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सुरक्षा के दावे बड़े-बड़े, लेकिन सवाल आज भी बाकी!

सुरक्षा के दावे बड़े बड़े
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सुरक्षा के दावे बड़े-बड़े

जब भी देश में सुरक्षा की चर्चा होती है, तो भाषणों में मजबूत इरादों, कड़ी कार्रवाई और आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब देने की बातें प्रमुखता से सामने आती हैं। लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल यही है कि ये भाषण कितने प्रभावी हैं, और वास्तविकता में परिणाम क्या हैं। विशेषकर 2014 के बाद हुई आतंकवादी घटनाएं, बम धमाके और नक्सली हिंसा का क्या हाल है?

यह प्रश्न किसी एक सरकार या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। यह एक सामान्य नागरिक की चिंता है, जो अपने परिवार की सुरक्षा, जवानों की जान और देश के किसी भी हिस्से में हिंसा के डर से मुक्त जीवन की कामना करता है।

आंकड़ों और राजनीतिक दावों का संघर्ष

जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां, पूर्वोत्तर में उग्रवादी हिंसा, और देश के विभिन्न कोनों में नक्सली हमले—ये सभी भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए अलग-अलग चुनौतियां हैं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों में इन घटनाओं को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। इसलिए इन सबका मिलाकर एक विशाल संख्या पेश करना सरल है, लेकिन इससे पूरी स्थिति का सही चित्रण नहीं होता।

मसलन, जम्मू-कश्मीर में किसी साल आतंकवादी घटनाएं बढ़ती हैं और अगले साल घटती हैं, तो सवाल उठता है कि इस बदलाव के पीछे कौन-से सुरक्षा उपाय काम आए? क्या सीमा पार से घुसपैठ कम हुई? क्या स्थानीय स्तर पर आतंकवादियों की भर्ती घटी? और क्या आम लोगों की सुरक्षा पहले से बेहतर हुई?

इसी तरह, नक्सली हिंसा की घटनाओं में कमी एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकती है। लेकिन क्या इससे प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सरकारी सेवाओं की पहुंच भी बेहतर हुई? अगर किसी इलाके में गोलियों की आवाज कम हो गई, लेकिन लोगों की बुनियादी समस्याएं जस की तस हैं, तो सुरक्षा की सफलता का आकलन अधूरा रहेगा।

बम धमाकों और आतंकी हमलों का असर हमेशा जनता पर पड़ता है

सुरक्षा की स्थिति अक्सर राजनीतिक बहसों का हिस्सा बन जाती है। सत्ता में बैठे लोग अपनी सफलताओं की गिनती करते हैं, जबकि विपक्ष आलोचना करता है। इस दौरान टीवी के मंच पर बहस और आरोपों का दौर चलता है। लेकिन हमले में जान से हाथ धोने वाला व्यक्ति का परिवार इन बहसों से अपने नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता।

एक सैनिक की शहादत सिर्फ एक राजनीतिक आंकड़ा नहीं होती। किसी हमले में घायल हुआ नागरिक भी चुनावी प्रचार का हिस्सा नहीं होता। और हिंसा के कारण अपना घर छोड़ने को मजबूर परिवार केवल एक सरकारी रिपोर्ट में दर्ज एक पंक्ति नहीं है।

इसलिए, चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, नागरिकों का यह अधिकार है कि वे उससे सवाल पूछें। सुरक्षा एजेन्सियों की सफलताओं को स्वीकार करने के साथ-साथ उनकी कमियों पर जवाब भी मांगा जाना चाहिए। ये दोनों ही लोकतंत्र की अहम जरूरत हैं।

तो आखिर जवाबदेही किसकी होती है?

सुरक्षा का आकलन केवल यह देखकर नहीं किया जाना चाहिए कि कितने हमले हुए। यह भी महत्वपूर्ण है कि कितने हमले रोके गए, खुफिया तंत्र की क्षमता कितनी प्रभावी थी, और जांच प्रक्रिया कितनी कुशलतापूर्वक

सरकारें बदल सकती हैं, नारे बदल सकते हैं और चुनावी वादों की भाषा भी बदल सकती है। लेकिन आम नागरिक की अपेक्षा नहीं बदलती—उसे सुरक्षित जीवन चाहिए।

आखिरकार, राष्ट्रीय सुरक्षा का असली इम्तिहान मंच से किए गए दावों में नहीं, उस भरोसे में है जिसके साथ एक नागरिक अपने बच्चों को स्कूल भेजता है और एक परिवार बिना डर के अपने घर में सोता है।

देशभक्ति का अर्थ सिर्फ सुरक्षा के दावों पर तालियां बजाना नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सही सवाल पूछना भी है। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार से जवाब मांगना देश के खिलाफ होना नहीं, बल्कि देश के प्रति जिम्मेदारी निभाना है।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय के आंकड़ों को देखते हुए एक नजर अबतक के सरकार के कार्यकाल में हुए घटनाओं का विवरण इस चार्ट से देखा समझा जा सकता है-

1. जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाएं

गृह मंत्रालय के संसदीय जवाबों के अनुसार

वर्षआतंकी घटनाएं
2014222
2015208
2016322
2017342
2018614
2019153
2020126
2021129
2022125
202346

2. देश के अन्य हिस्सों में आतंकी घटनाएं

वर्षघटनाएं
20143
20151
20161
20170
20181
20190
20200

ये गृह मंत्रालय के मार्च 2021 के संसदीय जवाब में दिए गए आंकड़े हैं।

3. पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी घटनाएं

वर्षघटनाएं
2014824
2015574
2016484
2017308
2018252
2019223
2020163
2021*187

2021 का आंकड़ा 15 नवंबर तक का है। स्रोत: गृह मंत्रालय

4. नक्सली हिंसा की घटनाएं

वर्षनक्सलियों द्वारा की गई हिंसक घटनाएं
20141,091
20151,089
20161,048
2017908
2018833
2019670
2020665
2021509
2022413
2023*250

2023 का आंकड़ा 15 जून तक का है। 2022 से सुरक्षा बलों द्वारा शुरू की गई घटनाएं अलग दर्ज की गईं।

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