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उजले दिन की कालरात्रि: प्रकृति, कृत्रिम मेधा और मनुष्य के भविष्य पर डॉ. योगेंद्र

ujle din ki kaalratri dr yogendra ai prakriti manushya bhavishya
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उजले दिन की कालरात्रि: तीन दिनों के बाद आज आसमान साफ़ है। सूरज की चमकती रोशनी में प्रकृति चमक रही है। घर, खेत, वृक्ष और झाड़ियाँ। सुबह जैसे ही घर से टहलने निकला था, वैसे ही मुझे कामायनी की पंक्तियाँ याद आने लगी थीं—

“उषा सुनहले तीर बरसती,
जय-लक्ष्मी-सी उदित हुई;
उधर पराजित काल-रात्रि भी,
जल में अंतर्निहित हुई।
वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का,
आज लगा हँसने फिर से;
वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में,
शरद विकास नए सिर से।”

तीन दिनों से आसमान यों बरस रहा था, जैसे कालरात्रि हो। उस पर तेज हवाएं। रांची में शरद का अहसास होता है। गंगा के किनारे-किनारे बसने वाले शहरों में मोटा-मोटी तीन ऋतुओं का अहसास होता है-ग्रीष्म, वर्षा और जाड़ा। शरद, हेमंत और शिशिर तीनों मिल गये हैं और वसंत को ठंड और गर्मी ने दबोच लिया है। किसी दिन जब बच्चों को पढ़ाया जाएगा कि वर्ष में तीन ऋतुएँ होती हैं। ज्ञान भी तो प्रकृति पर आश्रित है।

स्वामी विवेकानंद कहते हैं- “समस्त मानव ज्ञान अनुभव से उत्पन्न होता है, अनुभव के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से हम कुछ भी नहीं जान सकते। हमारी सारी तर्कना सामान्यीकृत अनुभव पर आधारित है, हमारा सारा ज्ञान सामंजस्यपूर्ण अनुभव ही है।”

उन्होंने ये बातें अमेरिका में ‘अमरत्व’ पर प्रवचन देने के दौरान कही थीं। ज्ञान अलौकिक नहीं होता, वह लौकिक होता है। लोक के अनुभवों से हम सीखते हैं और ज्ञान का संसार खड़ा करते हैं।

एआई चुपके से हमारी ज़िंदगी में प्रवेश कर गयी है। एआई यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम मेधा)। इस कृत्रिम मेधा को जन्म देने वाला मनुष्य ही है। संभव है कि मनुष्य द्वारा निर्मित यह कृत्रिम मेधा मनुष्य के खिलाफ खड़ी हो जाए, लेकिन यह मेधा भी मनुष्य के अनुभवों का पुंज ही है।

मनुष्य की कृत्रिमता अक्सर मनुष्य को मार देती है। मनुष्य जितना सभ्य होता जाता है, वह उतना ही कृत्रिम होता जाता है। कृत्रिमता ही उसकी सभ्यता बन जाती है।

प्रकृति के साथ विकास होना चाहिए। प्रकृति के खिलाफ नहीं। समुद्र, वन, पेड़, नदियाँ आदि नहीं रहेंगी तो मनुष्य कैसे रह सकता है? इज़रायल हमारे पिता नहीं हैं, हमारे पिता और माता दोनों प्रकृति ही है।

मनुष्य ने अणु बम, परमाणु बम, हाइड्रोजन बम, मिसाइल आदि विनाशकारी चीज़ें बनायी हैं। काश, मनुष्य को सद्बुद्धि आती और वे इन अस्त्र-शस्त्रों में लगी पूंजी मनुष्य के दुख-दर्द को दूर करने में लगाते।

नेतन्याहू, ट्रंप, पुतिन, जिनपिंग आदि ने दुनिया में कुहराम मचा रखा है। इन्होंने दुनिया के समानांतर एक और दुनिया बना रखी है। ये हर वक्त दूसरे मुल्कों के संसाधनों को हड़पना चाहते हैं। दुनिया में गिरहकटों की फौज खड़ी हो रही है।

मेधा कृत्रिम मेधा बना रही है, लेकिन ये मेधा दुनिया की छह अरब आबादी के प्रति संवेदनशील और ज़िम्मेदार नहीं है। होना तो यह चाहिए था कि मेधा धरती पर जन्म लेने वाले हर आदमी को सबसे पहले सम्मान के साथ जीने के लिए संसाधन उपलब्ध करवाती।

आज भी दुनिया की मेधा को गैर बराबरी कायम करने में लगी है। कृत्रिम मेधा भी दुनिया पर नियंत्रण करने के लिए बनाई गई है। इस सदी की एक और उपलब्धि है कि मेधा धीरे-धीरे दुनिया के खिलाफ खड़ी हो रही है।

अनुभव आश्रित मेधा एक दूसरे को सम्मान और विकास के लिए स्पेस नहीं देती, बल्कि एक दूसरे को कुचलना चाहती है।

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