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ज्ञान परंपराओं से कुछ सवाल: डॉ. योगेंद्र ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर उठाए सवाल
आज रांची का आकाश साफ़ है. सुबह हल्की ठंड रहती है और फिर सूरज उग आता है. सूरज भले गर्म हो जाता है, लेकिन हवा में ठंड रहती है. अक्तूबर अब ढलान पर है. शहर से दस किलोमीटर दूर रहने के कारण अमूमन यहाँ कोई शोरगुल नहीं है. दुर्गा की मूर्ति बैठी है, लेकिन परेशान करने वाली ध्वनि नहीं है. भारतीय समाज के कई रंग हैं. समाज का एक हिस्सा दुर्गा की पूजा कर रही है, तो एक छोटा सा हिस्सा शोक भी मना रहा है. झारखंड में असुर जनजाति के लोग शोक मना रहे हैं.
महिषासुर के सीने में लगे त्रिशूल उन्हें पीड़ित करते हैं. उनका मानना है कि महिषासुर उनके पूर्वज थे, जिनकी हत्या दुर्गा ने की है. पौराणिक इतिहास में बहुत कुछ ऐसा है, जो आपत्तिजनक है. बहुसंख्यक जनता को ग़ुलाम बनाने के लिए बौद्धिक और उत्सवी साजिश रची जाती रही है. समय के साथ उनके इतने स्तर हो गए हैं कि सच्चाई का पता नहीं चलता.
‘भारत की सारस्वत साधना’
अभी हाल में राधावल्लभ त्रिपाठी की भारी-भरकम किताब आई है—‘भारत की सारस्वत साधना’. यह किताब 556 पृष्ठ की है, मैंने अभी तक 182 पृष्ठ पढ़ी है. किताब की शुरुआत ऐतरेय महीदास से होती है और प्राच्यवाद पर ख़त्म होती है. इसमें पाणिनि, कौटिल्य, वात्स्यायन, भरतमुनि, भर्तृहरि, शंकराचार्य, वामन, आनंदवर्धन, कुंतक, अभिनवगुप्त, पण्डितराज जगन्नाथ, गोपीनाथ कविराज, रामावतार शर्मा, रेवाप्रसाद द्विवेदी हैं. उनकी नजर में यह भारत की ज्ञान परंपरा है.
आजकल ज्ञान परंपरा की घोटाई बहुत चल रही है. हरेक बुद्धिजीवी को भारत की ज्ञान परंपरा की तलाश है. उन्हें लगता है कि उनकी ज्ञान परंपरा के साथ किसी ने साजिश की है.
भारत में ज्ञान की दो परंपराएं हैं
राधावल्लभ त्रिपाठी की किताब पढ़ते हुए लगता है कि त्रिपाठी जी ने भी ज्ञान-परंपरा के साथ धोखाधड़ी की है. भारत की सारस्वत साधना में आलवार संतों, बुद्ध, महावीर, अंबेडकर और सिद्ध आदि क्यों नहीं है? क्या उनकी परंपरा भारतीय नहीं है? या उनकी एक अलग ज्ञान परंपरा है, जो इस ज्ञान परंपरा के ख़िलाफ़ है? यह जो भारत है, उसमें अरुणाचल, मेघालय, नागालैंड, अंडमान निकोबार, असम और दक्षिण राज्य आते हैं या नहीं? उनकी कोई ज्ञान परंपरा है या इनमें ही समाहित हैं?
मुझे लगता है कि भारत में ज्ञान की दो परंपराएं हैं—एक, जो आदमी को ग़ुलाम बनाती है और दूसरी ज्ञान परंपरा आदमी को मुक्त करती है. संस्कृत में उपलब्ध सारी ज्ञान परंपराओं में सब कुछ उत्कृष्ट है, यह बात मानी नहीं जा सकती. बहुत से कूड़ा करकट हैं, जिन पर विचार करना चाहिए और इस परंपरा से अलग जो उपलब्ध ज्ञान है, वे अभारतीय नहीं हैं, उनका सम्मान किया जाना चाहिए.
इतिहास को समझा जाए
राधावल्लभ त्रिपाठी, वागीश शुक्ल, अभय कुमार दूबे आदि की कोशिश है कि यूरो केंद्रित दृष्टि से इतिहास न लिखा जाए, बल्कि ग़ैर-यूरो केंद्रित दृष्टि से इतिहास को समझा जाए. यह कोशिश ग़लत नहीं है, लेकिन अपनी ही ज्ञान परंपरा को विजातीय ज्ञान परंपरा मान लेना आख़िर कौन सी भारतीय दृष्टि है?
इसके अलावे उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि संस्कृत की ज्ञान परंपरा एक बंद डब्बा थी और उसके दरवाज़े सब के लिए खुले नहीं थे. अंतिम बात यह कि इस ज्ञान परंपरा के रहते हुए भारत भूमि ग़ुलाम क्यों होती रही और भारत भूमि पर रहने वाले अपने ही बहुसंख्यक लोग के शरीर अछूत कैसे हुए?
