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CJI Chandrachud Controversy: चंद्रचूड़ के CJI बनने पर फिर उठा विवाद, पूर्व SC जज के बयान से मचा बवाल
CJI Chandrachud Controversy: भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के संदर्भ में बयानबाजी का सिलसिला जारी है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने उन पर न्यायपालिका की गरिमा को कलंकित करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। यह टिप्पणियाँ तब आई हैं जब पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल की आने वाली पुस्तक ‘विदाउट फियर ऑर फेवर’ में अदालत के कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का वर्णन किया गया है।
मार्कंडेय काटजू ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, “डीवाई चंद्रचूड़ उन लोगों में से एक थे जो केवल अपने करियर की ऊंचाइयों पर पहुंचने के लिए किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए तत्पर थे। उन्होंने न्याय के प्रति अपनी शपथ का उल्लंघन किया। मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद भी उन्होंने न्यायपालिका को शर्मिंदा किया, जैसे कि जब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को अपने आवास पर गणेश पूजा में आमंत्रित किया था।”
हालांकि, जस्टिस चंद्रचूड़ के कार्यकाल के विषय में विशेषज्ञों की राय भिन्न है। एक तरफ, संविधान संबंधी मामलों के ज्ञाता और वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी जस्टिस चंद्रचूड़ के कार्यकाल को स्वर्ण काल मानते हैं। उन्होंने सरकार के प्रति अधिक विनम्रता के आरोपों को भी खारिज किया है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विकास सिंह जस्टिस कौल का पक्ष ले रहे हैं।
किताब का सारांश
पीटीआई के अनुसार, पूर्व जज संजय किशन कौल ने कॉलेजियम से संबंधित निर्णयों का उल्लेख किया है और आरोप लगाया है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा विनम्र थे। जस्टिस कौल ने अपनी किताब में बताया कि पांच नामों पर पहले से सहमति बन चुकी थी, लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने छठे उम्मीदवार के नाम को अचानक आगे रखा और उस पर सरकार की राय जानने का प्रस्ताव दिया।
उन्होंने कहा, ‘तब के मुख्य न्यायाधीश मुझे एक अलग कमरे में ले गए और यह पूछने लगे कि क्या उन्हें सरकार की राय के लिए फोन करना चाहिए।’ जब उनसे पूछा गया कि क्या तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश सरकार को खुश करने की कोशिश कर रहे थे या उसकी पूर्व अनुमति लेना चाह रहे थे, जस्टिस कौल ने उत्तर दिया, ‘मुझे नहीं लगता कि यह सरकार को संतुष्ट करने का मामला था। लेकिन, यह सच है कि उन्होंने पहले मेरे साथ नामों पर बात की थी।’
जस्टिस कौल ने उल्लेख किया
उन्होंने आगे बताया, ‘हम पांच नामों पर सहमत थे और मुझे लगा था कि कॉलेजियम के अन्य सदस्य भी इन नामों पर सहमति देंगे। लेकिन कॉलेजियम की बैठक के पहले, छठा नाम अचानक मेरे सामने आ गया। मैंने स्पष्ट कर दिया कि यह नाम मेरे लिए स्वीकार्य नहीं है और हमेशा ऐसा रहेगा।’
जस्टिस कौल ने उल्लेख किया, ‘उन्होंने मुझसे इस नाम पर सहमति बनने की आशा जताई। मैंने स्पष्ट किया कि यदि मैं सहमत भी हो जाऊं, तो अन्य सहयोगी ऐसा नहीं करेंगे, और बैठक में यही देखा गया। मैंने उनसे कहा कि यह नाम स्वीकृत नहीं होगा, क्योंकि मुझे अन्य कॉलेजियम सदस्यों की राय का ज्ञान था। संभव है कि उन्होंने छठे नाम और अन्य विकल्पों के लिए पहले ही किसी प्रकार की स्वीकृति प्राप्त कर ली हो।’
