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मैं तो शहीद हूँ, हर युग में लौट कर आऊँगा’ : छात्र आंदोलन, लोकतंत्र और समाज पर डॉ. योगेन्द्र का लेख
मैं तो शहीद हूँ, हर युग में लौट कर आऊँगा
रांची में सुबह सुबह पनियाया आकाश। टहलने निकला तो लगा कि बारिश होगी ही होगी । हल्की झींसीं आई भी, लेकिन आकाश रूका- थमा रहा। यों रात में अच्छी ख़ासी बारिश हुई थी। यों तो रांची में बारिश होती ही रहती है, लेकिन कांके में और भी ज़्यादा । सर्दियों में भी कांके में ज़्यादा सर्दी पड़ती है । बिहार या देश के अन्य इलाक़ों में कांके का अर्थ पागलखाना हो गया है। अगर कोई ज़्यादा बकबक करता है तो उसे कहा जाता है- कांके जाना है क्या?
मगर कांके आकर जाना कि झारखंड का यह इलाक़ा कितना सुंदर है! मौसम भी, लोग भी। धरती हो या मनुष्य- उसे बहुत हड़बड़ी नहीं है। आराम से सबकुछ चलता है। यों यहाँ कांके चौक है, जहाँ पर वह अस्पताल है, जहाँ देश भर के लोग इलाज के लिए आते हैं। चौक पर थोड़ी गहमागहमी रहती है, लेकिन कांके प्रखंड के फैलाव की ओर जायें। तो वहां खेत हैं, पेड़ हैं, विभिन्न तरह के पक्षी हैं। लोग बहुत अमीर नहीं हैं, लेकिन उनके चेहरे पर तनाव नहीं है। मैं जब अपने घर से निकल कर सड़क पर पहुंचता हूँ तो वहाँ एक दूकान है। दूकान के किनारे हिंदू के भगवा झंडे और मुस्लिम के हरे झंडे साथ- साथ लगे हैं।
दोनों झंडों को साथ रहने में कोई परेशानी नहीं है।
हिंदू- मुस्लिम के नारों ने घनघोर मचा रखा है
पिछले कई वर्षों से देश में हिंदू- मुस्लिम के नारों ने घनघोर मचा रखा है। कांग्रेस, सपा, राजद आदि पर मुस्लिम तुष्टिकरण का ठप्पा ज़ोर से ठोक दिया गया है। इससे उन लोगों को बहुत ज़्यादा फायदा हुआ जो हिन्दुओं का तुष्टिकरण करना चाहते हैं और इस तुष्टिकरण को वोट में बदलना चाहते हैं। उन्होंने बदला भी। तुष्टिकरण के जाल में देश उलझ पुलझ कर रह गया है।
तुष्टिकरण की फ़सल बगबगा कर उगी और बीजेपी के लिए बहुत फलदाई रही। बीजेपी के बगीचे में तरह-तरह के राजनीतिक फल उगे और नेताओं ने जम कर फ़सल कटाई की। फ़सल काटते हुए उन्हें याद नहीं रहता कि ज़्यादा खाने से हाजमा बिगड़ जाता है। जिसका हाजमा बिगड़ जाता है, उसे दौड़ दौड़ कर ट्वायलेट जाना पड़ता है। उस पर अगर दरवाज़े पर कोई किवाड़ पीटने लगे तो नुंगा- फट्टा भी गीला हो जाता है। लोकतंत्र में सावधान रहना ज़रूरी है। वरना – सावधानी हटी,कि दुर्घटना घटी। सरकार सोचती है कि उसका कोई क्या बिगाड़ लेगा। जो करना है, जो करो। लेकिन एक दिन वही करनी आफ़त बन जाती है।
सरकार की लापरवाही का नतीजा
सरकार की लापरवाही का नतीजा है कि छात्र- छात्राएँ सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं। सरकार की तनी बंदूक़, छात्रों पर दगते गैस के गोले, छात्र- छात्राओं की पीठ पर बजती लाठियाँ। सबसे मार्मिक दृश्य है कि छात्राएँ डटी हैं। नारे लगा रही हैं, पुलिस से पूछ रही है, आपने सामने डटकर खड़ी है। छात्रों के हाथ टूटे, सिर से ख़ून बहे और फिर उनकी बुलंद आवाज़- मैं तो शहीद हूँ। हर युग में लौट कर आऊंगा। जज़्बा, जोश और जुनून। दुर्भाग्य पुलिस और मीडिया का कि वह सत्य ढूँढने या बोलने के बजाय उसमें पाकिस्तानी और चीनी हाथ ढूंढ रहे हैं। डूबने के लिए सिर्फ़ पानी नहीं होता, लोग बिना पानी के भी डूब जाते हैं। सत्ताधीशो, मदमस्त हाथी न बनो। मदमस्त हाथी को नियंत्रित करने के लिए महावत उसके सिर पर बैठ जाता है और अपना गजाडा चलाता है। तुम्हारा महावत आ चुका है। सिर पर बैठा है। वह गा रहा है- “हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख डॉ. योगेन्द्र के व्यक्तिगत विचार हैं। इसमें व्यक्त मत, टिप्पणी और निष्कर्ष लेखक के निजी हैं। News Outbox इन विचारों का समर्थन या खंडन नहीं करता।
