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यों मुझे मत छोड़ दो, सागर : डॉ. योगेन्द्र की यात्रा, स्मृति, मोबाइल और बदलती दुनिया पर चिंतन

yon mujhe mat chhod do sagar dr yogendra yatra smriti mobile badalti duniya
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यों मुझे मत छोड़ दो, सागर
डॉ योगेन्द्र

यों मुझे मत छोड़ दो, सागर : पटना से भागलपुर। खुदाबख्श लाइब्रेरी के सेमिनार में रहने- सहने की कोई कमी नहीं थी। बहस- मुबाहिस् भी हुए। पटना के केयॉस को भोग कर आया था, इसलिए भागलपुर बहुत शांत लगा। ज्यों ही ट्रेन से उतर कर रेलवे ऑवरब्रिज पार करते हैं तो ऑटोवाले, ई रिक्शा वाले और यहां तक कि रिक्शा वाले भी निवेदन करने लगते हैं।

दिनोंदिन यह भीड़ बढ़ती ही जा रही है। स्टेशन के बाहर वाले हिस्से में कभी बस स्टैंड हुआ करता था और एक साहित्य की चर्चित दूकान थी। चौड़ीकरण हुआ तो पुरानी चीज़ें ख़त्म हो गई। अब वहां रिक्शा, ट्वायलेट , टैक्सी आदि के स्टेंड हैं । दुनिया बदलने के क्रम में किसी को जाना और किसी को आना पड़ता है।


इधर से महसूस करता हूँ कि भूलता बहुत हूँ। दवा खा ली है, फिर मन में ख्याल आता है कि नहीं, खाई है दवा। मन में द्वंद्व छिड़ जाता है। किताब पढ़ी है, लेकिन कुछ याद नहीं रहता। उम्र का असर भी रहता होगा, लेकिन सबसे बड़ा असर है मोबाइल का।

काम- धंधे से फुर्सत हुई कि मन बहलाने के लिए मोबाइल देखने लगता हूँ। छोटी – छोटी रीलें चलती रहती हैं, नतीजा होता है कि एकाग्रचितता भंग हो जाती है।

जो पढ़ा लिखा होता है, वह कहीं कोने में पड़ा रहता है। मोबाइल के अपने फायदे हैं, लेकिन कम हानिकारक नहीं है। आदमी के दिमाग को कमजोर करने में इसकी बड़ी भूमिका है। कई बार सोचता हूँ कि लिमिट में रहें, लेकिन यह हो नहीं रहा।

कितनी किताबें हैं, जिन्हें पढ़ नहीं पाया । खरीदता भी रहता हूँ। किताबें मुझे दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ लगती हैं।
आसपास के कई लोगों को देखता हूँ, वे खूब लिखते हैं। पढ़ते भी होंगे। बिना पढ़े और अनुभव के लिखना संभव नहीं है।

अज्ञेय यायावर ही थे। यात्राओं के अनुभव से समृद्ध होते थे। ‘ अरे यायावर, रहेगा याद’ उनकी चर्चित यायावरी कृति है। कैलिफ़ोर्निया में अज्ञेय ने ‘ सागर- मुद्रा’ पर अनेक कविताएँ लिखीं। उनकी इस सिलसिले की एक कविता है- ‘ सागर- मुद्रा-8 के नाम से-


यों मत छोड़ दो मुझे, सागर
कहीं मुझे तोड़ दो , सागर ,
कहीं मुझे तोड़ दो !
मेरी दीठ को और मेरे हिये को
मेरी वासना को और मेरे मन को ,
मेरे कर्म को और मेरे मर्म को
मेरे चाहे को और मेरे जिये को
मुझ को और मुझ को और मुझ को
कहीं मत छोड़ दो मुझे, सागर ,
यों मत छोड़ दो।

आदमी एक संसार रच लेता है और उसमें उसका विकास होता है। अपनी और बाहरी दुनिया को मिलाता, जूझता और विरोध करता हुआ बढ़ता रहता है। हर आदमी को अपनी दुनिया ख़ूबसूरत लगती है, लेकिन उसे दूसरे की दुनिया का भी सम्मान करना चाहिए।

हमारा तो नाभिनाल संबंध उसी दुनिया से रहता है जो हम रचते हैं, लेकिन इधर आदमी की दुनिया उजड़ने लगी है। उपभोक्तावाद अपनी लपलपाती जिह्वा फैलाये लीलने को तत्पर है।

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