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आरएसएस: सावधान आगे आग है, डॉ. योगेन्द्र का बड़ा हमला, इतिहास से वर्तमान तक उठाए गंभीर सवाल
लेखक: डॉ. योगेन्द्र
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इन दिनों कई कारणों से चर्चा में है। संगठन को लेकर चंदा चोरी के आरोपों से लेकर उसके नेताओं के विवादित बयानों तक राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज़ हो गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खडगे भी संगठन को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं।
लेख में दावा किया गया है कि चंदा चोरी के कथित सरगना चंपत राय के आरएसएस से गहरे संबंध हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि राम मंदिर ट्रस्ट में आरएसएस से जुड़े लोगों की प्रमुख भूमिका है। लेखक का तर्क है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस में विभिन्न जातियों के लोग शामिल थे, लेकिन राम मंदिर ट्रस्ट में एक विशेष जाति का प्रभुत्व दिखाई देता है। लेख के अनुसार यदि राम मंदिर सभी हिन्दुओं का है, तो ट्रस्ट में सभी जातियों की समान भागीदारी होनी चाहिए।
लेख में आरएसएस पर जातिवाद के खिलाफ कोई व्यापक अभियान न चलाने का आरोप लगाया गया है। लेखक का कहना है कि संगठन की संरचना स्वयं इसकी गवाही देती है। लगभग सौ वर्ष पुराने संगठन में आज तक कोई भी सरसंघचालक पिछड़ी जाति, दलित या आदिवासी समुदाय से नहीं रहा। लेखक के अनुसार संघ व्यक्तित्व निर्माण की बात तो करता है, लेकिन उसके प्रशिक्षण से निकले लोगों पर जातिवादी मानसिकता का आरोप लगाया गया है।
लेख में 1925 में आरएसएस की स्थापना के बाद के ऐतिहासिक घटनाक्रमों का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि भगत सिंह की फाँसी, नमक सत्याग्रह, डांडी मार्च और डॉ. भीमराव अम्बेडकर के महाड आंदोलन जैसे महत्वपूर्ण आंदोलनों के दौरान संघ सक्रिय नहीं दिखा। कम्युनल अवॉर्ड और पूना पैक्ट के दौर में भी संगठन की भूमिका पर प्रश्न उठाए गए हैं।
लेख के अनुसार आरएसएस ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाई। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि संगठन ने 1942 के ‘करो या मरो’ आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया और स्वतंत्रता के बाद तिरंगे तथा संविधान का विरोध किया। लेखक का दावा है कि नागपुर स्थित मुख्यालय में संगठन ने स्वतंत्रता के कई दशक बाद तिरंगा फहराया।
लेख में यह भी प्रश्न उठाया गया है कि यदि कोई संगठन स्वतंत्रता आंदोलन, संविधान और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति विरोधी रुख रखता रहा हो, तो क्या वह राष्ट्रभक्ति का दावा कर सकता है। साथ ही मुसोलिनी और हिटलर के संदर्भ में भी संगठन की विचारधारा पर सवाल खड़े किए गए हैं।
कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खडगे द्वारा सरसंघचालक मोहन भागवत को संगठन के पंजीकरण संबंधी दस्तावेज़ उपलब्ध कराने के लिए लिखे गए पत्र का भी उल्लेख किया गया है। लेखक का दावा है कि संगठन के पास औपचारिक सदस्यता प्रणाली नहीं है और इसकी कानूनी स्थिति को लेकर भी सवाल मौजूद हैं।
लेख में हाल ही में आरएसएस से जुड़े बताए गए चिंतक मोहनदास के विवादित बयान का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उन्होंने जंतर-मंतर पर आंदोलन में शामिल महिलाओं और प्रदर्शनकारियों के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणी की। लेखक के अनुसार विवाद बढ़ने पर संगठन ने उनसे दूरी बना ली।
लेख के अंतिम हिस्से में आरएसएस की विचारधारा और बौद्धिक योगदान पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। लेखक का कहना है कि संगठन गाय, गोबर और गौमूत्र जैसे विषयों की पैरवी तो करता है, लेकिन विज्ञान, दर्शन और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय शोध या विश्वस्तरीय चिंतक प्रस्तुत नहीं कर सका। लेख का निष्कर्ष है कि संगठन की विचारधारा घृणा पर आधारित है और इसी कारण उसका बौद्धिक योगदान सीमित रहा है।
नोट: यह एक वैचारिक लेख है जिसमें व्यक्त विचार लेखक डॉ. योगेन्द्र के निजी विचार और आरोप हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस लेख में प्रस्तुत नहीं की गई है। ऐसे विषयों पर विभिन्न पक्षों की अलग-अलग राय और प्रतिक्रियाएँ हो सकती हैं।
