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चिड़िया के बिना यह दुनिया कायम रह सकेगी? डॉक्टर योगेन्द्र ने उठाया पार्यावरण पर सवाल
सुबह जब टहलने जाता हूँ तो गाछ- वृक्ष, जंगली फूल और चिड़िया को देखता हूँ । कौए, गोरैए, घरेलू और जंगली मैना, कबूतर को तो पहचान लेता हूँ, लेकिन कई ऐसी चिड़िया भी हैं, जिन्हें पहचान नहीं पाता। आज कुछ ज़्यादा ही सबेरे निकल गया था। उस वक्त चिड़िया बाहर नहीं आई थी। लौटते वक्त चिड़िया घोंसले से बाहर आ गयी थी। बिजली के तार पर, छतों पर और सड़क पर वह दिखाई देने लगी थी। मैंने देखा कि एक जगह बिजली के तार पर चार कौए बैठे थे जिनमें एक कौआ बच्चा था। तभी एक कौआ उड़ता हुआ आया और बच्चे कौए के मुख में अपनी चोंच डाली। यानी कहीं से वह खाना लाया था, बच्चे को खिलाया।
मेरे मन में आया कि जो कौआ खाना लेकर आया था, वह नर होगा या मादा? नर तो कामायनी के मनु की तरह होता है। अपने बारे में ही ज्यादा सोचता है। श्रद्धा के प्रेम को बँटते देख मनु इड़ा की ओर झुक गया था। कर्म सर्ग की पंक्तियाँ हैं-“अपने में सब कुछ भर कैसे व्यक्ति विकास करेगा,/ यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा। /औरों को हँसता देखो मनु-हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो सब को सुखी बनाओ।”
नर बहुत हद तक बद्ध होता है। स्त्री बहुत हद तक मुक्त होती है। वैसे अपवाद सब जगह होता है। स्त्री भी स्वार्थ बद्ध होकर अपना नाश करती है और पुरुष भी, लेकिन स्त्री जननी होती है। गर्भ में पालती है, जन्म के बाद भी। उसका लगाव बच्चों से जितना होता है, उतना पुरुष का नहीं होता। खैर ।
जब मेरे मन में यह आया था कि खाना लाने वाला कौआ नर है या मादा, उसी वक्त यह भी सवाल मेरे मन में आया कि आदमी की दुनिया में मादा स्त्री है, नर पुरुष । चिड़िया में यह विभेद नर- चिड़िया और मादा- चिड़िया के रूप में करते हैं। उनका विशिष्ट नाम नहीं होता है। गाय और बैल, भैंस और भैंसा , घोड़ा और घोड़ी, गदहा और गदही करते हैं । यानी जो पशु मनुष्य- जगत से जुड़े हुए हैं, उन्हें विशिष्टता प्राप्त है। मनुष्य जगत से जो दूर है, उन्हें वह वैशिष्ट्य नहीं मिला है। मनुष्य को जो लाभ पहुँचाता है , उसे भी वह विशिष्टता प्रदान करता है और जिससे हानि पहुँचने की ज्यादा संभावना है, उसे भी। जैसे – बाघ- बाघिन, शेर – शेरनी।
मनुष्य की दुनिया से गिद्ध विदा हो गए । गोरैया विदा होने के रास्ते में है।कौए भी मरने लगता है तो झुंड में मरता है। जबकि कौआ कठजीव होता है। सबकुछ खाता है- सड़े- गले मांस से लेकर ताज़ा भात तक। वह भी आधुनिक सभ्यता की चपेट में है। हाँ, कबूतर बढ़े हैं, ख़ास कर शहरों में। क्या यह दुनिया रह सकेगी, जब वह चिड़िया विहीन हो जाएगी? मनुष्य को बहुत सधे क़दमों से आगे बढ़ना है, वरना अपने लोभ और स्वार्थ में अपनी दुनिया को ही नष्ट कर देगा।
