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G7 में मोदी के ‘मिशन लाइफ’ और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ पर सवाल, डॉ. योगेन्द्र ने उठाए सार्वजनिक जीवन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुद्दे

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जी-7 देशों के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मिशन लाइफ’ और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ का सिद्धांत रखा। नरेंद्र मोदी जी देश में क्या कर रहे हैं? उनके अपनी ज़िंदगी का मिशन क्या है? उसके तहत वे देश में कैसा व्यवहार करते हैं? और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ कहने वाले प्रधानमंत्री के देश में पेड़ों के क्या हाल हैं? दुनिया तब आपकी बात सुनेगी, जब आप अपने जीवन में भी उसे उतारेंगे। मोदी जी के निजी जीवन के बारे में कुछ भी कहना बेकार है। जिनको जितना जानना है, उतना जानते हैं।

असल बातें हैं सार्वजनिक जीवन का। वे सार्वजनिक जीवन का निर्वाह कैसे करते हैं? उनके चुनावी भाषण को सुनिए। उसे सुनते हुए कभी नहीं लगता कि वे पूरे भारत को संबोधित कर रहे हैं। उनके संबोधन का कुल निचोड़ मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाना और हिन्दुओं के अंदर नफ़रत पैदा करना है। वोटों की लहलहाती फ़सल काटने के लिए संप्रदाय के खिलाफ संप्रदाय को भड़काना ज़रूरी है। दूसरा उद्देश्य है अपनी आत्म प्रशंसा। जो वो हो नहीं सकते, वह बनने की कोशिश। वे कवि, लेखक या दार्शनिक नहीं हैं, न वे राजनीतिक सिद्धांतों के प्रवक्ता हैं। लेकिन वे पूरी कोशिश करते हैं कि उन्हें दार्शनिक की तरह देखा जाए। इसी हीन ग्रंथि के प्रदर्शन के लिए नेहरू पर टूटते रहते हैं। उनकी प्रतियोगिता नेहरू के साथ है, क्योंकि नेहरू की प्रतिष्ठा हासिल करना चाहते हैं। वह प्रतिष्ठा मिल नहीं सकती, क्योंकि नेहरू का काम, कर्तव्य, लेखन, वक्तव्य आदि का युग अलग था। उनकी क्षमता और प्रतिभा अपनी थी, नरेंद्र मोदी जी की अपनी है। ‘मिशन लाइफ’ अगर ऐसी है तो विश्व उनकी बात क्यों सुनेगा?

‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसी बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती है। लेकिन जब वे विरोध के बावजूद छत्तीसगढ़ के हंसदेव जंगल गौतम अड़ानी के नाम करते हैं और लाखों पेड़ों की बलि चढ़ायी जाती है, तब ऐसे भावुक सिद्धांत का कोई मतलब नहीं रह जाता। अंडमान के विशाल जंगल और समुद्र भी अड़ानी के नाम कर रहे हैं। पीरपैंती में अड़ानी ने हज़ारों पेड़ काटे। ‘एक पेड़ माँ के नाम’ और ‘देश के जंगल अपने मित्र के नाम’ – यह उलटबाँसी उन्हें विश्व में कैसे स्थापित करेगी? गांधी किसी पद पर नहीं थे, लेकिन आज भी वे विश्व में आदर के पात्र हैं। डॉ अम्बेडकर भी कुछ दिनों के लिए क़ानून मंत्री थे। उनका भी पूरा जीवन समाज की दबी आवाज़ को स्वर देने में लगा रहा। नतीजा है कि वे देश में हर जगह सम्मान के पात्र हैं। पद कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो मरणोपरांत भी सम्मान अर्जित कर सके। देश और विदेशों में भी बहुत से लोग राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हुए, अब उनका नामलेवा नहीं है। हर वक़्त हमें अपने कार्यों और कर्तव्यों पर ध्यान देना चाहिए।

अच्छी बातें बोलने से ज़्यादा अच्छा है- अच्छी बातें जीवन में उतारना। गांधी बहुत बड़े वक्ता नहीं थे, लेकिन उन्हें अपने आचरण और व्यवहार का हर वक़्त ख्याल रहता था। लँगोटी पहन कर उन्होंने दुनिया को सीख दी। उनके पास लाख रुपए की कलम नहीं थी, न दो लाख का चश्मा था। नंगे बदन वे घूमते रहे और अपनी बात कहते रहे। दुनिया ने उनकी बातें सुनीं। आज दुनिया किसी की बात नहीं सुन रहा, न ट्रंप की, न पुतिन की, न शी जिनपिंग की। ये लोग पद पर हैं, लेकिन वे अपने लिए जीते हैं। पुतिन और शी जिनपिंग ने अपने नागरिकों की आवाज़ तक दबा रखी है और बड़बोले ट्रंप तो अहंकार में इतना डूबे हैं कि हर वक़्त मारने और दूसरे को अपमानित करने की ही बात करते हैं।

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