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शांतिपूर्ण आंदोलन के सीने पर सरकारी डंडा: नेहा बोरा, पीस बॉन्ड और चुनाव आयोग पर डॉ. योगेन्द्र के तीखे सवाल
अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास के हाथ बाँधे जा चुके हैं, अब नेहा बोरा की बारी है। सरकार ने मन बना लिया है कि युवाओं के आंदोलन को कुचल देंगे । जब हर नागरिक को शांतिपूर्ण आंदोलन करने का संवैधानिक अधिकार है तो पीस बांड लिखने और लिखाने की क्या ज़रूरत है? अगर सरकार कोर्ट और पुलिस का सहारा लेकर प्रदर्शनकारियों के अधिकार छीनने पर आमादा है तो प्रदर्शनकारियों में इतनी कूबत होनी चाहिए कि वे सरकार और कोर्ट के खिलाफ जायें। आंदोलन एक टेढ़ी पगडंडी है। उसकी राह आसान नहीं है। अगर आप यह सोचेंगे कि सोशल मीडिया पर उछल कूद कर देश बदल देंगे तो यह भ्रम है। सरकार अगर ग़लत ढंग से जेल में रखना चाहती है और वह ग़ैर संवैधानिक ढंग से आंदोलन को कुचलना चाहती है तो प्रदर्शनकारियों को जेल में रहना चाहिए। जेल में रहने की ताक़त विकसित करेंगे तो जेल के बाहर आपके प्रति भरोसा बढ़ेगा।
ज्ञानू नहीं जायेगा तो नंदू जायेगा
गांधी, नेहरू, पटेल, भगत सिंह, मौलाना आज़ाद, अशफाक उल्ला , ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ आदि सैकड़ों नेताओं के नाम इतिहास में यों ही दर्ज नहीं हैं। अगर उपरोक्त नेता अंग्रेज़ों के सामने सरेंडर कर रहे होते तो देश क़तई आज़ाद नहीं होता। अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास की फूहड़ बयानबाज़ी और हँसी भी बहुत भरोसा नहीं दिलाती है। ज्ञानू नहीं जायेगा तो नंदू जायेगा- जैसे बयान लोमहर्षक जरूर लगते हैं, लेकिन इससे देश नहीं बदल सकता। उन्हें अपनी वैचारिकता को और भी समृद्ध करना होगा। उन्हें बताना होगा कि वे कैसा सिस्टम चाहते हैं, उनकी राजनीति, आर्थिक नीति , शैक्षणिक नीति कैसी होगी। मजाक की भाषा से उन्हें मुक्ति पानी है।
नेहा बोरा लड़ाकू और निडर
नेहा बोरा उनकी तुलना में वैचारिक रूप से ज्यादा प्रखर है। वह लड़ाकू भी हैं और निडर भी। क़ानूनी दाँवपेंच में फँसाने की कोशिश सरकार ज़रूर करेगी। लेकिन उसे उस पेंच में नहीं फँसना है। अगर गिरफ्तारी होती हो तो हो। सरकार तभी दबाव में आयेगी, जब उसके सामने कोई सीना ताने खड़ा रहेगा। नेहा बोरा ने अब तक कोई मारपीट या डंडा, कट्टा और पत्थर नहीं चलाया है , फिर पीस बांड क्यों? सरकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचल रही है। नेहा बोरा की छवि युवाओं और समाज में उच्च स्तर की है। उसने कई मौकों पर यह दिखाया है कि वह सरकार से लोहा ले सकती है। उसके पास निजी स्तर पर राष्ट्र की नायिका बनने का अवसर है और जनविरोधी सरकार को बदलने का भी।
चुनाव आयोग नागरिकों के साथ खिलवाड़ कर रहा
सरकार की यह चाहत शुरू से रही है कि वह युवाओं के आंदोलन का दमन कर दे, लेकिन यह चाहत पूरी नहीं होगी। कल यानी 23 अक्टूबर को भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बड़ा नागरिक प्रतिरोध हुआ, जबकि इस आंदोलन की अगुवाई न राहुल गांधी कर रहे थे, न दिपके। चुनाव आयोग नागरिकों के साथ खिलवाड़ कर रहा है। मतदाता सूची पर किसी का बाप बी कॉम है तो किसी का एम कॉम। सरकार के इशारे पर सूची से मतदाताओं के नाम ग़ायब कर देना, फ़ार्म 7 के सहयोग से जीवित मतदाता के नाम काट देना और हल्की त्रुटियों का सहारा लेकर लाखों वोटरों को संदिग्ध बना देना, चुनाव आयोग के लिए एक खेल हो गया है। वह सरकार के हाथों एक खिलौना है। दुर्भाग्य की बात यह है कि इस खेल का समर्थन कोर्ट तक कर रहा है। लोकतंत्र के इस क्षरण का अपराधी सरकार है। जनता के पास सड़क पर उतरने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है।
