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फर्जीस्तान के बाशिंदों से निवेदन — डॉ योगेन्द्र
घाम-पसीना छर्र-छर्र बहता है। हवा बहती है, तब भी पसीना नहीं रुकता। गर्मी का मौसम है तो स्वाभाविक है। मध्यम वर्ग को थोड़ी-सी गर्मी परेशान कर देती है। मज़दूर दिन भर काम करता रहता है, बिना थके। एक भारत में कितने भारत हैं!
संविधान ने सबको एक वोट का अधिकार दिया
संविधान ने सबको एक वोट का अधिकार दिया। क्या ग़रीब, क्या अमीर — सबके वोट का मान बराबर है। वैसे ही आर्थिक मानदंड भी निर्धारित होना चाहिए था। डॉ लोहिया ने कहा था कि समता न भी हो तो संभव समता हो सकती है। उन्होंने एक से दस प्रतिशत के बीच संपत्ति का बँटवारा किया था। यानी अगर किसी नागरिक के पास एक रुपया है तो किसी और नागरिक के पास ज़्यादा से ज़्यादा दस रुपया हो सकता है।
आज तो समता की कोई बात ही नहीं करता। यह मान लिया गया है कि भीषण आर्थिक गैर बराबरी ही भारत का सच है। ऊपर के दस प्रतिशत लोगों के पास अमेरिकी नागरिकों से भी ज़्यादा संपत्ति और सुविधाएँ हैं।
मैं कल भागलपुर के एक चर्चित और पुराने मुहल्ला परबत्ती गया था। कहीं से भी जीने लायक़ नहीं लगता। सड़कों पर नालियाँ बहती हैं। जगह-जगह गंदगी है। स्वच्छता का तो कोई मामला ही नहीं है। सुन रहा हूँ कि भागलपुर नंबर वन स्वच्छ शहर बन गया है। अगर यही स्वच्छता का पैमाना है, तो अस्वच्छता का पैमाना क्या होगा?
फ़र्ज़ी डाटा से सोशल मीडिया का भरा रहना
फ़र्ज़ी डाटा से सोशल मीडिया भरा रहता है। सच्चाई कैसे छुपी रहे, मुख्य मीडिया यह अनुचित कार्य उचित ढंग से संपादित करती रहती है।
कोई दावा करता है कि पिछले वर्षों में 38 करोड़ नागरिक ग़रीबी रेखा से बाहर आये। कोई यह संख्या 30 करोड़ बताता है तो कोई 25 करोड़ बताता है। सवाल है कि यह डाटा आता कहाँ से है? न कोई आर्थिक सर्वेक्षण हुआ, न जनसंख्या की गणना हुई। 2011 में जनसंख्या की गणना हुई थी। नयी जनगणना हुई नहीं। फिर ऐसे दावे!
आजकल डाटा भी आत्मनिष्ठ होते हैं। सरकार से 2016 से छह बार ग़रीबी रेखा के बारे में पूछा गया। सरकार चुप लगा गई। लेकिन सरकार के हर मंत्री के मुँह पर डाटा रहता है। कोई कुछ बोलता है, कोई कुछ। घर बैठे हरेक को डाटा उपलब्ध है। कितने बाघ मारे, कितने सियार मारे।
प्रधानमंत्री से कोई नहीं पूछता कि कर्ज़ में देश कैसे डूबता जा रहा
सरकार एक डाटा और जारी करे कि उसने सरकारी उपक्रमों और उसकी संपत्तियों को किन-किन पूँजीपतियों के हाथ बेचा? जंगल और ज़मीन के कितने हिस्से उन्होंने किन-किन धन्ना सेठों को दिया? बैंकों के पैसे कितने लुटाए और वे पैसे कहाँ गए? देश के बाज़ार में कितने काले धन तैर रहे हैं, कितने सफेद।
प्रधानमंत्री से कोई नहीं पूछता कि एक हज़ार नोट से जमाख़ोरी होती थी तो दो हज़ार वाले नोट से जमाख़ोरी खत्म कैसे होती? वह चमकदार चिप्स लगा दो हज़ार का नोट बिना बंद किए, बंद कैसे हो गया?
प्रधानमंत्री से कोई नहीं पूछता कि कर्ज़ में देश कैसे डूबता जा रहा है? कर्ज़ का यह अरबों रुपया कहाँ चला गया? क्या देश का विकास कर्ज़ों से होगा या अडानी के चरण-चुंबन से?
अच्छे दिन के नारे बुरे दिन लेकर आये
देश की ताक़त किसान, मज़दूर, छात्र, नौजवान हैं। इनके लिए विकास की कौन-सी नीति है? ये सम्मान के साथ कैसे जियेंगे, इसके लिए सरकार ने कौन से कार्यक्रम बनाए हैं?
बड़बोलापन एक दिन ले डूबता है। अच्छे दिन के नारे बुरे दिन लेकर आये हैं। स्वागत कीजिए और कुतर्क गढ़िए। आज महंगाई भी राष्ट्रभक्ति है और रुपए की गिरती कीमत भी।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump का चरण चुंबन करना तो राष्ट्रभक्ति का उत्तम उदाहरण है। सच पूछिए तो देश के बाहर गिड़गिड़ाना और देश के अंदर चिंघाड़ना राष्ट्रवाद का नायाब नमूना है।
