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अलविदा लोकनायक: जेपी की अंतिम विदाई, श्रीनिवास का संस्मरण
लेखक: श्रीनिवास
इस मौके पर प्रायः हर वर्ष लिखता रहा हूँ। आज 47 साल हो गये, लेकिन लगता है, जेपी हमारे बीच, हमारे साथ हैं! हम ही उनसे कुछ दूर हो गए! 74 में जेपी 72 वर्ष के थे, 72 वर्ष के युवा जेपी! आज मैं 75 का हूँ, पर 72 साल के उस जेपी से कहीं कमजोर और थका हुआ महसूस करता हूं। तभी तो जेपी ‘लोकनायक’ बने। फिर वही सब लिखना कभी गैर जरूरी नहीं लगता! दुहराव के बावजूद। एक बार फिर…
मगर कुछ और लिखने के बाद (जिसे हटा दिया) ‘खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का…’ (मुनादी) पूरी कविता और कुछ और तथ्यों के लिए ‘मेटा’ से पूछा। नौ अक्टूबर को हुई जेपी की शव यात्रा का ब्योरा संक्षेप में मिलेगा—बांस घाट का नजारा, कौन लोग थे, राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में? उसने जो लिखा, उसमें तथ्य की गलती मिली। संवाद जारी चलता रहा, मैं अपना अनुभव टुकड़ों में बताता गया! उसने मेरे अनुभव के आधार पर एक नोट बना देने की पेशकश की। उसके नोट में भी कुछ त्रुटि थी। बताने पर झट नया ड्राफ्ट बना कर देता रहा। अंतिम ड्राफ्ट में भी कुछ गलती दिखी है, पूरा देखने के बाद बताने पर शायद फाइनल ड्राफ्ट बने; फिलहाल जैसा भी है—
जेपी की अंतिम विदाई : एक अनुयायी का संस्मरण
6 से 10 अक्टूबर 1979
कदमकुआँ आवास
उस आखिरी हफ्ते हर रात एक साथी की ड्यूटी लगती थी। डॉक्टर-नर्स तो रहते ही थे, फिर भी संगठन का एक साथी जेपी के कमरे में रहता था, कदमकुआँ स्थित महिला चरखा समिति (जेपी आवास) पर। हमें रखा जाता था ताकि अचानक जेपी इशारा करें तो हम उनकी जरूरत पूरी कर सकें, पानी दे सकें, जरूरत पड़े तो नर्स-डॉक्टर को बुला सकें। 6 अक्टूबर की रात मेरी ड्यूटी थी। रात भर उनके कमरे में रहा।
7 अक्टूबर : वाहिनी के साथी मुजफ्फरपुर रवाना
वाहिनी के बहुत से साथी मुजफ्फरपुर चले गए। वाहिनी की राष्ट्रीय परिषद का आयोजन था। परिषद में देश भर के साथी जुटते थे। मेरा परिवार तब मुजफ्फरपुर में था, मैं वहीं रुका।
8 अक्टूबर : रेडियो से मिली जेपी के निधन की खबर
सुबह रेडियो से समाचार सुना—जेपी नहीं रहे। साथी भागे। बस से पहलेजा घाट, वहाँ से स्टीमर पकड़ कर पटना। सीधे श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, जहाँ उनका शव रखा था।
गांधी मैदान में जेपी की एक झलक पाने को भीड़ उमड़ पड़ी थी, मगर सबों को अंदर जाने की अनुमति नहीं थी, संभव भी नहीं था। गेट पर वाहिनी के कार्यकर्ता मोर्चा संभाले हुए थे। हम सब 8 अक्टूबर की पूरी रात वहीं जगे रहे।
रात भर नेताओं का तांता लगा रहा। उसी रात इंदिरा गांधी और संजय गांधी आए। जनता पार्टी और अन्य दलों के तमाम नेता आए। राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी और उपराष्ट्रपति हिदायतुल्ला भी विशेष विमान से पटना आए। (मैं आश्वस्त नहीं हूँ कि यह सच है।)
संजय गांधी को देख कर वाहिनी के कुछ युवा साथी उत्तेजित हो गए, बदसलूकी कर सकते थे, संभाल लिया गया।
9 अक्टूबर : अंतिम विदाई
सुबह प्रशासन शवयात्रा की तैयारी कर रहा था। उससे पहले श्रीकृष्ण मेमोरियल परिसर में संघर्ष वाहिनी के मौजूद साथियों ने बाकायदा गणवेश (केसरिया स्कार्फ) में अपने सेना नायक जेपी को विदाई दी।
फिर सेना का वाहन आया, शव को उस पर रखा गया, सभी लोग आगे-पीछे बांस घाट की ओर चल पड़े। सेना की गाड़ी पर शव रखना मुझ सहित बहुतों को अच्छा नहीं लगा। जेपी जो जीवन भर सैन्यवाद और सत्ता के प्रतीकों के खिलाफ रहे, उनकी अंतिम यात्रा एक आर्मी ट्रक पर—पर यह राजकीय सम्मान का फैसला था।
मुझे जाने की इच्छा नहीं हुई। मैं अकेले पैदल वाहिनी कार्यालय—राजेन्द्र नगर—लौटने लगा। भूख लग रही थी, सड़क किनारे एक झोपड़ी नुमा होटल में घुस गया, जो मिला खाने लगा।
रेडियो पर बांस घाट पर हो रही अंत्येष्टि की कमेंट्री चल रही थी। जैसे ही सुना कि जेपी के भतीजे ने मुखाग्नि दी, मेरा हाथ रुक गया, अगला कौर नहीं खा सका।
जेपी का अंतिम संस्कार और संघर्ष वाहिनी का विरोध
दाह-संस्कार पारंपरिक वैदिक परम्परा से हुआ। यह जेपी के परिवार का फैसला था। लेकिन हम वाहिनी के लोग धार्मिक कर्मकांड को नहीं मानते थे।
इसलिए रात में ही वाहिनी की ओर से एक पर्चा छपवा कर बाँटा गया, उसमें मूल बात यह थी—‘जो जेपी अंधविश्वास और कर्मकांड के विरोधी थे, उनकी अंत्येष्टि परम्परागत वैदिक परम्परा से हो रही है। यह उचित नहीं है।’
वैसे, वाहिनी के सभी साथी भी उस मौके पर ऐसा पर्चा निकालने से सहमत नहीं थे।
10 अक्टूबर : शोक सभा नहीं, श्रद्धांजलि सभा
गांधी मैदान में सभा होनी थी। वाहिनी के कहने पर उसे ‘शोक सभा’ नहीं, ‘श्रद्धांजलि सभा’ कहा गया। शोक निष्क्रिय करता है, श्रद्धांजलि संकल्प देती है।
मंच पर एक उल्लेखनीय दृश्य था—मध्यप्रदेश की जेल से आए तीन पूर्व बागी—माधो सिंह, मोहर सिंह और एक अन्य—भी बैठे थे। वही बागी जिनका जेपी ने चंबल में आत्मसमर्पण कराया था, जिन्हें डाकू नहीं, बागी कहा था। उनका वहाँ होना बताता है जेपी कितने बड़े हृदय के थे।
धर्मवीर भारती की ‘मुनादी’ और जेपी आंदोलन
धर्मवीर भारती ने ‘मुनादी’ कविता 9 नवंबर 1974 को लिखी थी, जेपी आंदोलन के समय, हर भारतीय की जुबान पर थी—
खल्क खुदा का, मुलुक बाश्शा का,
हुकुम शहर कोतवाल का…
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढ़ाकर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी
अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है…
आज भी सच बोलने की जिद जेपी के अनुयायियों में बची हुई है!
अलविदा लोकनायक, अलविदा वाहिनी नायक—हम आपके बताए रास्ते पर चलने का भरसक प्रयास करेंगे!
—श्रीनिवास

Posted by
श्रीनिवास
Author: 1974 आंदोलन में शामिल रहा. कई बार जेल. इमरजेंसी में लगभग एक साल के लिए. तभी से सार्वजनिक की शुरुआत. फिर जेपी द्वारा गठित छात्र-युवा संघर्ष से जुड़ा, 1985 तक पूर्णकालिक कार्यकर्ता. 1986 से पत्रकारिता (प्रभात खबर) में- 2008 तक. स्वतंत्र लेखन, सामाजिक गतिविधियों में संभव सक्रियता. लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, स्त्री-पुरुष समानता में विश्वास. अनीश्वरवादी. मूलतः गांधी, जेपी, लोहिया, आंबेडकर के विचारों से प्रभावित. सांप्रदायिकता- धर्मांधता, जातिवाद और अंधविश्वास भारतीय समाज की समस्याओं के मूल कारण हैं. धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र आदि की संकीर्णता और इन आधारों पर भेदभाव देश की एकता में बाधक!
