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हिन्दुओं को नष्ट करने के लिए हिन्दू ही काफी है! डॉ. योगेन्द्र ने जाति व्यवस्था पर उठाए बड़े सवाल

hinduo ko nasht karne ke liye hindu hi kafi hai dr yogendra jati vyavastha
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हिन्दू समाज में एकता, जाति व्यवस्था और भारतीय राजनीति को लेकर डॉ. योगेन्द्र ने अपने लेख में तीखी टिप्पणी की है। उनका कहना है कि हिन्दू समाज के भीतर सदियों से मौजूद जातिगत विभाजन ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।

डॉ. योगेन्द्र अपने लेख की शुरुआत ही एक बेहद तीखे सवाल से करते हैं—“हिन्दुओं को नष्ट करने के लिए हिन्दू ही काफी है।” उनके अनुसार हिन्दू समाज के भीतर ही एक ऐसा दुश्मन मौजूद है, जिसके लिए इस्लाम या ईसाई धर्म की जरूरत नहीं है।

उनका तर्क है कि बाहरी चुनौतियों के कारण हिन्दू समाज में जितनी भी थोड़ी-बहुत एकता दिखाई देती है, वह बाहरी चुनौती के समाप्त होते ही खत्म हो सकती है। वह सवाल उठाते हैं कि जिस समाज में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से ही नफरत करता हो, उस समाज को आखिर कौन बचाएगा?

स्वतंत्र भारद्वाज के कथित बयानों का जिक्र

लेख में डॉ. योगेन्द्र ने स्वतंत्र भारद्वाज के कुछ कथित बयानों और उनके द्वारा किए गए दावों का भी उल्लेख किया है। लेख के अनुसार, स्वतंत्र भारद्वाज खुद को ब्राह्मण बताते हुए सनातन की रक्षा के नाम पर हिंसक तरीकों की बात करते हैं।

डॉ. योगेन्द्र सवाल उठाते हैं कि आजाद भारत में किसी व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार किसने दिया? उनका आरोप है कि ऐसी सोच व्यक्ति के अमानवीयकरण की ओर ले जाती है।

लेख में यह भी कहा गया है कि संविधान का नाम लेने के बावजूद यदि कोई व्यक्ति संविधान और कानून का पालन नहीं करता, तो यह गंभीर विरोधाभास है। डॉ. योगेन्द्र के अनुसार, इससे भी अधिक पीड़ादायक स्थिति तब पैदा होती है जब ऐसे व्यक्ति के समर्थन में जुलूस तक निकाला जाता है।

‘हिन्दुओं के पराजय का कारण है जाति’

डॉ. योगेन्द्र के लेख का सबसे महत्वपूर्ण तर्क जाति व्यवस्था को लेकर है। वह सीधे कहते हैं—“हिन्दुओं के पराजय का कारण है- जाति।”

उनके अनुसार जाति हिन्दू समाज को एक होने नहीं देगी। वह अंतर्जातीय विवाह और सामाजिक भेदभाव के उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यदि अलग-अलग जातियों के युवक-युवती विवाह करते हैं तो कई बार उन्हें सामाजिक विरोध और यहां तक कि हिंसा का सामना करना पड़ता है।

लेख में यादव द्वारा रामकथा कहे जाने पर कथित तौर पर ब्राह्मण स्त्री के मूत्र से शुद्ध किए जाने जैसी घटना का भी उल्लेख किया गया है। डॉ. योगेन्द्र इन उदाहरणों के माध्यम से हिन्दू समाज में मौजूद जातिगत भेदभाव और हीनता-बोध पर सवाल उठाते हैं।

ब्राह्मणों से लेकर दूसरी जातियों तक उपजातियों का जिक्र

डॉ. योगेन्द्र का कहना है कि जातिगत विभाजन केवल कुछ जातियों तक सीमित नहीं है। वह ब्राह्मण समाज के भीतर मौजूद विभिन्न उपजातियों—मैथिल, कान्यकुब्ज, गौड़, सारस्वत, चितपावन, श्रीमाली, अय्यर, अयंगर और कश्मीरी पंडित आदि—का उल्लेख करते हैं।

उनका तर्क है कि इसी तरह क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समाज के भीतर भी अनेक जातियां और उपजातियां मौजूद हैं तथा इनके बीच वैवाहिक संबंधों को लेकर अलग-अलग सामाजिक सीमाएं बनी हुई हैं।

इसी आधार पर वह सवाल करते हैं कि जब समाज खुद ही इतने हिस्सों में बंटा हुआ है, तब उसे बाहरी दुश्मन की जरूरत क्यों है?

‘हिन्दू राजनीति में हिन्दू कहां है?’

लेख में भारतीय राजनीति के मौजूदा स्वरूप पर भी सवाल उठाया गया है। डॉ. योगेन्द्र के अनुसार राजनीति में दिखाई देने वाली तथाकथित हिन्दू एकता के पीछे वास्तव में जातिगत समीकरण काम करते हैं।

वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि उनके समर्थकों में भी जातिगत पूर्वाग्रह दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि तथाकथित कुछ जातियों में दंभ इतना अधिक है कि वे दूसरी जातियों के लोगों को केवल नफरत की नजर से नहीं देखते, बल्कि उनके साथ मारपीट और अभद्र व्यवहार तक करने से नहीं चूकते।

लेख में इस विरोधाभास को भी रेखांकित किया गया है कि एक तरफ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात की जाती है, जबकि दूसरी तरफ अपने ही समाज के लोगों के प्रति भेदभाव और घृणा दिखाई देती है।

जातियों के बीच सम्मान का भी बंटवारा

डॉ. योगेन्द्र का कहना है कि जाति व्यवस्था में सम्मान का बंटवारा भी सीढ़ीनुमा है। उनके अनुसार प्रत्येक जाति ने अपने से नीचे या दूसरी जाति को अपमानित करने के लिए एक वर्ग तलाश लिया है।

लेख में चमार और भंगी, यादव-कुशवाहा-कुर्मी तथा ब्राह्मण-राजपूत-भूमिहार के बीच कथित सामाजिक और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का उल्लेख किया गया है।

उनके मुताबिक जातिगत पहचान राजनीतिक फैसलों को भी प्रभावित करती है। वह चिराग पासवान, सम्राट चौधरी और तेजस्वी यादव का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि अलग-अलग जातियों के मतदाताओं के बीच राजनीतिक समर्थन भी जातिगत समीकरणों से प्रभावित होता है।

‘जातियों का गठबंधन होता है, हिन्दू एकता नहीं’

डॉ. योगेन्द्र के अनुसार राजनीतिक दल और नेता चुनाव के समय अलग-अलग जातियों को साथ लाकर गठबंधन बनाते हैं, लेकिन इससे जाति व्यवस्था खत्म नहीं होती।

उनका कहना है कि “जाति रहती है, जातियों का गठबंधन होता है।” ऐसी स्थिति में सामाजिक यथास्थिति बनी रहती है और समाज में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं होता, जबकि सत्ता के लिए संघर्ष जारी रहता है।

उनका आरोप है कि जाति की यह बीमारी केवल एक राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों ही जातिगत सवाल पर अपनी-अपनी कमजोरियां दिखाते हैं, जबकि मध्यमवर्गीय राजनीति भी बड़े पैमाने पर जातिगत समीकरणों पर निर्भर है।

‘जाति पर गर्व होगा तो हिन्दू एकता पाखंड’

डॉ. योगेन्द्र अपने लेख में हिन्दू एकता के दावे पर भी सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि जब व्यक्ति अपनी जाति पर गर्व करता रहेगा और दूसरी जातियों को कमतर समझता रहेगा, तब हिन्दू एकता का दावा या तो पाखंड होगा या धूर्तता।

उनके अनुसार यदि हिन्दू समाज वास्तव में एकता चाहता है तो उसे जातिगत सीमाओं को तोड़ने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

अंतर्जातीय विवाह को लेकर दिया सुझाव

लेख के अंत में डॉ. योगेन्द्र अंतर्जातीय विवाह को लेकर एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हैं। उनका कहना है कि हिन्दू समाज को अपने बच्चों को अंतर्जातीय विवाह के लिए खुली छूट देनी चाहिए।

वह इससे आगे सरकार के स्तर पर भी एक सुझाव रखते हैं कि अंतर्जातीय विवाह करने वाले लोगों के लिए सरकारी नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।

डॉ. योगेन्द्र के अनुसार जाति व्यवस्था में बुनियादी बदलाव किए बिना हिन्दू एकता की बात करना सार्थक नहीं होगा। उनके लेख का मूल सवाल यही है कि यदि हिन्दू समाज अपने भीतर मौजूद जातिगत भेदभाव और विभाजन को खत्म नहीं करता, तो बाहरी चुनौती के खिलाफ एकता का दावा आखिर कितना मजबूत रह जाएगा?

नोट: इस लेख में व्यक्त विचार डॉ. योगेन्द्र के मूल लेख/विचारों पर आधारित हैं। लेख में उल्लिखित व्यक्तियों या घटनाओं से जुड़े आरोपों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि लेखक द्वारा किए गए दावे/उल्लेख के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

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