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ग़ुलामी सिर चढ़कर बोल रही है
डॉ. योगेन्द्र
बहुत वर्षों बाद आज टहलने नहीं गया। इच्छा नहीं हुई। कल जब मोटरसाइकिल को स्टैंड पर खड़ा कर रहा था तो स्टैंड ठीक से लगा नहीं। मैंने हैंडल आधी छोड़ी ही थी कि अहसास हुआ कि स्टैंड लगा नहीं है, तब तक मोटरसाइकिल आधी गिर चुकी थी। उसकी जद में दाहिना पांव था। मोटरसाइकिल सँभालने में बांयें हाथ पर अतिरिक्त ज़ोर लगा। कुछ हुआ नहीं। ऊपरी तौर पर सब ठीक है, लेकिन हाथ, पैर और कमर में दर्द हो गया है। आदमी जिस दुर्घटना से गुज़रता है, देश भी उस दुर्घटना का शिकार हो जाता है। बाहर से सब ठीक दिखता है, लेकिन अंदर से वह टूट रहा होता हैं।
जवाहरलाल नेहरू ने ब्रिटिश औद्योगीकरण के असर को समझा था
13 जुलाई 1938 को जवाहरलाल नेहरू ने लंदन के लेफ्ट बुक क्लब की रैली में ‘भारत और ब्रिटेन’ विषय पर भाषण दिया। भाषण लंबा है। जवाहरलाल नेहरू कहते हैं-
“ब्रिटेन में ज्यों-ज्यों औद्योगीकरण होता गया, बड़े-बड़े शहर उभर आए और गाँवों में सन्नाटा छा गया। यह अच्छा हुआ या बुरा, मैं इसकी बात नहीं करने जा रहा। बहरहाल, हकीकत यह है कि दुनिया के लगभग सभी कमोबेश सभ्य हिस्सों में आप अधिकाधिक शहरीकरण देखते हैं, जिसका मतलब है औद्योगिक विकास। इसके विपरीत, पिछले लगभग एक सौ बरसों में हमारे देश में ज्यादा-से-ज्यादा ग्रामीणीकरण हुआ है। लेकिन आपको इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि आप बंबई और कलकत्ता जैसे शहरों को फैलता-बढ़ता देखते हैं। वे किस चीज़ के केंद्र हैं? बुनियादी तौर पर वे उस विदेशी माल के केंद्र या भंडार हैं जो सारे देश में फैलाया जाने के लिए आता है। और छोटे नगरों या गाँवों तक के खर्च से बने इन शहरों से हमने बड़े-बड़े जन-समूहों को गाँवों की ओर जाते देखा है। क्यों? इसलिए कि शहरों में उनके लिए कोई धंधा या व्यवसाय नहीं है, कोई रास्ता नहीं खुलता है, क्योंकि उनके धंधे ख़त्म हो गए हैं और लाखों लोग उन हस्त कलाओं और ऐसे धंधों में लगे हुए थे, अपना काम चालू नहीं रख सकते। पहले तो ईस्ट इंडिया कंपनी के बनाए विभिन्न क़ानूनों के ज़रिए उन्हें रोक दिया गया। बाद में आर्थिक शक्तियों के दबाव से वे पश्चिम के कारख़ानों में बने माल का मुक़ाबला नहीं कर सके।”
(पृ. 37-38, जवाहरलाल नेहरू वाड्मय, खंड-9)
भारत के परंपरागत उद्योगों की बर्बादी का सवाल
जवाहरलाल नेहरू औद्योगीकरण के दुष्परिणाम समझ रहे थे। ब्रिटिश अपने यहाँ उद्योगों में अतिरिक्त माल पैदा कर रहे थे और भारत के बाजारों में बेच रहे थे। उन्होंने इसके लिए दो काम किए- क़ानून बनाकर भारत के परंपरागत उद्योगों में बन रहे माल पर रोक लगाई और लाखों कारीगरों को जो उत्पादन के काम में लगे हुए थे, उसे बेदखल किया। दूसरे, बाज़ार पर दबाव बनाकर उस पर क़ब्ज़ा किया।
नेहरू, गांधी और विकास का मॉडल
नेहरू यह सब जानते हुए भी कि ब्रिटिश टाइप औद्योगीकरण का कुल नतीजा कारीगरों की बेदख़ली और भारतीय उद्योगों की बर्बादी है, तब भी उन्होंने ब्रिटिश टाइप के विकास का सपना देखा। गांधी के वे ख़िलाफ़ गये।
आज हालत क्या है? भारत का बाज़ार विदेशी उत्पादों से भर गया है। आत्मनिर्भरता सिर्फ़ नारा है और देश आर्थिक रूप से गुलाम बन चुका है। पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ व्यूह रचना किसी ने नहीं की। जो समझ रहे थे, उन्होंने भी सच्चाई से मुख मोड़ा और मौजूदा सरकार के पास तो कोई मुकम्मल न तो आर्थिक एजेंडा है, न सोच है।
कितना दुर्भाग्य है कि एस जयशंकर विदेश में घोषणा कर रहे हैं कि आनेवाले दिनों में देश में अन्न की कमी हो सकती है। औपनिवेशिक सत्ता की ग़ुलामी दिखाई पड़ती थी, लेकिन यह ग़ुलामी बाहर से दिखाई नहीं पड़ती, लेकिन कम भयावह नहीं है।
