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तकनीक का अंधेरापन और उपभोक्तावाद: डॉ योगेन्द्र
रेनकोट मैंने कभी पहना नहीं। भागलपुर में रेन यानी वर्षा ऐसी नहीं होती थी कि रेनकोट की दरकार हो। रांची का मौसम अलग है। आषाढ़, सावन और भादो में कब वर्षा हो जाए, कहना मुश्किल है। सुबह मॉर्निंग वाक के लिए चलने लगा तो झींसी गिर रही थी । कॉलोनी के गेट तक जाते- जाते रेनकोट पहनना जरूरी हो गया । झारखंड का अपना स्वभाव है । उसकी धरती, उसके पेड़, जंगल और नदी से मूल बाशिंदों में एक खास तरह के स्वभाव का विकास हुआ है। बाहर से आये लोग इस स्वभाव को अमूमन नहीं पहचानते। जंगलों और पहाड़ों की स्थिरता, शांति और उदात्तता उनमें उदारता और शांति भर देती है। झारखंड के बदलाव में उसका ख़्याल रखा जाना चाहिए था, लेकिन बाहर से आये लोग, सत्ता की संस्कृति, पाश्चात्य उपभोक्तावाद ने इसके चित्त में भी हलचल पैदा कर दी है। खनिज पदार्थों का धनी यह प्रदेश अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा है।
रीति- रिवाजों और जीने के तरीक़ों में अंतर
उराँव, संथाल, हो, पहाड़िया, मुंडा- जैसी जनजातियाँ तो है ही, कुडमी ( कुर्मी) , कुशवाहा, यादव और दलित एवं अन्य सवर्ण जातियां भी हैं। उनमें आपसी द्वंद्व भी है। रीति- रिवाजों और जीने के तरीक़ों में भी अंतर है। बाहरी दख़ल भी काफ़ी बढ़ा है। एक अच्छी व्यवस्था होती तो एक- दूसरे की अच्छाइयों से सीखते और बुराइयों पर विजय प्राप्त करते। जो भी हो, प्रकृति का सीधा असर चित्त और चेतना पर होता ही है। बंगाल से केरल तक का समुद्री इलाक़े को देखें तो उसके खानपान, व्यापार और जीवन जीने के तरीक़ों में अंतर है। ईसा पूर्व से ही वहां के लोग दूर दूर तक यात्राएं करते रहे हैं । जहाज़ बनाने का हुनर उसके पास सदियों से है। यहां तक कि वे दूर- दूर के देशों और इलाक़ों में बसते गये। जो लोग यह कहते हैं कि भारतीय समुद्र नहीं लाँघते थे, उन्हें दक्षिण भारत के क़िस्से चमत्कृत करेंगे । कितने ही लोग श्रीलंका, म्यांमार, कनाडा, दक्षिण अफ़्रीका , यूएई , मलेशिया आदि देशों में बसे हुए हैं ।सिर्फ़ बाहर से आकर ही लोग भारत में नहीं बसे हैं, भारतीय भी बसते रहे हैं । हम अपने दिमाग़ में जब कूड़ा भर लेते हैं तो मन में दूसरे के खिलाफ नफरत भर लेते हैं।
डॉ लोहिया ने क्या कहा था
हम सब का दायित्व है कि धरती को आनेवाली पीढ़ी के लिए बचा कर रखें। डॉ लोहिया ने कभी कहा था कि आधुनिक सभ्यता के दो उत्पाद हैं- अणु बम और महात्मा गांधी। अणु बम शैतानी मन की उपज है, जब गांधी सत्य, अहिंसा और मानवता की रक्षा के लिए। अणु बम से आधुनिक शासकों को बेहद प्यार है। हर देश अणु बम में सुरक्षा ढूंढ रहा है। मानवीय बुद्धि का दायरा सिकुड़ रहा है और अणु बम विस्तार पा रहा है। विश्व के कई इलाक़ों में युद्ध है ही, आंतरिक इलाक़े भी क्रोध से भरे हुए हैं । अणु बम का ही विस्तारित रूप एआई है। एआई का क्या दिमाग़ी असर पड़ रहा है, इसका आकलन मुश्किल है, लेकिन इसके डाटा सेंटर को बनाये रखने के लिए इतने फ़्रेश वाटर और बिजली की ज़रूरत पड़ती है, जितने फ़्रेश वाटर और बिजली एक शहर के लिए खर्च होते हैं। अमेरिका में जनता इसके ख़िलाफ़ सड़क पर उतर रही है। यही वजह है कि धनपशु अब भारत जैसे निर्धन मुल्क की ओर मुख़ातिब हैं, जहाँ डाटा सेंटर बनाया जायेगा । सत्ता हमारी आँखों में धूल झोंकेगी और हम सब भी किसी चमत्कार की प्रतीक्षा में अपनी सहमति देंगे। हमारे प्यारे देश को बचाना है तो तकनीक के अँधेरेपन से अलग होना है।
