अपने अपने घर लौट गए थे। वहाँ मात्र प्लास्टिक की बोतलें चुनने वाली कुछ स्त्रियां थीं। टूटे- बिखरे बाँस- बल्ले। अलबत्ता गांधी जी की लाठी यहीं थीं। वह मंच के पास मिलीं। गांधी जी ने लाठी उठाई और सीने से लगा लिया।

उनकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि नेहा बोरा और अभिजीत दिपके से मिलने की, लेकिन वे लोग तो जीत के जश्न में डूब गए थे।

गांधी जी को हँसी आई। जब देश आज़ाद हुआ था, तो वे चाहते थे कि भारत के अनुकूल शिक्षा हो। उन्होंने रास्ता भी सुझाया था। आगे कुछ करते कि उनके सीने में तीन गोलियाँ दाग दी गईं थीं।

आज वे जंतर मंतर पर बैठे युवाओं से पूछना चाहते थे कि “हम लेके रहेंगे आज़ादी” का क्या मतलब है? कैसी आज़ादी चाहते हो? एक मंत्री को हटाने से आज़ादी मिल गई? क्या तुम्हारी आज़ादी की सीमा यही है?

सिस्टम नहीं चाहिए जिसमें नागरिक बेइज़्ज़त होते रहें

आज़ादी के बाद एक भयानक गलती की गई और तुम भी वही कर रहे हो? देश का जो सिस्टम है, वह अंग्रेज़ों की ही देन है। इसमें जनता विरोधी कीटाणु हैं। इस कीटाणु को दूर करना होगा।

देखा नहीं तुमने कि बेटियों के कपड़े फाड़ने में कोई नहीं शरमाया- न पुलिस, न नेता, न सत्ता। आज़ाद देश को ऐसा सिस्टम नहीं चाहिए जिसमें नागरिक बेइज़्ज़त होते रहें।

शिक्षा के सिस्टम में यह दुर्गुण है कि सत्ता में बैठे लोग आदमी को आदमी नहीं मानते। दरअसल देश में लोकतंत्र नहीं चल रहा, तंत्रलोक चल रहा है। तंत्र का राज है, लोक तो मारा- मारा फिर रहा है।

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