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ज्ञान परंपराओं की तलाश में डॉ. योगेन्द्र: भारतीय ज्ञान परंपरा, गांधी, जाति व्यवस्था और आज की जरूरत पर उठे सवाल

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डॉ. योगेन्द्र

ज्ञान परंपराओं की तलाश में डॉ. योगेन्द्र: मुझे बारिश और वसंत बहुत पसंद है। बारिश का तो बचपन से नाता है। जब सावन-भादों में धारासार वर्षा होती थी तो मैं किसी न किसी बहाने घर से निकल कर गलियों में ओहारी (खपरैल की छत का अंतिम सिरा) से गिरते पानी में छपछपाने चला जाता था। मेरे ही तरह के अन्य बच्चे भी आ जाते और हम सब बारिश का लुत्फ लेते। उस पर किशन बाबा का अमरूद। बारिश में जब बाबा घर में बंद रहते, हम सब उनका अमरूद लूट लेते।

सुबह टहलने निकला था तो झींसी गिर रही थी। मैंने रेनकोट डाल लिया था। लौटते वक्त ज़ोरदार बारिश हुई। धान, जंगली पौधे, वृक्ष और घर- बारिश में भींग रहे थे। मन में भावनाएं और यादें थीं, ज्ञान नहीं था। या कहें कि ज्ञान भावनाओं में गूँथा हुआ था।

आजकल हिंदी में ज्ञान परंपरा की बहुत बात हो रही है। फ़ेसबुक पर कर्मेंदु शिशिर और हितेंद्र पटेल को पढ़ता रहता हूँ। इनके लंबे पोस्ट को पढ़ना बौद्धिक सुकून देता है। इनके पोस्ट से बौद्धिक दुनिया के बारे में ज्ञान होता रहता है।

हितेंद्र पटेल पढ़ते भी बहुत हैं, लिखते भी और विश्वविद्यालयों में घूम-घूम कर भाषण भी। कर्मेंदु शिशिर ने कहानियाँ, उपन्यास, नवजागरण, भारतीय मुसलमान (दो खंड), शिवपूजन सहाय, रामविलास शर्मा, 1857 की राज्यक्रांति, कई पुस्तकों का संपादन जैसे महत्वपूर्ण काम किया है।

इधर राधावल्लभ त्रिपाठी की किताब आयी है- ‘भारत की सारस्वत साधना’। इस किताब की उन्होंने प्रशंसा की है। मैंने इस किताब को बुक स्टॉल पर खोजा भी। फिर मोटी, भारी-भरकम किताब आयी है अभय कुमार दुबे की ‘उपनिवेशवाद का अलौकिक साम्राज्य’। यह किताब 733 पृष्ठों की है। मैंने इसे ख़रीद ली है। उलट-पुलट कर देखा है।

वागीश शुक्ल ने भी ज्ञान परंपरा पर लिखा है। मैं इन सभी किताबों को देखना चाहता हूँ कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा को नये सिरे से कैसे व्याख्यायित कर रहे हैं और इसकी आज जरूरत क्यों आन पड़ी है?

मेरे मन में पहले पहल यह बात आयी कि कहीं यह लेखन बारह वर्षों के बीजेपी शासन काल की वजह से तो नहीं लिखी गई? बीजेपी के पीछे जो ज्ञान परंपराएं सक्रिय हैं, वे भी पाश्चात्य ज्ञान परंपरा को खारिज करने की कोशिश करती रहती हैं। आज भारतीय ज्ञान परंपरा को झाड़-पोंछ कर प्रस्तुत करने का क्या मतलब है?

गांधी भी इस ज्ञान परंपरा से जुड़े थे। वे तो इतने प्रभावित थे कि देश को उसी परंपरा के आलोक में गढ़ना चाहते थे। वैसे वे उन बुराइयों से असहमत थे, जिसने मानव को मानव नहीं समझा।

इन्हीं ज्ञान परंपराओं की उपज है- वर्ण व्यवस्था। उस व्यवस्था से निकली है समाज में तांडव मचाती जाति व्यवस्था। आज भी वह हिन्दू, मुस्लिम और ईसाइयों के सिर पर नाच रही है। हिन्दू तो इसके शिकंजे में है ही।

इस ज्ञान परंपरा के रहते हुए देश गुलाम कैसे होता रहा? वैसे आज की तरह देश नहीं था तो ये ज्ञान परंपराएं भी उसी बिखरे भू-राज्यों से आयी हैं। डॉ. लोहिया ने बार-बार इस संदर्भ में सवाल किया है।

ये ज्ञान की परंपराएँ वसुधा पर के तमाम लोगों से प्यार करने का दंभ भरती हैं तो फिर पड़ोसी से नफरत क्यों करती हैं? ये ज्ञान परंपराएँ सबके लिए क्यों नहीं थीं?

इन्हीं ज्ञान परंपराओं की ही न देन है- ‘कोऊ नृप होय हमें का हानी, चेरी छॉंडि न होयब रानी।’

क्या इस ज्ञान परंपरा की यह देन नहीं है कि सदियों से बहुसंख्यक लोग उदास और हताश रहे?

जो भी पहले किताब पढ़ी जानी चाहिए।

यह सब इसलिए लिख दिया, क्योंकि हितेंद्र पटेल और कर्मेंदु शिशिर के पोस्ट ने लिखने के लिए उकसाया।

अभय कुमार दुबे को पहले चैनलों और अब यूट्यूब पर सुनता रहता हूँ। जब वे बोलते हैं तो कहीं उलझन नहीं है और उनकी भाषा भी साफ-सुथरी है। लेकिन उनकी किताब की भाषा में टकसाली शब्द बहुत हैं।

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