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धार्मिक अनुष्ठानों के पीछे का सत्य: डॉ. योगेन्द्र ने धर्म, आस्था और राजनीति पर उठाए सवाल
धार्मिक अनुष्ठानों के पीछे का सत्य
दशहरा देखने का शौक बहुत पहले मिट चुका है । खास कर जबसे महिषासुर-वध के पीछे के सत्य का अहसास हुआ है । दुर्गा पूजा वर्षों से चली आ रही है। उत्सवधर्मिता भारतीयों की आदत है और वे तथाकथित धार्मिक से ग्रस्त रहते हैं। धार्मिक व्यक्ति की एक बुरी आदत होती है कि वह तर्क नहीं करता, न तर्क को तवज्जो देता है। वह घटना को मान लेता है, घटना का विवेचन नहीं करता। ईश्वर है, मान लिया। खुद भी माना और बच्चों को भी मनवाया। बच्चे का दिमाग भी कुंद हो जाता है । उसकी जिज्ञासा ख़त्म हो जाती है। ईश्वर की उसकी तलाश बंद हो जाती है। पूरा जीवन जी लेता है, लेकिन उसके अंदर ईश्वर के लिए तड़प नहीं होती। वह मंदिरों में, पत्थरों में, मस्जिदों में, गिरिजाघरों में यानी धार्मिक स्थलों में तलाश करता रहता है। और वह तलाश भी क्या करता है, अनुष्ठानों की औपचारिकता निभा देता है। बहुत कम लोग हैं जो वस्तुतः धार्मिक हैं। बहुत कम लोग हैं जिन्हें ईश्वर में विश्वास है। ईश्वर को अगर मान भी लेते हैं और यह भी मानते हैं कि ईश्वर ने ही जन्म दिया, तब कोई चमार, कोई भंगी, कोई ब्राह्मण, कोई राजपूत तो कोई यादव, कुशवाहा आदि कैसे हो जाते हैं? यहां तक कि कोई हिंदू, कोई मुसलमान और कोई ईसाई कैसे हो जाता है? दरअसल जो धर्म की दुहाई देते हैं, वे सबसे बड़े ईश्वर विरोधी हैं।
रात दिन झूठ की खेती
मनुष्य नामक यह छोटा सा जीव कितना ख़तरनाक होता है कि ईश्वर का चढ़ावा चुरा लेता है। उसकी मूर्ति चुरा कर बेच देता है और ईश्वर भी कुछ नहीं कर पाते और ईश्वर भक्त तो जानते हैं कि उनके लिए ईश्वर इस्तेमाल की चीज़ हैं।
दो घटनाएँ देखिए । एक बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की है और दूसरी सुपौल में नवरात्र कर रही महिला की। सम्राट चौधरी कहते हैं कि मोदी जी जब पक्के का मकान ग़रीबों को देने लगे तो प्रभु श्रीराम भी मोदी जी से घर मांगने लगे। तब मोदी जी ने उन पर कृपा की और उन्हें घर दिया। यह बयान कितना विकृत है! एक तरफ दावा करते हैं कि प्रभु श्रीराम ने पूरी दुनिया बनाई और दूसरी तरफ रात दिन झूठ की खेती करनेवाले मोदी जी उन्हें घर देते हैं। सम्राट चौधरी के इस बयान को किसी रामभद्राचार्य ने नहीं काटा। मोदी जी, अमित शाह जी, स्मृति ईरानी जी और तमाम चंदन टीका धारियों ने एक शब्द नहीं कहा। सम्राट चौधरी का अहंकार कितना बढ़ा हुआ है कि वे श्रीराम को भी नहीं छोड़ रहे। क्या वे श्रीराम को भगवान मानते हैं? वे नहीं मानते। श्रीराम उनके लिए महज़ वोट है। उनसे लाभ लेना है, इसलिए राम राम जपते रहना है।
सुपौल की एक महिला छाती पर कलश रख कर नवरात्र कर रही थी। उसने ऐसा कठिन व्रत पूरी श्रद्धा से लिया था, इसमें शक की गुंजाइश नहीं है, लेकिन क्या हुआ? अंतिम दिन उसका देहांत हो गया। दुर्गा माँ ने अति पवित्र और श्रद्धालु स्त्री तो नहीं बचाया। वजह साफ है कि दुर्गा माँ बचा ही नहीं सकती थी। उसके पास इतनी ताकत ही नहीं है। गलत बयान देने पर श्रीराम ने सम्राट चौधरी को कुछ नहीं कहा और पूरी निष्ठावान औरत को दुर्गा माँ बचा नहीं सकी। दिल और दिमाग को सक्रिय कर समझने की कोशिश करनी चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है?
