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गांधी, मार्क्स और आधुनिक सभ्यता: उत्पादन के औजारों से AI तक, इंसान के सामने नई चुनौती
- डॉ. योगेन्द्र
गांधी, मार्क्स और आधुनिक सभ्यता: लगभग आठ बज रहे हैं। सुबह का समय। बगबग उगी धूप खिड़कियों पर दस्तक दे रही है। घर रौशन है। धूप है, लेकिन धूप अकुलाहट पैदा नहीं करती। भादो का महीना। रांची में बारिश होती ही रहती है। तीन-चार दिनों से बारिश नहीं हुई।
टहल कर जब वापस आ रहा होता हूँ कि बरबस खेतों में हरे-भरे धान मोहते हैं। मैंने इसे रोपते देखा। बढ़ते और हरियाते देखा और अब देख रहा हूँ कि धान गभडिया गया है। कहीं-कहीं धान फूट भी गया है।
भादो में तो हथिया और कनिया नक्षत्र होता है और हथिया तो बारिश के लिए ख्यात है। लेकिन मौसम की तरह धान के बीजों में भी अंतर आ गया है। अब टर्मिनेटर बीज है। समय कम लगता है। उपज ज्यादा होती है, लेकिन उस उपज के बीज नहीं होते।
शोषण भी चक्राकार हो गया है।
आधुनिक सभ्यता की काली छाया कृषि सभ्यता को धीरे-धीरे कुचलती जा रही है।
पूंजी के हाथों में सिमटते जा रहे उत्पादन के औजार
शोषण के औजार अब उन्हें हासिल हैं, जिसके पास पूंजी है। यह पूंजी धीरे-धीरे खास तबके के पास सीमित हो रही है। खेती-बाड़ी को भी दूर बैठे पूंजीधारी नियंत्रित कर रहे हैं।
मार्क्स ने उत्पादन के संबंध बदलने की बात सोची थी और इस सोच के केंद्र में कल-कारखाने थे। मालिक और मजदूर के संबंध बदलने में ही वे क्रांति का सपना देखते थे।
उत्पादन की जो शक्तियां थीं, उस पर वे मौन रहे।
उत्पादन की शक्तियों को बदले बिना वास्तविक क्रांति हो ही नहीं सकती थी। अगर जिन औजारों के आधार पर पूंजीवाद खड़ा हुआ, उन्हीं औजारों के आधार पर समाजवाद कैसे खड़ा होगा?
गांधी और लोहिया ने इस सत्य को समझा था और दोनों ने उत्पादन के औजारों को बदलने की बात की थी। ‘हिन्द स्वराज’ और ‘इतिहास चक्र’ यों है तो पतली सी किताब, लेकिन दोनों आधुनिक सभ्यता के विकल्प और उत्पादन की शक्तियों को बदलने की बात करते हैं।
गांधी के विचारों में मशीन, श्रम, पूंजी और गांव आधारित अर्थव्यवस्था को लेकर आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की आलोचना का एक महत्वपूर्ण पक्ष दिखाई देता है।
गांधी, मार्क्स और उत्पादन की शक्तियों का सवाल
यह सच है कि मार्क्स, माओ और लेनिन पूंजीवादी साधनों के आधार पर ही दुनिया के मजदूरों ‘एक हो’ का सपना देखते थे। गांधी और लोहिया पूंजीवादी साधनों के खिलाफ थे।
अब सामाजिक कार्यकर्ताओं में भी यह बहस नहीं होती।
लोहिया ने कभी कहा था कि आधुनिक सभ्यता की दो देन हैं—गांधी और अणु बम।
गांधी तो बहुत पीछे छूट गए और अब यह दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है।
मार्क्स, माओ और लेनिन के विचारों के आधार पर जिन देशों में क्रांति हुई थी, उनके नख-दंत भी पूंजीवादी देशों की तरह हैं। उत्पादन के औजार कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित हो रहे हैं और मनुष्य मशीन मैन बनता जा रहा है।
अणु बम से AI तक पहुंची आधुनिक सभ्यता
अणु बम अब AI का रूप ले लिया है और वह पूरी दुनिया को नियंत्रित करने के फिराक में है।
अगर सावधानी नहीं बरती गयी—जिसकी उम्मीद कम दिखती है—तो होमो सैपियंस नाम जीव धरती पर नहीं पाया जाएगा। वह सुपर ह्यूमन होगा।
यंत्र आधारित इस दुनिया पर अभी मनुष्य का कब्जा लगता है। लेकिन यह संबंध उलटने वाला है।
यंत्र ही मनुष्य को कंट्रोल करेगा।
यही वह बिंदु है जहां आधुनिक सभ्यता पर गांधी, मार्क्स और लोहिया की बहस को आज की तकनीकी दुनिया से जोड़कर देखने की जरूरत पैदा होती है।
गांधी की प्रतिमा दुनिया में, लेकिन विचार कितने दूर?
गांधी की प्रतिमा सौ से अधिक देशों में लगी है। लेकिन उनकी बात तो उनके उत्तराधिकारी नेहरू और पटेल ने नहीं सुनी।
अगर सुनते तो देश ही नहीं, दुनिया ऐसी नहीं होती।
भारत को रचने में उन्होंने भी ऐतिहासिक भूल की है।
यह सवाल केवल भारत के अतीत का सवाल नहीं है। यह उस विकास मॉडल का सवाल है, जिसने उत्पादन, पूंजी और तकनीक के संबंधों को लगातार बदला है।
आधुनिक सभ्यता प्रकृति के खिलाफ या मनुष्य के खिलाफ?
जो लोग सोच रहे हैं कि आधुनिक सभ्यता प्रकृति के खिलाफ युद्ध लड़ रही है, वे भ्रम में हैं।
आधुनिक सभ्यता अब मनुष्य के खिलाफ लड़ रही है।
मनुष्य के लोभ की पूर्ति के लिए यंत्रों का इस्तेमाल हुआ और अब यंत्र मनुष्य के इस्तेमाल करने की स्थिति में है।
यही आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना है।
जिस तकनीक को मनुष्य ने अपनी सुविधा, उत्पादन और समृद्धि के लिए बनाया, वही तकनीक धीरे-धीरे मनुष्य के जीवन, श्रम और निर्णयों को प्रभावित करने वाली शक्ति बनती जा रही है।
और सवाल अब सिर्फ इतना नहीं है कि AI क्या कर सकता है?
बड़ा सवाल यह है कि—
AI के युग में मनुष्य क्या बचा रहेगा?
