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Delimitation vs Reservation: महिला आरक्षण के पीछे छिपा है परिसीमन का बड़ा खेल, क्या बढ़ेगा उत्तर-दक्षिण का विवाद?

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लेखक – श्री निवास, सोशल एक्टिविस्ट

Delimitation vs Reservation: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आहूत संसद का विशेष सत्र आज से शुरू हो रहा है, जिसका मुख्य केंद्र ‘नारी शक्ति वंदन’ विधेयक है। पीएम ने सभी दलों से इस ऐतिहासिक कदम में सहयोग की अपील की है, लेकिन इस ‘उतावली’ और व्यापक प्रचार अभियान ने कई राजनीतिक गलियारों में संदेह और चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

चुनाव के बीच विशेष सत्र का समय: सवाल और संदेह

जब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों का शोर है, ऐसे समय में संसद का विशेष सत्र बुलाने के पीछे की टाइमिंग पर सवाल उठ रहे हैं। क्या यह केवल महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक कदम है, या इसके पीछे परिसीमन (Delimitation) जैसे गहरे राजनीतिक उद्देश्य छिपे हैं?

1996 से अब तक: सर्वदलीय ‘पाखंड’ का लंबा इतिहास

महिला आरक्षण विधेयक का इतिहास 1996 में एचडी देवगौड़ा सरकार के समय से शुरू होता है। तब से अब तक यह कई बार सदन के पटल पर आया, लेकिन हर बार किसी न किसी बहाने इसे लटकाया गया। आलोचकों का मानना है कि पुरुष प्रधान राजनीतिक नेतृत्व ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया। अगर कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दल वाकई गंभीर होते, तो कुछ छोटे दलों के विरोध के बावजूद यह कानून दशकों पहले अस्तित्व में आ चुका होता।

कोटा के अंदर कोटा: सामाजिक न्याय का तर्क

विधेयक का विरोध करने वाले दलों का तर्क है कि बिना किसी आंतरिक कोटे (Caste-based Quota) के, इसका लाभ केवल संपन्न और सवर्ण तबके की महिलाओं तक सीमित रह जाएगा। जैसे नौकरियों में आर्थिक रूप से पिछड़ों (EWS) के नाम पर एक खास वर्ग को लाभ मिला, क्या वैसी ही स्थिति यहाँ भी होगी? उच्च शिक्षण संस्थानों और प्रशासन में गैर-सवर्ण महिलाओं की संख्या आज भी चिंताजनक है, जिसे इस आरक्षण में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

असली मुद्दा: परिसीमन और उत्तर-दक्षिण की खाई

विशेषज्ञों का कहना है कि महिला आरक्षण तो केवल एक माध्यम है, असली खेल ‘परिसीमन’ का है। यह तय है कि महिला आरक्षण कानून परिसीमन के बाद ही लागू होगा। परिसीमन से लोकसभा की सीटें बढ़ेंगी, लेकिन इसका एक बड़ा खतरा यह है कि इससे उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का असंतुलन बढ़ सकता है। दक्षिण भारत के राज्यों में इसे लेकर पहले से ही तनाव के लक्षण दिख रहे हैं।

निष्कर्ष

यदि सरकार महिलाओं के प्रति गंभीर है, तो यह स्वागत योग्य है। लेकिन ढोल-नगाड़ों के साथ किए जा रहे प्रचार और परिसीमन के संभावित दुष्परिणामों को दरकिनार करना एक नई राजनीतिक जंग की शुरुआत कर सकता है। क्या ‘नारी शक्ति वंदन’ वाकई महिलाओं की शक्ति बढ़ाएगा या यह केवल परिसीमन की कड़वी दवा पर चढ़ी ‘चीनी की परत’ है?

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